‘A Real Pain’ – ठहरे पानी के बीच से चुपचाप गुज़रते हुए : अमेय कान्त

A Real Pain

अतीत कई जगहों पर तकलीफ़देह होता है। कभी-कभी तो इतना कि इसकी टीस पीढ़ियों तक महसूस होती रहती है। लेकिन क्या सच में ऐसा है? क्या कुछ चीज़ें सिर्फ़ दर्शक बनकर उनसे गुज़र जाने भर के लिए होती हैं? क्या यह संभव है कि हम इस अतीत के पास बहुत धीरे से जाकर उस ठहरे हुए पानी के बीच से बिना कोई आवाज़ किए गुज़रने की कोशिश करें?

जेसी आइज़ेनबर्ग की फ़िल्म ‘अ रियल पेन’ इन्हीं सवालों से दो-चार होने की कोशिश करती है।

डेविड और बेंजमिन (बेंजी) चचेरे भाई हैं जो अमेरिका में रहते हैं। डेविड के पास एक अच्छी नौकरी है, बीवी-बच्चे हैं। बेंजी फक्कड़ किस्म का इंसान है। उसके पास न तो नौकरी है, न खुद का परिवार। ये दोनों भाई लंबे समय बाद मिलते हैं और पोलैंड की यात्रा पर एक साथ जाते हैं जहाँ वे अपने पुरखों की विरासत से दोबारा जुड़ना चाहते हैं, साथ ही अपनी दिवंगत दादी के बचपन के घर को देखना चाहते हैं।

इस फ़िल्म के निर्देशक जेसी आइज़ेनबर्ग साल 2010 में निर्देशक डेविड फ़िंचर की फ़िल्म ‘द सोशल नेटवर्क’ में मार्क ज़ुकरबर्ग की भूमिका में काफ़ी चर्चित हुए थे। ‘फ़ेसबुक’ एक यूनिवर्सिटी में शुरू होकर अपने आज के स्वरूप में किस तरह आया, इस पूरे सफ़र में आए उतार-चढ़ावों के साथ ज़ुकरबर्ग के निजी जीवन के पहलुओं को भी इस फ़िल्म में नज़दीक से दिखाया गया था। इस फ़िल्म के बाद आइज़ेनबर्ग ने ‘जस्टिस लीग’ समेत दर्जनों फ़िल्मों में अलग-अलग भूमिकाएँ निभाईं। पिछले साल वे ‘अ रियल पेन’ में मुख्य भूमिका में नज़र आए जिसका निर्देशन भी उन्होंने खुद ही किया।

इस फ़िल्म की कहानी डेविड और बेंजी की पोलैंड यात्रा की कहानी तो है ही, बल्कि उनकी स्मृतियों, पीढ़ियों के दर्द, आत्म-संघर्ष और भावनात्मक विस्फोटों की कहानी भी है। यह होलोकॉस्ट की भयावहता को छूती है, लेकिन बोझिल हुए बिना। आइज़ेनबर्ग ने इसे तीसरी पीढ़ी के उन अमेरिकियों के नज़रिए से बताया है जो अपने पूर्वजों की पीड़ा को समझना चाहते हैं, उससे आँखें मिलाना चाहते हैं। उस अतीत से, जिससे उनके पुरखे या तो बचकर निकल आए या फिर चुपचाप जीवन काटते रहे।

बेंजी बहुत बेबाक किस्म का इंसान है। कई मौकों पर अपने भीतर से आने वाली प्रतिक्रियाओं को वह रोक नहीं पाता। होलोकॉस्ट स्मारक को देखने के लिए एयर कंडीशनर डिब्बे में बैठकर जाना उसे असहज कर देता है। वह उस पीड़ा को भीतर से महसूस करना चाहता है, किसी बाहरी इंसान की तरह नहीं। जेम्स उनके टूर का गाइड है। लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है, वह सिर्फ़ ब्यौरे देने में लगा रहता है। मृतकों की संख्या भी उसके लिए एक आँकड़ा भर है। यह संवेदनाहीनता बेंजी के लिए बहुत तकलीफ़देह है। वह जेम्स को डपट देता है। बेंजी के किरदार की कई परतें हैं। अतीत में वह आत्महत्या की कोशिश भी कर चुका है। इस घटना के बाद से डेविड और उसके बीच की दूरियाँ बढ़ने लगीं। दोनों के व्यक्तित्व में बहुत फ़र्क है। बेंजी डेविड को उनके पुराने जोश और उत्साह को खोने के लिए ताने मारता है, वहीं डेविड को बेंजी की बेतरतीबी और दिशाहीन ढंग से जीना बहुत खलता है।

बेंजी की भूमिका को कीरन कल्किन ने बेहतरीन ढंग से निभाया है। इसके लिए उन्हें पिछले साल ‘बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर’ का ऑस्कर पुरस्कार भी मिला था।

यह उस तरह की फ़िल्म है जो बिना किसी शोर-शराबे के सीधे हमारे भीतर दाखिल हो जाती है, साथ ही वर्तमान और अतीत के बीच एक संतुलन साधकर भी चलती है। यह फ़िल्म सिर्फ़ पोलैंड की सड़कों पर बस के सफ़र को लेकर नहीं है बल्कि उस भीतरी यात्रा के बारे में भी है जो हम सब कभी न कभी करते हैं – अपने अतीत से मिलकर और उन धीमी आवाज़ों को सुनकर जो आमतौर पर अनसुनी रह जाती हैं।

इस तरह की फ़िल्में हमारी स्मृति में रहती हैं। संवेदनाओं की तरह भी, सवाल की तरह भी।

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