साधारण लोगों का असाधारण अभिनेता

योगेश कुमार ध्यानी भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री में नाना पाटेकर का पदार्पण सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में हुआ। शुरुआत में कला फ़िल्मों से संबद्ध रहते […] Read More

नाना पाटेकर : गुस्से से सामाजिक चेतना तक – एक अभिनेता की विरासत

संदीप नाईक नाना पाटेकर का जाना केवल एक अभिनेता का चले जाना नहीं है; यह उस अभिनय परंपरा के एक बड़े अध्याय का अंत है, […] Read More

नरबदा से उठती सुधियों की टेर

दीप्ति कुशवाह सतीश टाकीज़। आधे नर-आधे सिंह भगवान के मंदिर वाले शहर नरसिंहपुर की एक टाकीज़। हसरतों की मंज़िल। सोलह-साला नमकीन सपने यहीं ज़मीन पाते। […] Read More

नसीरुद्दीन शाह : जब अभिनेता पर्दे से उतरकर नागरिक बन जाता है

संदीप नाईक   ​एक अभिनेता, एक रंगकर्मी और असहमति की नैतिक आवाज़ ​भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार अपनी फ़िल्मों की संख्या से नहीं, बल्कि उन […] Read More

‘मट्टो की साइकिल’ : प्रश्नों के बीहड़ में भटकता मन

  ललन चतुर्वेदी   मेरे लिए ‘मट्टो’ की साइकिल’ देखना निजी अनुभवों और स्मृतियों से गुज़रना है। इसे देखते हुए मैंने इसके संवादों से अधिक […] Read More

‘दो बूँद पानी’ : भारतीय सिनेमा में पानी का एक मार्मिक आख्यान

मनीष वैद्य   आज से क़रीब पचास साल पहले जल संकट की भयावहता आज की तरह गंभीर भले ही न रही हो, लेकिन देश के […] Read More

‘लव-ऑल’ – जीवन में जीत के मायने : अमेय कान्त

Movie: Love-All बैडमिंटन और टेनिस में ज़ीरो पॉइंट को ‘लव’ कहा जाता है। इसका मूल फ़्रेंच शब्द ‘l’oeuf’ है, जिसका मतलब होता है – अंडा। […] Read More

ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्मों का दौर और राज कपूर : अमेय कान्त

राज कपूर एक ऐसा नाम हैं जिसके बिना भारतीय सिनेमा की कल्पना करना मुश्किल है. उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक अलग पहचान दी, उसे नई […] Read More

बदलते दौर में ‘भारतीय’ सिनेमा और रीमेक की ज़रूरत : अमेय कान्त

बदलते दौर में ‘भारतीय’ सिनेमा और रीमेक की ज़रूरत एक समय था जब ‘साउथ की फ़िल्म’ कहने पर रजनीकान्त की एक्शन फ़िल्में दिमाग में आती […] Read More