नरबदा से उठती सुधियों की टेर

दीप्ति कुशवाह सतीश टाकीज़। आधे नर-आधे सिंह भगवान के मंदिर वाले शहर नरसिंहपुर की एक टाकीज़। हसरतों की मंज़िल। सोलह-साला नमकीन सपने यहीं ज़मीन पाते। […] Read More

दो हज़ार फ़ीट ऊपर, जहाँ डर के सिवा कुछ नहीं बचता

दीप्ति कुशवाह   ‘फ़ॉल’ के दूसरे भाग के आने से पहले पहली फ़िल्म की स्मृति आईमैक्स में ‘फ़ॉल 2: डेडपॉइंट’ का पोस्टर देखा तो उसकी […] Read More

नसीरुद्दीन शाह : जब अभिनेता पर्दे से उतरकर नागरिक बन जाता है

संदीप नाईक   ​एक अभिनेता, एक रंगकर्मी और असहमति की नैतिक आवाज़ ​भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार अपनी फ़िल्मों की संख्या से नहीं, बल्कि उन […] Read More

‘मट्टो की साइकिल’ : प्रश्नों के बीहड़ में भटकता मन

  ललन चतुर्वेदी   मेरे लिए ‘मट्टो’ की साइकिल’ देखना निजी अनुभवों और स्मृतियों से गुज़रना है। इसे देखते हुए मैंने इसके संवादों से अधिक […] Read More

“मैं एक किताब हूँ और तुम एक फ़ुटनोट”

राजेश सक्सेना   (“मैं एक किताब हूँ और तुम एक फ़ुट नोट” यह कथन हिटलर के सबसे खतरनाक और सेकंड इन कमान राइसमार्शल हरमन गोरिंग […] Read More

जीने के धुत्त नशे में स्मृति और कल्पना का स्वाद

सुमन शेखर   “प्यारे, तुम्हारी आँखें बदल गई हैं, फ़िल्म अब भी वही है।” मेरे मित्र ने कहा था। फ़िल्में तब एक विशाल, सफ़ेद रंग […] Read More

‘दो बूँद पानी’ : भारतीय सिनेमा में पानी का एक मार्मिक आख्यान

मनीष वैद्य   आज से क़रीब पचास साल पहले जल संकट की भयावहता आज की तरह गंभीर भले ही न रही हो, लेकिन देश के […] Read More

‘ओडिसी’ : युद्ध, अपराधबोध और वापसी की महागाथा

अमेय कान्त   दुनिया भर में रिलीज़ होने वाली बड़े बजट और दिग्गज निर्देशकों की फ़िल्मों के मामले में यह साल भी याद किया जाएगा। […] Read More