साइंस फ़िक्शन और भविष्य की कल्पनाएँ (Dune Part Two Review Hindi) : अमेय कान्त

Dune Part Two Review Hindi

 

“Even if humans are short-term thinkers, fiction can anticipate and extrapolate into multiple versions of the future.”

Margaret Atwood (Canadian writer)

 

फ़्रैंक हर्बर्ट (Frank Herbert) ने 1965 में एक साइंस फ़िक्शन उपन्यास लिखा था – ‘ड्यून’ (Dune). बाद में उन्होंने इसी शृंखला को आगे बढ़ाते हुए कुल 6 उपन्यास लिखे. ‘ड्यून’ के लिए हर्बर्ट को साइंस फ़िक्शन उपन्यासों के लिए दिया जाने वाला ह्यूगो पुरस्कार भी मिला. इन उपन्यासों में आज से लगभग आठ-दस हज़ार साल बाद के ऐसे समय की कल्पना की गई थी जब मानव को प्रकाश से अधिक गति से चलने के तरीके मिल चुके होंगे. आम साई-फ़ाई उपन्यासों की तरह हर्बर्ट की कल्पना का भविष्य इस मायने में अलग था कि इसमें कंप्यूटरों जैसी कोई मशीन नहीं थी. भविष्य की इस दुनिया में मनुष्य की तरह सोचने में सक्षम किसी भी तरह की मशीन का प्रयोग वर्जित था और इसका इस्तेमाल करने या रखने पर सीधे मौत की सज़ा मिलती थी. दिलचस्प बात है कि हर्बर्ट ने जब यह कल्पना की थी तब तकनीक का यह खतरा प्रत्यक्ष ढंग से इस तरह सामने नहीं आया था जैसा आज के एआई युग में हम देख रहे हैं.

आज हम दुनिया को जिस दिशा में लेकर जा रहे हैं, उसमें इस तरह की कल्पनाओं का यथार्थ में बदलना अब बहुत दूर की बात नहीं लगती. भविष्य के बारे में बात करने वाली कई किताबों और फ़िल्मों में बताई गई चीज़ें आगे जाकर सही साबित हो गईं. ‘2001 – अ स्पेस ऑडिसी’, ‘ब्लेड रनर’ और ऐसी कई फ़िल्मों में की गई कल्पनाएँ आगे जाकर साकार होती देखी गईं. 2011 में आई स्टीवन सोडरबर्ग की फ़िल्म ‘कंटेजन’ में चमगादड़ से पनपे एक वायरस से फैली घातक महामारी के बारे में बताया गया था. आगे जाकर हमने देखा कि ऐसे ही एक जानलेवा वायरस ने किस तरह पूरी दुनिया को उथल-पुथल कर दिया.

डिस्टोपियन समाज की कल्पना वाले उपन्यासों के समांतर साइंस फ़िक्शन में कई उपन्यास लिखे गए जिन पर फ़िल्में भी बनती रहीं. इनमें दुनिया से लेकर ब्रह्मांड तक को भी एक तरह के डिस्टोपियन रूप में दिखाया गया. क्रिस्टोफ़र नोलन की चर्चित फिल्म ‘इंटरस्टेलर’ में ऐसे भविष्य की कल्पना थी जब पृथ्वी का पर्यावरण बिगड़ चुका है और इंसान दूसरे ग्रहों में बसने की संभावनाएँ तलाश रहा है. चर्चित और पुरस्कृत एनिमेटेड फ़िल्म ‘वॉल-ई’ के केंद्र में भी यही विचार था. जेम्स कैमरोन की ‘अवतार’ फ़िल्मों में पृथ्वीवासी दूसरे सौरमंडल के एक चंद्रमा ‘पैंडोरा’ पर जाकर वहाँ के संसाधनों का दोहन करते हैं और वहाँ के मूल निवासी ‘नावियों’ को बर्बाद करते हैं. कुछ समय पहले प्राइम वीडियो पर आई सिरीज़ ‘द एक्स्पैंस’ (The Expanse) भी एक उपन्यास पर आधारित थी जिसमें इसी तरह के भविष्य की कल्पना की गई थी. इसमें बताया गया था कि इंसान पृथ्वी के अलावा सौर मंडल में और भी कई जगहों पर रहने लगा है. वह इससे बाहर जाकर बसने की जगहें भी खोज रहा है. लेकिन संभावनाओं के इस विस्तार के साथ-साथ मानव के लालच और आपसी संघर्षों का भी विस्तार हो गया है. उसकी मूल प्रवृत्तियाँ वही हैं. इस वेब-सिरीज़ में सौर मंडल के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले समूह एक विलक्षण तत्व ‘प्रोटोमॉलीक्यूल’ को हासिल करना चाहते हैं.

‘द एक्स्पैंस’ का ‘प्रोटोमॉलीक्यूल’ शायद कहीं न कहीं ‘ड्यून’ के ‘स्पाइस’ (जिसे हिंदी डबिंग में ‘खनिज’ कहा गया है) से प्रेरित था. ‘ड्यून’ (हिंदी में जिसका अर्थ है ‘रेत का टीला’) की दुनिया काफ़ी अजीब है. इसमें एक तरफ़ तो इंसान चाँद-सितारों से आगे की दूरियाँ तय कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ अपनी ईजाद की गई कई तकनीकों को वह नकार चुका है. उसकी आंतरिक क्षमताएँ कहीं आगे निकल चुकी हैं. अपने सिक्स्थ सेन्स को वह काफ़ी विकसित कर चुका है. ‘ड्यून’ की कहानी में पृथ्वी नहीं है. इंसान और मशीनी लड़ाई के अपने चरम पर पहुँचने के बाद पृथ्वी पर अब कुछ बाकी नहीं रह गया है. लोग पृथ्वी जैसे ग्रहों पर रहते हैं. अरैकिस पर स्पाइस (खनिज) बहुतायत में मिलता है. इस खनिज की खासियत है कि इससे मनुष्य लंबी उम्र जी सकता है, और इसकी मदद से अंतरिक्ष में सफ़र भी कर सकता है.

इस उपन्यास पर पहली बार 1984 में फ़िल्म बनी थी. नई तकनीकों के साथ 2021 में वार्नर ब्रदर्स इसी कहानी को हमारे सामने एक बार फिर लेकर आए. ‘ड्यून’ के पहले भाग को इसकी सिनेमैटोग्राफ़ी और संगीत के लिए काफ़ी पंसद किया गया. इसे ऑस्कर की दस श्रेणियों में नॉमिनेशन मिले और छह में यह जीती भी.

‘ड्यून’ की कहानी के केंद्र में इसका नायक पॉल एट्रीडिस है. उसे सपनों में भविष्य की छवियाँ दिखाई देती हैं. उसकी माँ को भी इसी तरह की क्षमताएँ हासिल हैं. पहले भाग में दिखाया गया था कि किस तरह परमवंशियों द्वारा कैलेडन पर रहने वाले एट्रीडिस घराने को अरैकिस की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है. अरैकिस के मूल निवासी फ़्रेमेन हैं. किसी समय अरैकिस का शासन हार्कोनन के पास था जो वहाँ से बड़ी तादाद में खनिज निकालते रहे. इसी बीच एट्रीडिस पर हमला हो जाता है. पॉल के पिता मारे जाते हैं और पॉल को अपनी माँ के साथ अरैकिस के रेगिस्तान में भटकना पड़ता है. पहले भाग में पॉल फ़्रेमेन के साथ मिलकर लड़ने की तैयारी करता है. ‘ड्यून–2’ (Dune Part Two) की कहानी इससे आगे की है. चानी से मिलने के बाद पॉल अपने सपनों में देखी छवियों को सच होते देखता है. पॉल को साबित करना है कि वह फ़्रेमेन का हिस्सा बन सकता है. एक भविष्यवाणी के अनुसार किसी दिन अरैकिस पर कोई मसीहा आएगा जो उन्हें उनके दुखों से निजात दिलाएगा. फ़्रेमेन के कई लोग पॉल में इसी मसीहा की झलक देखते हैं. चानी को इस सब पर यकीन नहीं है. इस बीच हार्कोनन अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं. कहानी धीरे-धीरे एक बड़े टकराव की तरफ़ आगे बढ़ती है. पहले भाग में दिखाए गए रेत के विशाल कीड़ों (सैंडवर्म्स) की इस भाग में अहम भूमिका है.

फ़िल्म की हिंदी डबिंग अच्छी है. मुख्य भूमिकाओं में टिमोथी शैलमे, रेबेका फ़र्ग्युसन, ज़ेंडेया, ऑस्टिन बटलर, फ़्लोरेंस पग हैं. कुछ जगहों पर एडिटिंग में थोड़ी कमी महसूस होती है. कहीं-कहीं कहानी की गति थोड़ी धीमी लगती है लेकिन यह फ़िल्म को ठहरकर महसूस करने का मौका भी देती है. पहले भाग की तरह इस भाग का निर्देशन भी डेनी वलनुव ने ही किया है. डेनी की ‘अराइवल’ फ़िल्म भी काफ़ी चर्चित रही थी. किसी साइंस फ़िक्शन उपन्यास की कहानी को परदे पर उतारना आसान नहीं है. पिछली बार की तरह सिनेमैटोग्राफ़र ग्रैग फ़्रेज़र ने अपनी ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाया है. विज़ुअल्स के मामले में वे फ़िल्म को आगे ही लेकर गए हैं. कई फ़्रेम तो फ़ोटोग्राफ़ जैसी हैं. वाइड एंगल में कई बेहतरीन शॉट्स हैं. संगीत पहले भाग की ही तरह इस बार भी हैंस ज़िमर का है. दूर तक फैले रेगिस्तान की ख़ामोशी और मानव सभ्यता के अबूझ भविष्य को हैंस ज़िमर जैसा संगीतकार ही पकड़ सकता है. फ़िल्म के साउंडट्रैक में कहीं-कहीं ‘इंटरस्टेलर’ की झलक दिखाई देती है.

इस तरह की फ़िल्में साइंस फ़िक्शन सिनेमा को हर बार एक नए स्तर पर लेकर जाती हैं.

 

रिलीज़ : 1 मार्च, 2024

निर्देशक : डेनी वलनुव

कलाकार : टिमोथी शैलमे, रेबेका फ़र्ग्युसन, ज़ेंडेया, ऑस्टिन बटलर, फ़्लोरेंस पग

सिनेमैटोग्राफ़ी : ग्रैग फ़्रेज़र

संगीत : हैंस ज़िमर

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2 Replies to “साइंस फ़िक्शन और भविष्य की कल्पनाएँ (Dune Part Two Review Hindi) : अमेय कान्त

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