जीने के धुत्त नशे में स्मृति और कल्पना का स्वाद

सुमन शेखर   “प्यारे, तुम्हारी आँखें बदल गई हैं, फ़िल्म अब भी वही है।” मेरे मित्र ने कहा था। फ़िल्में तब एक विशाल, सफ़ेद रंग […] Read More

‘इल  पोस्तिनो’ : समुद्र, एक पोस्टमैन और इंतज़ार की कविता

इल  पोस्तिनो (द पोस्टमैन) अमेय कान्त क्या समुद्र और एक पुरानी साइकिल के बीच भी किसी तरह का कोई रिश्ता पनप सकता है? ऐसे रिश्ते के […] Read More

अब्बास किआरोस्तामी के सिनेमा से गुज़रते हुए

अब्बास किआरोस्तामी के सिनेमा से गुज़रते हुए सुदीप सोहनी   इस समय जिस ईरान से दुनिया का परिचय हो रहा है और जिन कारणों से […] Read More

‘अ रियल पेन’ – ठहरे पानी के बीच से चुपचाप गुज़रते हुए : अमेय कान्त

अतीत कई जगहों पर तकलीफ़देह होता है। कभी-कभी तो इतना कि इसकी टीस पीढ़ियों तक महसूस होती रहती है। लेकिन क्या सच में ऐसा है? […] Read More

भयानक वर्तमान की मर्मान्तक अनुगूंजें : अमेय कान्त

कहते हैं कि पिकासो की ‘गुएर्निका’ पेंटिंग को देखकर जब एक नाज़ी अफ़सर ने उनसे पूछा था कि “इसे तुमने बनाया?” तो उनका जवाब था […] Read More

सोसाइटी ऑफ़ द स्नो (Society of the Snow) : मज़बूत भावनात्मक पक्ष के साथ एक तथ्यपरक फ़िल्म : अमेय कान्त

Society of the Snow Hindi Review स्पेनिश भाषा की फ़िल्म ‘सोसाइटी ऑफ़ द स्नो’ एक सच्ची घटना पर आधारित है. साल 1972 में उरुग्वे की […] Read More

रोमा (Roma): वर्त्तमान की आँखों से अतीत को देखती फ़िल्म : अमेय कान्त

नेटफ़्लिक्स काफ़ी समय से अपनी कई ओरिजिनल सीरीज़ और फ़िल्मों के माध्यम से हॉलीवुड के सामने नई चुनौतियाँ लेकर आ रहा है। लेकिन साल 2018 […] Read More