शेखर सुमन को स्कूल के दिनों में सबसे पहले दूरदर्शन के लोकप्रिय धारावाहिक ‘रिपोर्टर’ में देखा था। हालाँकि इससे काफ़ी पहले वे शशि कपूर की फ़िल्म ‘उत्सव’ में मुख्य भूमिका में रहे और दूरदर्शन पर एक अन्य धारावाहिक से शुरुआत कर चुके थे। लेकिन मेरी पीढ़ी के बहुत से दर्शकों के लिए उनकी पहचान ‘रिपोर्टर’ से ही बनी। उस समय दूरदर्शन का दौर था और किसी कलाकार का घर-घर तक पहुँचना किसी एक सफल धारावाहिक से ही संभव हो जाता था। ‘रिपोर्टर’ को दर्शकों ने ख़ूब पसंद किया और शेखर सुमन एक जाना-पहचाना चेहरा बन गए।
इसके बाद वे कॉमेडी धारावाहिक ‘देख भाई देख’ में वे एक प्रमुख भूमिका में नज़र आए। यह धारावाहिक भी अपने समय के सबसे लोकप्रिय कार्यक्रमों में था। लेकिन शेखर सुमन की छवि को जिस शो ने सबसे अलग पहचान दी, वह था ‘मूवर्स एंड शेकर्स’। 1997 के आसपास शुरू हुआ यह कार्यक्रम भारतीय टेलीविजन के इतिहास में एक दिलचस्प प्रयोग था। उस दौर में न तो सोशल मीडिया था, न यूट्यूब और न ही स्डैंड अप कॉमेडी के लिए अलग से कोई मंच था। मनोरंजन और समसामयिक व्यंग्य के लिए टेलीविजन ही सबसे बड़ा माध्यम हुआ करता था। शायद यही वजह थी कि नए साल की पूर्व संध्या पर आने वाले हास्य कार्यक्रम का भी बेसब्री से इंतज़ार रहता था।
निजी चैनलों के आने के बाद ‘सोनी’ पर प्रसारित होने वाले अपने शो ‘मूवर्स एंड शेकर्स’ में शेखर सुमन अपने ख़ास अंदाज़ में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक घटनाओं पर चुटीली टिप्पणियाँ करते थे। शो की एक और ख़ासियत थी कि इसके हर एपिसोड में किसी न किसी चर्चित शख्सियत को आमंत्रित किया जाता था और उनसे हल्की-फुल्की लेकिन दिलचस्प बातचीत होती थी। आज के कई स्थापित कलाकार इस शो में नज़र आए जो उस समय अपने करियर के शुरुआती दौर में थे। कार्यक्रम में शेखर के साथ एक बैंड भी होता था जिसका नाम ‘रबर बैंड’ था। संगीत, व्यंग्य और बातचीत का यह मेल उस समय के भारतीय टेलीविजन पर कुछ नया-सा लगता था। शो के लेखकों की इसमें अहम भूमिका थी। राजीव निगम जैसे कॉमेडियन भी उस दौर में इसके लेखन से जुड़े।
शेखर सुमन की मिमिक्री भी इस शो का एक बड़ा आकर्षण थी। वे कई मशहूर हस्तियों की नकल बड़ी सहजता से कर लेते थे। उस दौर में लालू प्रसाद यादव और अटल बिहारी वाजपेयी उनके सबसे लोकप्रिय किरदारों में थे। अटल जी की शैली में बोला गया उनका वाक्य ‘ये अच्छी बात नहीं है’ इतना चर्चित हुआ कि दर्शकों की ज़ुबान पर चढ़ गया।
बाद के सालों में ‘मूवर्स एंड शेकर्स’ के कुछ और संस्करण भी आए, लेकिन शुरुआती दौर जैसी लोकप्रियता और ताज़गी फिर दिखाई नहीं दी। धीरे-धीरे यह शो छोटे परदे से ग़ायब हो गया। हालाँकि इस दौरान शेखर सुमन की मौजूदगी लगातार बनी रही। वे फ़िल्मों और टेलीविजन पर समय-समय पर दिखाई देते रहे। कई कॉमेडी और टैलेंट शोज़ में उन्होंने जज की भूमिका भी निभाई। इसी दौरान भारतीय कॉमेडी का परिदृश्य भी बदलता गया। नए कलाकार सामने आए, स्टैंड अप कॉमेडी एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित हुई और कपिल शर्मा, सुनील ग्रोवर, राजू श्रीवास्तव जैसे कलाकारों ने अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की।
इसलिए जब करीब 14 सालों के लंबे फ़ासले के बाद शेखर ने अपने शो ‘शेखर टुनाइट’ के साथ वापसी की, तो इसका ध्यान खींचना स्वाभाविक था। इस शो के निर्माता उनके बेटे अध्ययन सुमन हैं। दिलचस्प यह भी है कि इस बार यह शो यूट्यूब पर प्रसारित हो रहा है। यूट्यूब और सोशल मीडिया ने पिछले एक दशक में मनोरंजन की दुनिया का नक्शा बदल दिया है। दर्शकों को अब टीवी की बनिस्बत मोबाइल स्क्रीन पर ज़्यादा दिलचस्प और अच्छी सामग्री मिलने लगी है। ऐसे समय में शेखर सुमन का यूट्यूब के ज़रिए लौटना कहीं न कहीं समय के साथ कदम मिलाने की कोशिश भी है।
अब तक शेखर टुनाइट के कुछ एपिसोड प्रसारित हो चुके हैं और उन्हें लेकर चर्चा भी हुई है। लेकिन इस बार शेखर सुमन को देखते हुए समय बीतने का एहसास भी होता है। उनके चेहरे पर उम्र की थकान दिखाई देती है। अब वह पहले जैसी फुर्ती और चंचलता नहीं है जो ‘मूवर्स एंड शेकर्स’ के दौर में दिखाई देती थी। उनकी भीतर धँसती आँखों को लेकर भी दर्शकों ने टिप्पणियाँ की हैं जिसका उल्लेख उन्होंने खुद एक एपिसोड के दौरान किया था।
इसके बावजूद उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष अब भी मौजूद है, और वह है – लोगों और घटनाओं को देखने की उनकी व्यंग्यात्मक दृष्टि। चुटकी लेने का उनका अंदाज़ आज भी वैसा ही है, बल्कि उसमें अब पहले की तुलना में ज़्यादा गंभीरता और ठहराव दिखाई देता है। शायद यह उनकी उम्र और अनुभव, दोनों का असर है। शो का फ़ॉर्मेट काफ़ी कुछ पहले जैसा ही है। ‘रबर बैंड’ की जगह अब ‘द बैंड स्टैंड’ है।
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न दर्शकों की संख्या का है। सवाल यही है कि इस प्रतिस्पर्धी डिजिटल युग में क्या शेखर सुमन अपना दर्शक वर्ग बना पाएँगे, या फिर पुराने दर्शक वर्ग को फिर से अपनी ओर खींच पाएँगे? क्या वे उन युवाओं तक पहुँच पाएँगे जिन्होंने ‘मूवर्स एंड शेकर्स’ का दौर कभी देखा ही नहीं? और सबसे बड़ी बात यह कि क्या वे कपिल शर्मा शो जैसे बेहद लोकप्रिय कार्यक्रमों के बीच अपनी जगह बना पाएँगे? यह बता पाना अभी मुश्किल है।
फ़िलहाल इतना कहा जा सकता है कि शेखर टुनाइट में शेखर सुमन ने बड़े ही बेबाक तेवर अपनाए हैं। वे राजनीतिक घटनाओं और सरकार की नीतियों पर सीधे टिप्पणी करने से बचते हुए दिखाई नहीं देते। यही बात शो को दिलचस्प बनाती है। (और इसके भविष्य को लेकर जिज्ञासा भी पैदा करती है)! ऐसे समय में, जब मुख्यधारा के मनोरंजन कार्यक्रम अक्सर राजनीतिक व्यंग्य से दूरी बनाए रखते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा कि इस अंदाज़ और तेवर के साथ यह शो कितने समय तक अपनी जगह बनाए रख पाता है।
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