Christopher Nolan Filmography Part Three
नोलन की 2017 में रिलीज़ हुई ‘डनकर्क’ द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी थी. इसी शीर्षक और विषय पर 1958 में भी एक फ़िल्म बनी थी. ‘डनकर्क’ में 1940 के फ़्रांस के युद्ध (जर्मन सेनाओं और मित्र राष्ट्रों के बीच) के समय ब्रिटेन और फ़्रांस के तीन लाख से अधिक सैनिकों के फ़्रांस के डनकर्क समुद्रतट से वापस ब्रिटेन सुरक्षित लौटने की कहानी है. नोलन की यह फ़िल्म विश्व की श्रेष्ठ युद्ध फ़िल्मों में गिनी जाती है. यह फ़िल्म भी तीन टाइमलाइन पर एक साथ चलती है. एक टाइमलाइन डनकर्क पर फँसे सैनिकों की है जो एक हफ़्ते का समय दिखाती है. दूसरी टाइमलाइन आम नागरिकों की एक रेस्क्यू बोट की है जो अन्य कई नौकाओं की तरह इन सैनिकों के बचाव के लिए निकली है, इसमें एक दिन का समय दिखाया गया है. तीसरी टाइमलाइन ब्रिटिश एयरफ़ोर्स के विमानों की है जो एक घंटे का समय दिखाती है. अंत में तीनों टाइमलाइन एक-दूसरे के साथ मिल जाती है. जब एक बेहतरीन निर्देशक, बेहतरीन सिनेमैटोग्राफ़र और बेहतरीन संगीत निर्देशक एक साथ मिलते हैं तो परिणाम इसी तरह की फ़िल्मों के रूप में सामने आता है. सिनेमैटोग्राफ़ी एक बार फिर होयतेमा ने की थी, फ़िल्म आईमैक्स कैमरे पर फिल्माई गई थी जिस वजह से युद्ध के दृश्यों को बड़ी स्क्रीन पर देखना दर्शकों के लिए बेहद रोमांचक अनुभव रहा. फ़िल्म का दूसरा बेहद मज़बूत पक्ष था इसका संगीत. फ़िल्म में संवाद बहुत कम हैं और कहानी अंत तक दर्शक को बाँधे रखती है, वहीं इसका संगीत कहानी के तनाव को आखिर तक बनाए रखता है. संगीत हैंस ज़िमर ने दिया था जिसके लिए उन्हें साउंड एडिटिंग और साउंड मिक्सिंग के लिए उस वर्ष का ऑस्कर भी मिला. उन्होंने तीन अलग-अलग सप्तक के स्वरों की ध्वनियों को आरोही, अवरोही तथा समान परिमाण में रखकर उसका जो सम्मिलित प्रभाव पैदा किया, वह अद्भुत था. यह नोलन की पहली फ़िल्म थी जिसके लिए उन्हें श्रेष्ठ निर्देशक की श्रेणी में ऑस्कर के लिए नामांकित किया गया. फ़िल्म ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और भी ढेरों पुरस्कार जीते और आर्थिक रूप से भी बेहद सफ़ल रही. फ़िल्म का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें कोई भी हीरो या नायक नहीं है, इसमें मानवता है, जीवन मूल्य हैं. फ़िल्म मृत्यु के विरुद्ध जीवन की विजय की कहानी है.
साल 2020 में वे ‘टेनेट’ लेकर आए जो उनकी फ़िल्मों में टाइमलाइन की जटिलता का चरम था. अतीत में जाने की परिकल्पना इससे पहले भी हॉलीवुड की कई फ़िल्मों में की गई थी. लेकिन इस फ़िल्म में इसे भौतिकी के सिद्धांतों के आधार पर दिखाया गया. इसमें ‘इनवर्टेड एंट्रॉपी’ के ज़रिए बताया गया कि अगर किसी को भूतकाल में जाना है तो उसे पहले तो टर्नस्टाइल मशीन से गुज़रना होगा और उसके बाद हर चीज़ को विपरीत दिशा में करना होगा. इस फ़िल्म का एक भारतीय कनेक्शन भी था क्योंकि इसमें डिंपल कपाड़िया ने भी अहम भूमिका निभाई. मुख्य भूमिकाओं में जॉन डी वॉशिंगटन और रॉबर्ट पैटिंसन थे. कोविड महामारी के दौर में रिलीज़ होने के बावजूद इस फ़िल्म ने काफ़ी अच्छा कलेक्शन किया. ‘टेनेट’ को सर्वश्रेष्ठ विजुअल इफ़ेक्ट्स का ऑस्कर भी मिला. इस फ़िल्म की एक कमी भी थी कि भौतिकी की जटिलताओं को कहानी में पिरोने की कोशिश में फ़िल्म का भावनात्मक पक्ष कमज़ोर पड़ गया और फ़िल्म किसी कठिन रिसर्च पेपर की तरह हो गई जिसे समझने के लिए बार-बार पढ़ने की ज़रूरत होती है.
नोलन की पिछले साल आई फ़िल्म ‘ओपेनहाइमर’ की चर्चा इसकी रिलीज़ से बहुत पहले से हो रही थी. परमाणु बम के जनक जे रॉबर्ट ओपेनहाइमर पर बनी यह फ़िल्म नोलन की पहली बायोपिक फ़िल्म थी. इसलिए दर्शकों के मन में यह देखने के लिए भी उत्सुकता थी कि एक वैज्ञानिक के जीवन पर आधारित फ़िल्म को वे किस तरह बनाते हैं.
फ़िल्म में बताया गया कि किस तरह दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी सरकार ने वैज्ञानिक ओपेनहाइमर को परमाणु बम प्रोजेक्ट का अग्रणी बनाया. परमाणु बम के पहले परीक्षण के सफल होने और हिरोशिमा पर बम गिरने के बाद जब नागासाकी पर भी इस बम का इस्तेमाल किया गया तो ओपेनहाइमर ने अमेरिका की इन विनाशकारी नीतियों का विरोध किया जिसके बाद उन पर मुकदमा चलाया गया. फ़िल्म इसी मुकदमे की कार्रवाई से शुरू होती है और इससे पहले की कई घटनाएँ फ़्लैश बैक में देखने को मिलती हैं. इस फ़िल्म में उनकी चिर-परिचित शैली दिखाई देती है. इसे कलर और ब्लैक एंड व्हाइट, दो टाइमलाइन में फ़िल्माया गया है. कलर टाइमलाइन में दिखाई गई घटनाएँ ओपेनहाइमर के ‘सब्जेक्टिव’ नज़रिए से हैं जबकि ब्लैक एंड व्हाइट में हम लेविस स्ट्रॉस का नज़रिया देखते हैं. इस तरह कई घटनाएँ फ़िल्म में अलग-अलग समय पर दोनों टाइमलाइन में दिखाई देती हैं. फ़िल्म आईमैक्स कैमरों पर फ़िल्माई गई. ब्लैक एंड व्हाइट दृश्यों के फ़िल्मांकन के लिए अलग से ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म का इस्तेमाल किया गया. नोलन की यह फ़िल्म बेहद चर्चित हुई. इसे ऑस्कर की 13 श्रेणियों में नामांकित किया गया जिनमें से यह 7 में जीती. इस फ़िल्म के लिए क्रिस्टोफ़र नोलन को पहली बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का ऑस्कर पुरस्कार मिला.
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नोलन ने अपनी फ़िल्मों में स्पेशल इफ़ेक्ट्स का प्रयोग तभी किया जब उन्हें बहुत ज़रूरी लगा. उनकी प्राथमिकता हमेशा फ़िल्म को ज़्यादा से ज़्यादा वास्तविक स्थितियों में फ़िल्माने की रही. अपनी ख़ास शैली के लिए उन्हें आधुनिक फ़िल्म नोयर का मास्टर भी कहा जाता है. नोलन एक जोखिम लेने वाले, बेहद प्रतिभाशाली और प्रयोगवादी फ़िल्मकार हैं. अभी हमें देखना है कि आने वाले समय में वे दर्शकों के लिए और किस तरह की फ़िल्में लेकर आते हैं.
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