योगेश कुमार ध्यानी
भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री में नाना पाटेकर का पदार्पण सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में हुआ। शुरुआत में कला फ़िल्मों से संबद्ध रहते हुए उन्होंने ‘गमन’ और ‘गिद्ध’ जैसी फ़िल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई किन्तु नाना ने लोकप्रियता का स्वाद कामर्शियल सिनेमा में निभाई गयी अपनी भूमिकाओं के कारण चखा। हालाँकि यह नाना की उपस्थिति और उनका ऑरा था कि ये फ़िल्में भी विशुद्ध व्यावसायिक तथा फ़ॉर्मूला फ़िल्मों से हटकर थीं।
कला से व्यावसायिक फ़िल्मों का यह ट्रांज़िशन ‘परिन्दा’ फ़िल्म से होकर गुज़रता है जिसमें नाना की अभिनेता के तौर पर तमाम संभावनाएँ उभरकर सामने आती हैं और जिसके बाद की फ़िल्मों में नाना के कुछ रूपों को ध्यान में रखकर लिखी गयी कहानियाँ देखने को मिलती हैं। अस्सी का वह दशक अब भी परम्परागत फ़िल्ममेकिंग के फ़ॉर्मूलों पर आधारित था। यह वह समय था जब नायक और खलनायक की छवियाँ बेहद स्पष्ट होती थीं और अस्सी तक आते-आते वे और भी लाउड हो चुकी थीं। हम खलनायकों के नये-नये रूपों से परिचित हो रहे थे। खलनायिकी अभिनय के साथ-साथ मेकअप और कॉस्ट्यूम से भी अपने आपको उजागर करने पर आमादा थी। ऐसे में नाना द्वारा निभाया गया अन्ना सेठ का किरदार एक प्रकार से हमें अभिनय के बेसिक्स की तरफ ले जाता है और अन्य तरीकों के बरक्स उसके महत्व को रेखांकित करता है।
अस्सी का उत्तरार्ध मिथुन चक्रवर्ती, अनिल कपूर और जैकी श्रॉफ़ जैसे नायकों के साथ नब्बे के दशक में प्रवेश की तैयारी कर रहा था। फ़िल्में नायक प्रधान थीं। क्रोध का वह भाव जो सत्तर के दशक में अमिताभ की फ़िल्मों के माध्यम से तर्कपूर्ण कहानियों से प्रवेश पाता है, यहाँ तक आते-आते अपने तर्कों से छूटकर एक विशुद्ध क्रोध में बदलता जान पड़ता है। इस समय के नायक उसी ‘एंग्री यंग मैन’ का विस्तार मात्र दिखते हैं। लेकिन प्रायः यह विस्तार अतार्किक और अवांछित ही था।
कहानियों का स्वरूप बदल जाने के बाद भी नायक और नायिका के चयन को लेकर कुछ अघोषित नियम हमारे फ़िल्मोद्योग में हमेशा लागू रहे और अब भी हैं। जैसे कि नायक का चरित्र निभाने वाले व्यक्ति का सुन्दर तथा आकर्षक दिखना। यह नियम इतनी कठोरता से लागू है कि आम जनमानस में फ़िल्मों में नायक बनने का ख्वाब देखने वाले कितने ही लोगों को अपने दोस्तों से सुनना पड़ा, “बड़ा आया हीरो बनने, शक्ल देखी है आईने में!”
यह नियम अब भी लागू ही है लेकिन समय-समय पर कुछ लोग अपनी अभिनय प्रतिभा के कारण अपने औसत चेहरे के साथ भी इस बैरियर को पार करने में सफल हुए। इस श्रेणी में पहला नाम ओम पुरी का याद आता है। ओम पुरी न सिर्फ़ प्रमुख फ़िल्मों का हिस्सा बने बल्कि अनेक फ़िल्मों में उन्होंने यादगार मुख्य किरदार भी निभाये और सिनेजगत का चर्चित चेहरा बने।
हालाँकि ओम पुरी के ये काम ज़्यादातर कला फ़िल्मों का ही हिस्सा रहे जिन्हें कलात्मक सराहना तो खूब मिली लेकिन जिनका निर्माण व्यवसाय की दृष्टि से नहीं किया गया था। ओम पुरी ऐसी फ़िल्मों के नायक रहे। बाद के वर्षों में जब उन्होंने लोकप्रिय सिनेमा में भूमिकाएँ निभाईं तो वे चरित्र तथा हास्य भूमिकाएँ ही थीं।
लोकप्रिय सिनेमा में मुख्य नायक की भूमिका के लिए आकर्षक चेहरे के मिथक को अपनी प्रतिभा से तोड़ने वाले पहले अभिनेता संभवतः नाना पाटेकर ही हुए। नाना पाटेकर ने क्रांतिवीर, प्रहार, अब तक छप्पन और नटसम्राट जैसी फ़िल्मों में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं और उन्हें अपनी खास अदायगी से लोकप्रिय बनाया। यह एक गौर करने वाली बात है कि ये भूमिकाएँ बॉलीवुड की वादियों में घूमते हुए गीत गाते नायकों वाली छवि से अलग हैं तथा समाज और यथार्थ के ज़्यादा नज़दीक हैं। फिर भी इन सभी फ़िल्मों का निर्माण व्यावसायिक प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए ही हुआ और ये सभी फ़िल्में व्यावसायिक रूप से सफल भी साबित हुईं। कहा जा सकता है कि नाना के होने से कला और व्यावसायिक फ़िल्मों के मध्य की दूरियाँ कुछ कम हुईं।
नाना के साथ एक मराठी लहजा बॉलीवुड में प्रवेश करता है। यह लहजा जो थोड़ा सख्त जान पड़ता है, बेहद कारगर साबित हुआ जिसने सामान्य संवादों को अविश्वसनीय गहराई प्रदान की। नाना के बहुत से डायलॉग ऐसे हैं जो शायद किसी और के द्वारा बोले जाने पर उतने विश्वसनीय न लगते तथा नाटकीय हो जाते लेकिन नाना जब उन्हें बोलते हैं तो पूरा थियेटर एक साथ उस ऊर्जा को महसूस करता। जैसे क्रांतिवीर का “ये हिंदू का खून, ये मुसलमान का खून…..” या यशवंत का “सौ में अस्सी बेईमान फिर भी मेरा देश महान” जैसे संवाद सिर्फ़ नाना ही इतने विश्वसनीय तरीके से बोल सकते थे।
नाना ने लोकप्रियता का शिखर क्रांतिवीर और तिरंगा जैसी फ़िल्मों से छुआ लेकिन इसके बाद फ़िल्मों में नाना का उपयोग कुछ सालों तक युवा मन में पैठे सिस्टम के विरुद्ध क्रोध से भरे युवा के निरुपण के लिए ही होता रहा। यह क्रम बाद में अब तक छप्पन जैसी फ़िल्म से टूटता है जहाँ यह आक्रोश संवाद के बजाय बॉडी लैंग्वेज और चेहरे की मुद्राओं से अभिव्यक्त होता दिखता है। फिर बाद के वर्षों में ‘वेलकम’ जैसी फ़िल्म में अपनी हास्य भूमिका से मानो नाना अभिनय के सम्पूर्ण वृत्त को पूरा कर लेते हैं। नाना इस भूमिका में भी उतने ही पसंद किये गये जितना अपनी अन्य भूमिकाओं के लिए।
अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय पुरस्कार तथा चार फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड पाने वाले नाना पाटेकर एक ऐसा चेहरा रहे जिनका अभिनय हर फ़िल्म में दर्शकों द्वारा पसंद किया गया। कई बार जब वे औसत फ़िल्मों का हिस्सा भी रहे तो भी दर्शकों और समीक्षकों द्वारा उनके काम को सराहना ही मिली। नाना को हमने जब भी फ़िल्मों के इतर किसी इवेंट या इंटरव्यू में देखा तो नाना बेहद साधारण कपड़ों में दिखे। उनके भीतर अपने आप को एक हीरो के तौर पर पेश करने की कोशिश नहीं दिखती है जैसा कि अन्य अभिनेताओं या फ़िल्मी हस्तियों में दिखाई देती है। अपनी इस साधारणता से भी नाना लोगों के दिलों के करीब आये।
हालाँकि ऐसा लगता है कि उन्हें अपने जीवनकाल में कुछ और अच्छी फ़िल्मों का हिस्सा होना चाहिए था। फिर भी नाना अपने पीछे जो कुछ छोड़ गये हैं वह उनके चाहने वालों को लम्बे समय तक याद रहेगा और साधारण लोगों के एक असाधारण अभिनेता के तौर पर नाना पाटेकर को हमेशा याद किया जायेगा।
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योगेश कुमार ध्यानी
जन्म – 3 सितंबर 1983
कानपुर में निवास करते हैं और मैरीन इंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं।
समुद्र पर आधारित उनकी दो कविता-पुस्तकें – ‘समुद्रनामा’ और ‘समुद्रनामा 2’ प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी कविताएँ, लेख, कहानियाँ, लघुकथाएँ और बालकहानियाँ ‘हंस’, ‘आजकल’, ‘वागर्थ’, ‘प्लूटो’ और ‘ट्रिब्यून’ जैसी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। विश्व साहित्य की कहानियों और कविताओं के उनके अनुवाद तथा सिनेमा पर केंद्रित लेख ‘हिंदवी’, ‘सदानीरा’, ‘जानकीपुल’, ‘सम्मुख’ और ‘अनुनाद’ सहित विभिन्न वेब-पत्रिकाओं और ब्लॉगों पर प्रकाशित हुए हैं।
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