अब्बास किआरोस्तामी के सिनेमा से गुज़रते हुए
सुदीप सोहनी
इस समय जिस ईरान से दुनिया का परिचय हो रहा है और जिन कारणों से हो रहा है – मेरे लिए उस ईरान तक पहुँचने के दो कारण रहे। एक तो बचपन में जब स्कूल में मेसोपोटामिया की सभ्यता जैसे कुछ पढ़ने को मिला तो वहाँ ईरान का नाम अन्य क्षेत्रों के साथ पढ़ा, जिसकी स्मृति, कल्पना में आज भी बनी हुई है। और दूसरा, जब फ़िल्म इन्स्टीट्यूट में पढ़ने गया तो जिस सिनेमा ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया वह ईरानी सिनेमा ही रहा। ईरान के सिनेमा ने जो राह बीती सदी के अस्सी के दशक में पकड़ी थी, वह आधुनिक सिनेमा इतिहास में मिसाल ही थी। संभवतः विश्व सिनेमा इतिहास का सबसे ताज़ा अध्याय ईरानी सिनेमा को माना जा सकता है। मासूमियत से लबरेज़ दैनिक जीवन की खट्टी-मीठी घटनाओं और असाधारण चेहरे-मोहरे वाले बाल कलाकारों के अभिनय से भरी कहानियाँ सिनेमा कला और दुनिया को इस मुल्क की अद्भुत भेंट हैं। इसके साथ ही जिस इंसानी जज़्बात को सिनेमा बनाने वालों ने अपने यहाँ प्रयोग किया, वह है – वार्तालाप। जहाँ आज दुनिया भर की डिप्लोमेसी और नेता युद्ध के बाद डायलॉग या बातचीत का रास्ता अपनाने पर ज़ोर देते हैं, वह सिनेमा जैसी विजुअल ओरिएन्टेड विधा में ईरानी सिनेमा के निर्देशकों ने अपने यहाँ की कहानियों में प्रमुखता से खोजी। खोजी इसलिए क्योंकि सिनेमा के इतिहास में चाहे वह अमेरिकन सिनेमा हो, यूरोपियन, जापानी, कोरियन या भारतीय ही; वह ड्रामा ओरिएन्टेड ज़्यादा है। चरित्र, घटनाएँ, पात्र, एस्थेटिक्स, प्रयोग, संगीत या किसी रूप में। ईरानी सिनेमा में लंबे और उबाऊ दृश्य या घटनाएँ, पात्रों की स्थिति, घटनाक्रम बहुत जगह बातचीत की इस युक्ति से हल हुए हैं।
अब्बास किआरोस्तामी के यहाँ यह बातचीत, सरलता, ईमानदारी और फैलाव दिखता है। 22 जून उनका जन्मदिन होता है। ‘व्हेअर इस द फ़्रेंड्स होम’, ‘क्लोज़ अप’, ‘टेस्ट ऑफ़ चेरी’, ‘द विंड विल कैरी अस’, ‘सर्टिफ़ाइड कॉपी’ आदि उनकी प्रमुख फ़िल्में हैं, जिन्हें सिनेमा प्रेमी हमेशा ही अपनी प्रिय फ़िल्मों की फ़ेहरिस्त में रखेगा ही। ईरान के सिनेमा को चोटी पर पहुँचाने और विश्व स्तर का बनाने वाले फ़िल्मकारों की सूची की शुरुआत किआरोस्तामी से होती है जो आगे चलकर जाफ़र पनाही, बोहमान घोबादी, माजिद मजीदी, असगर फ़रहादी आदि निर्देशकों तक पहुँचती है। ईरान का सिनेमा सादगी को परदे पर रचता है पर उसके पीछे उस महान सभ्यता का पतन और सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों का बराबर बना रहा आग्रह है जिसकी सिसकियाँ इन फ़िल्मों का हिस्सा रहीं। पर किआरोस्तामी कभी भी हार मानने वाले फ़िल्मकार नहीं रहे, उनकी फ़िल्मों के प्रमुख स्वर हमेशा से अनकहे की खोज रहे। मुख्य रूप से किआरोस्तामी की फ़िल्में जीवन और मृत्यु, आध्यात्म, नैतिकता, सच और झूठ के बीच की जगह और ईरान की परिस्थितियों में कला का सच और गहराई ढूँढती रहती हैं। ‘इमेजिनेशन’ उनका प्रिय विषय रहा और सड़कों से लेकर गलियों तक यूँ ही भटकते हुए जीवन के गहरे अनुभव से मिलना उनका शौक।
इस माने में ‘व्हेअर इस द फ्रेंड्स होम’ एक अनूठी फ़िल्म है जो फ़िल्म के नायक अहमद के ज़रिये उस जीवन को दिखाती है जहाँ सच्चाई से उपजता भोलापन भी है, जीवन का गहन चिंतन भी और नैतिकता का पाठ भी। एक बच्चे की इच्छा कितनी मासूम हो सकती है जिसे गलती से अपने पास आ गई अपने क्लासमेट की नोटबुक लौटाने का जुनून केवल इसलिए है क्योंकि उस नोटबुक की अनुपस्थिति में उस मित्र को स्कूल से निकाला भी जा सकता है। बाल मन की परतों को इसी तरह उधेड़ती जाफ़र पनाही की ‘व्हाइट बलून’ और माजिद मजीदी की ‘चिल्ड्रेन ऑफ हेवन’ के बीज किआरोस्तामी की इसी फ़िल्म से अपने रिश्ते जोड़ते हैं। कोकर की गलियों में रास्ते तलाशते हुए अहमद का जानवरों के निकलने का इंतज़ार करना या फिर रास्ते में किसी घर से कपड़ा गिरते हुए देखकर उसे वापस लौटाना या ठीक उसी समय अपनी उम्र के बच्चे को पानी से भारी बाल्टी उठाते देखने वाले दृश्य सिनेमा माध्यम में दिखाये जाने पर दर्शक से जो संवाद करते हैं, वह कमाल किआरोस्तामी का सिनेमा ही करता है।
हॉलीवुड में कथा को लेकर एक ‘पैटर्न फ़ॉलो’ किया जाता है जिसमें घटनाएँ और किरदार के प्रयास कहानी को आगे बढ़ाते हैं। ईरानी सिनेमा में ज़िंदगी हमेशा जीतती है और सच पानी के बुलबुलों की तरह धीरे-धीरे आता है। ‘द विंड विल कैरी अस’ इच्छाओं को सुनती हुई जीवन की उसी तलाश का हिस्सा है जिसमें सपने साँस लेते हैं। यायावरों की तरह चल देना और रास्ते तय करते हुए जीना उनके सिनेमा का अभिन्न अंग है जब थोड़ी कल्पना, थोड़ी हक़ीक़त, थोड़े फ़साने, अस्थिरता, कहीं नहीं पहुँचने की जल्दी उनका मज़ा है। किसी दूसरे को जीना और उसके बहाने जीवन के रहस्यों की पड़ताल उनके किरदारों का प्रिय शगल भी है जो ‘द विंड….’ और ‘क्लोज़ अप’ में दिखाई देता है।
सही मानों में किआरोस्तामी का सिनेमा कविताई सिनेमा है, जो कला की दुनिया से जीवन के गहरे और अनदेखे अर्थ खोजता है। ‘क्लोज़ अप’ मनुष्य की उस आदिम इच्छा का सिनेमाई दस्तावेज़ है जब वह किसी और के जीवन को जीना चाहता है। डॉक्यूमेंट्री और फ़ीचर के मिश्रण में यह फ़िल्म रुई के फ़ाहे से संवेदनाओं को झकझोरती है। यही ईरान के सिनेमा की ख़ासियत भी है जब न केवल यहाँ बल्कि ‘द व्हाइट बलून’, ‘द सर्कल’, ‘बरान’ ‘राइनो सीज़न’, ‘सॉन्ग ऑफ़ स्पैरो’, ‘अ सेपरेशन’ जैसी फ़िल्मों में ईरान का समाज और लोग त्रासदी, बर्बादी और विकास की दौड़ में सदियों पीछे रह जाने की पीड़ा के बाद भी मनुष्यता से भरे और ऊर्जा से लबरेज़ दिखाई देते हैं।
पर केवल सतह का सच ही किआरोस्तामी का सिनेमा नहीं, उनके दूर के अर्थ सच और झूठ के बीच की रेखा से होकर गुज़रते हैं। रहस्यों को खोजती आँखें हर किरदार की आत्मा को टटोलती हैं और जिसके लिए ये किरदार उनकी फ़िल्म में मरने के बाद के जीवन की खोज करने से भी नहीं हिचकते। ‘टेस्ट ऑफ़ चैरी’ का भीतरी शोर इसी चुप्पी की तलाश है, जिसका द्वंद्व उस आत्मिक सुख से है जो उसने महसूस नहीं किया है।
अब्बास किआरोस्तामी का सिनेमा न केवल आश्वस्त करता है बल्कि जूझने का दम भी देता है और तमाम मुश्किलों के बावजूद अंधेरे से उजाले की लकीरें भी खींचता है। किरदारों का बात करते हुए सिनेमा का हिस्सा बनने की तकनीक, कविताई सिनेमा और मॉडर्निज़्म वोंग कार वाई जैसे निर्देशकों की फ़िल्मों तक भी आता है। इन फ़िल्मों में जीवन का स्पेस, गति और ठहराव, संशय और रहस्य इनकी दर्शनीयता की ताक़त हैं। यथार्थवाद से परे किसी दूसरी दुनिया, सूफ़ी कवि, कवितायें, दर्शन और इच्छाओं के रास्ते दाखिल होते अब्बास का सिनेमा तारकोव्स्की के सिनेमा के बाद आधुनिक समय में इस विधा की नई व्याख्या करता है। पानी पीना और प्यास बुझना दो अलग बातें हैं; किआरोस्तामी का सिनेमा इसी के पीछे सफ़र करता दिखता है।
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सुदीप सोहनी
सुदीप सोहनी भारतीय फ़िल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे के वर्ष 2013-14 के छात्र हैं। वे कवि, पटकथा लेखक, निर्देशक, परिकल्पक और सलाहकार के रूप में सिनेमा, साहित्य तथा संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय हैं। ‘नीहसो’ उपनाम से कविताएँ लिखते हैं और देश की प्रमुख पत्रिकाओं, अखबारों तथा वेबसाइट्स में नियमित रूप से लिखते रहते हैं।
उनकी लघु फिल्म ‘#itoo’, डॉक्यूमेंट्री ‘तनिष्का’ और लघु डॉक्यूमेंट्री ‘यादों में गणगौर’ को भारत और विदेशों के कई फिल्म समारोहों में सम्मान एवं सराहना मिले हैं। उन्होंने मध्य प्रदेश के पद्मश्री कलाकारों पर जनजातीय संग्रहालय के लिए फ़िल्मों का लेखन व सह-निर्देशन किया है। हाल ही में ‘जग्गू और मागाहारी’ शॉर्ट फ़िल्म का निर्माण और निर्देशन भी किया है। ‘सिनेकारी’ नाम से सिनेमा पर केंद्रित आयोजन नियमित रूप से कर रहे हैं।
उनका कविता संग्रह ‘मन्थर होती प्रार्थना’ (2023) और मोनोग्राफ़ ‘साहित्य, सिनेमा और समय’ (2019) प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा सिनेमा पर लेखन के लिए ‘पुनर्नवा पुरस्कार’ एवं कविता के लिए ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ से तथा रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय भोपाल द्वारा जूनियर टैगोर फ़ेलोशिप (2019), सिने समालोचना के लिए प्रथम विष्णु खरे स्मृति सम्मान (2022) से सम्मानित किया जा चुका है।
संपर्क : sudeepsohnifilms@gmail.com
