बिमल मित्र की किताब ‘बिछड़े सभी बारी-बारी’
बहादुर पटेल
बिमल मित्र बांग्ला के महत्त्वपूर्ण कथाकार एवं उपन्यासकार रहे हैं। वे कई पत्र-पत्रिकाओं में धारावाहिक उपन्यास लिखते थे। यानी उपन्यास लिखना शुरू करते, तत्काल किश्तें लिखते और भेज देते। इस तरह उन्होंने कई उपन्यास लिखे। उनके उपन्यास बहुत चर्चित रहे और पाठक उनकी किश्तों का इंतज़ार करते थे। बिमल मित्र की भाषा बहुत सहज और रोचक थी। वे अपने पात्रों के मनोविज्ञान को बहुत गहराई से समझते थे। यही कारण है कि उनके उपन्यास आज भी उतनी ही रुचि से पढ़े जाते हैं। ‘साहब-बीबी-गुलाम’, ‘खरीदी कौड़ियों के मोल’, ‘बेगम मेरी विश्वास’, ‘एकक दशक शतक’, ‘आसामी हाज़िर’ आदि कई उपन्यास उन्होंने लिखे हैं। 1950 में भारतीय रेल की नौकरी से इस्तीफ़ा देने के बाद वे पूर्णकालिक लेखक बन गए। उन्हें कई महत्त्वपूर्ण पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए। उनकी कई कृतियों पर फ़िल्में भी बनीं और आज वे बांग्ला के सबसे लोकप्रिय लेखकों में गिने जाते हैं।
गुरुदत्त बहुत पढ़ाकू थे और हर काम को जुनून की तरह करते थे। जब गुरुदत्त ने साहब-बीबी-गुलाम पढ़ा तो इस उपन्यास पर इसी नाम से फ़िल्म बनाने का विचार किया। फिर क्या था, उन्होंने बिमल मित्र से बात की और उन्हें अपने पास बम्बई बुला लिया। फ़िल्म निर्माण के दौरान आत्मीय और अंतरंग समय उन्होंने गुरुदत्त के साथ बिताया। इस समय को बिमल मित्र ने बहुत शिद्दत के साथ लिखा। फ़िल्म निर्माता, फ़िल्म कलाकार और फ़िल्म इंडस्ट्री के मनोविज्ञान को उन्होंने बहुत बारीकी से पकड़ा। यह किताब पढ़ते हुए लगता है कि लेखक केवल घटनाओं का वर्णन नहीं कर रहे हैं, बल्कि गुरुदत्त के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश कर रहे हैं। गुरुदत्त की आदतें, उनका स्वभाव, उनका काम करने का तरीका और उनके भीतर चलने वाला संघर्ष इस किताब में बहुत विस्तार से सामने आता है।
दरअसल बिमल मित्र ने इसे गुरुदत्त की जीवनी की तरह लिखा है, जिसका अनुवाद बांग्ला से हिंदी में सुशील गुप्ता ने किया है। ज़्यादातर लोग गुरुदत्त के बारे में ज़्यादा नहीं जानते हैं। लेकिन इस किताब को पढ़कर जाना जा सकता है कि गुरुदत्त बहुत ही अलग तरह के इंसान थे। ज़िंदादिल लगने वाला यह शख़्स अंदर से भयानक बेचैनी लिए हुआ था। बिमल मित्र बार-बार यह सवाल उठाते हैं कि मान-सम्मान, सफलता, यश, प्रतिभा, पैसा, खूबसूरत पत्नी, बच्चे और शोहरत – सब कुछ होने के बाद भी गुरुदत्त भीतर से इतने बेचैन क्यों थे। लगातार अपने आपको कष्ट देकर अपने जीवन को ख़त्म करने की कोशिश में लगे हुए थे। रात-दिन काम करना, किताबें पढ़ना और बिल्कुल यायावर जीवन बिताना। अनिद्रा का शिकार होकर खुद को शराब और नींद की गोलियों के हवाले कर देना। इन सब बातों को लेखक ने बिना किसी बनावट के बहुत सादगी से लिखा है।
कई अच्छी फ़िल्मों का निर्माण करना, कई फ़िल्मों में बेजोड़ अभिनय करना और केवल 39 वर्ष की उम्र में आत्महत्या कर लेना भारतीय सिनेमा का बहुत दुःखद अध्याय है। इस किताब को पढ़ते हुए समझ में आता है कि बड़े कलाकारों के जीवन में दिखाई देने वाली चमक के पीछे कितना अकेलापन और संघर्ष छिपा होता है।
इस किताब को पढ़कर गुरुदत्त को जानने के अतिरिक्त हम बिमल मित्र के जीवन के भी कई अनछुए पहलुओं को जान पाते हैं। उनकी लेखकीय दृष्टि, लोगों को परखने की क्षमता और घटनाओं को देखने का उनका तरीका इस पुस्तक में साफ़ दिखाई देता है। बहुत सीधी-सरल भाषा में लिखी गयी यह किताब सचमुच एक अमूल्य धरोहर है।
यह किताब वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है। प्रथम संस्करण 2010 में, दूसरा 2012 में और तीसरा 2014 में प्रकाशित हुआ।
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