कहते हैं कि पिकासो की ‘गुएर्निका’ पेंटिंग को देखकर जब एक नाज़ी अफ़सर ने उनसे पूछा था कि “इसे तुमने बनाया?” तो उनका जवाब था “नहीं, तुमने।” मनुष्य अपने सबसे निर्मम रूप में कुछ ऐसी इबारतें लिख देता है जिनकी कर्कश गूँज हमेशा कानों में चुभती रहती है। इस साल जब ऑस्कर में रूस-यूक्रेन युद्ध पर बनी फ़िल्म ‘ट्वेंटी डेज़ इन मारियुपोल’ (20 Days in Mariupol) को बेस्ट डॉक्यूमेंट्री का अवॉर्ड मिला तो फ़िल्म के निर्देशक ने पुरस्कार लेते हुए कहा कि काश उन्होंने यह फ़िल्म बनाई ही न होती।
पिछले ही साल एक और फ़िल्म भी आई थी – ‘द ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट’ (The Zone of Interest) जो नाज़ियों द्वारा किए गए नरसंहार पर केंद्रित है। रूडोल्फ़ एक जर्मन अफ़सर है जिसका घर कंसंट्रेशन कैंप के बिल्कुल नज़दीक है। इस घर में उसका पूरा परिवार रहता है जहाँ इस अफ़सर, उसकी पत्नी, बच्चों और नौकरों का जीवन सहज ढंग से चल रहा है। घर बहुत सुंदर है। घर से लगी हुई एक विशाल दीवार है जिसके उस तरफ़ यहूदियों का यातना शिविर है। रूडोल्फ़ अपने साथी अफ़सरों के साथ कैंप की अमानवीय गतिविधियों को संचालित करता है। फ़िल्म में हमें उस तरफ़ की दुनिया दिखाई नहीं देती, सिर्फ़ उधर की आवाज़ें सुनाई देती हैं। गोली चलने की आवाज़ें, मारे जाने की आवाज़ें। हम सिर्फ़ आग देखते हैं, उसमें जले शरीरों को नहीं। हमें बस उनकी राख दिखाई देती है लेकिन इस राख से उठी गंध हम तक पहुँच जाती है।
ये दो दुनियाएँ हैं जिनमें से एक को इंसान के पागलपन ने रचा है। दीवार के उस तरफ़ की आवाज़ें भयभीत करती हैं। इस तरफ़ बगीचे हैं जिनमें कई सुंदर फूल हैं। अलग-अलग रंग के। एक सुंदर फूल का लाल रंग अचानक पूरी स्क्रीन पर फैल जाता है और रंग का अर्थ बदल जाता है। दीवार के इस तरफ़ की दुनिया देख रहा दर्शक इस अप्रत्याशित बदलाव के लिए तैयार नहीं है! बीच-बीच में थर्मल कैमरे से फ़िल्माए गए कुछ दृश्य ‘नेगेटिव फ़िल्म’ में हैं जिनमें एक बच्ची फल इकट्ठे करके अपनी साइकिल लेकर कैंप में जाती दिखाई देती है। वह फलों को कई जगहों पर छिपा देती है ताकि वहाँ काम करने वाले इन्हें ढूँढकर खा सकें। ये दृश्य जैसे किसी और दुनिया के हैं जो दो बिल्कुल अलग दुनियाओं के बीच में है। निर्देशक ने इन्हें फ़िल्म के बाकी रंगीन दृश्यों के बीच में दिखाकर एक अलग तरह का प्रभाव पैदा किया है।
आखिरी दृश्यों में रूडोल्फ़ एक इमारत की सीढ़ियों से नीचे उतर रहा है। इमारत में सन्नाटा छाया हुआ है। वह एक जगह ठहरकर गलियारे में देखता है। अतीत के इस अँधेरे गलियारे में बहुत भीतर थोड़ी सी रोशनी दिखाई देती है जो हमें वर्त्तमान में लेकर आती है। वर्त्तमान चुप है। हम मारे गए लोगों की बची रह गईं चीज़ों को देखते हैं। फ़िल्म ख़त्म होने के बाद हमारे पास दीवार के उस तरफ़ की आवाज़ें बची रह जाती हैं। जिन लोगों को हमने नहीं देखा, उनकी चीखें हमारा पीछा करती हैं।
मार्टिन एमिस के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म को जोनाथन ग्लैज़र ने निर्देशित किया। इसका निर्माण अमेरिका, ब्रिटेन और पोलैंड के सहयोग से हुआ। फ़िल्म को बेस्ट इंटरनेशनल फ़ीचर फ़िल्म और बेस्ट साउंड श्रेणियों में ऑस्कर पुरस्कार मिले। सैन्ड्रा ह्युलर के लिए यह साल महत्वपूर्ण रहा क्योंकि उन्होंने ‘एनैटमी ऑफ़ अ फ़ॉल’ और ‘द ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट’ जैसी दो अहम फ़िल्मों में काम किया। आश्वित्ज़ पर बनी यह फ़िल्म दृश्य कम दिखाती है, लेकिन गहरा असर छोड़ती है। जर्मन अफ़सर रूडोल्फ़ और कैंप में फल छुपाने वाली पोलिश लड़की के किरदार असल ज़िंदगी से प्रेरित थे। निर्देशक इस फ़िल्म के निर्माण के समय इस महिला एलेक्ज़ेंड्रिया से भी मिले जो उस समय तकरीबन नब्बे साल की थीं। फ़िल्म रिलीज़ होने तक वे गुज़र चुकी थीं। फ़िल्म में जिस लड़की ने उनका किरदार निभाया उसके लिए एलेक्ज़ेंड्रिया की ही पुरानी साइकिल और कपड़े इस्तेमाल किए गए।
अंग्रेज़ी उपन्यास ‘हार्ट ऑफ़ डार्कनेस’ का एक मुख्य पात्र कर्ट्ज़ मरते हुए आखिरी शब्द कहता है, ‘द हॉरर, द हॉरर’। इस फ़िल्म को देखने के बाद भी हमारे साथ यही एहसास बाकी रह जाता है। डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘ट्वेंटी डेज़ इन मारियुपोल’ में हमारा आज है, अपने सबसे भयानक रूप में। इसमें एक देश का हुक्मरान दूसरे देश के बेकसूर लोगों को अपना निशाना बना रहा है। ‘द ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट’ के लिए पुरस्कार लेते हुए ग्लैज़र ने गाज़ा में हुई अमानवीयता का ज़िक्र भी किया।
दोनों फ़िल्मों की घटनाओं के बीच करीब अस्सी साल का अंतर है। सवाल उठता है कि अतीत के अंधेरे गलियारे के भीतर दिखाई दे रही उस रोशनी का क्या हुआ।
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(‘The Zone of Interest’ को इस समय प्राइम वीडियो और ’20 Days in Mariupol’ को यूट्यूब पर देखा जा सकता है।)
