सुंदरता और सत्य दो अलग ध्रुव हैं

हावर्ड एफ़ की बेला तार से बातचीत

अनुवाद : सुमन शेखर

 

हावर्ड एफ़: मिनियापोलिस के वॉकर आर्ट सेंटर में फ़िल्मकार बेला तार के साथ बातचीत हो रही है। हम उनके काम के विकास के बारे में बात करेंगे और 1979 की “फ़ैमिली नेस्ट” से लेकर 2007 की “द मैन फ़्रॉम लंदन” तक की उनकी फ़िल्मों को जानेंगे। हम बेला की फ़िल्म बनाने की शैली में आए बदलावों, उनकी फ़िल्मों में मौजूद हल्के और दबे हुए हास्य और हंगरी तथा वहाँ के लोगों की खूबसूरत श्वेत-श्याम छवियों को जानेंगे। मैं हावर्ड फ़ाइनस्टीन हूँ। मैं अमेरिकी और ब्रिटिश प्रकाशनों के लिए फ़िल्म समीक्षक हूँ। तो आइए, इस संवाद की शुरुआत करते हैं। मुझे अच्छा लग रहा है कि हमने शुरुआत “प्रोलॉग” से की। यह 2004 में बनी सामूहिक फ़िल्म “विज़न्स ऑफ़ यूरोप” का हिस्सा है। इसमें यूरोप के 25 फ़िल्मकारों ने पाँच मिनट या उससे कम लंबाई की फ़िल्में बनाई थीं। हर फ़िल्मकार ने अपने ढंग से यह कल्पना की थी कि यूरोपीय समुदाय का हिस्सा बनने के बाद यूरोप का भविष्य कैसा हो सकता है, या उस समुदाय में अपने देश का भविष्य कैसा होगा। इसलिए यह मूल रूप से बेला की उस कल्पना को दिखाता है कि किसी समय यूरोपीय समुदाय का हिस्सा बनने के बाद हंगरी कैसा होगा। मुझे खुशी है कि हमने शुरुआत इससे की, क्योंकि मेरी नज़र में इसमें बेला की दो अलग-अलग फ़िल्मी शैलियों का मेल दिखाई देता है। इसका मतलब यह नहीं कि उनके काम में कोई निरंतरता नहीं है, यह बदलाव साफ़ दिखाई देता है।

पहली बात तो यह कि इसमें हंगरी की उस समय की आर्थिक स्थिति और शहरों की हालत साफ़ दिखाई देती है। अगर  1979 की “फ़ैमिली नेस्ट” का पहला दृश्य याद हो, तब यह बात सामने आएगी। दूसरी खास बात यह है कि प्रोलॉग पूरा एक ही शॉट में है, इसमें कोई कट नहीं है। बाद की फ़िल्मों में बेला ने इस शैली को और विकसित किया। “मैकबेथ” के बाद उनकी फ़िल्मों में लंबे शॉट और बिना कट के कैमरा चलने की शैली और साफ़ होती गई। “मैकबेथ” को हम एक संक्रमण वाली फ़िल्म कह सकते हैं। इसके बाद वे धीरे-धीरे अपनी सबसे हाल की फ़िल्म “द मैन फ़्रॉम लंदन” की ओर बढ़ते हैं, जिसके बारे में शेरिल मॉस्ली भी बात कर रही थीं। 2007 में कान फ़िल्म समारोह में इसका प्रीमियर हुआ था। टोरंटो में भी इसे दिखाया गया। इसमें मुझे लगता है कि बेला ने अपनी दूसरी दौर की फ़िल्मी शैली को एक विधा, यानी जॉनर, के साथ मिलाया है। यहाँ यह एक पुलिसिया कहानी है, जो जॉर्ज सिमेनॉन के उपन्यास पर आधारित है।

साथ ही मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि जिसे मैं बेला के काम का पहला दौर मानता हूँ, उसमें “फ़ैमिली नेस्ट” जैसी फ़िल्में आती हैं। यह तथाकथित मजदूर वर्ग की तीन फ़िल्मों वाली शृंखला का हिस्सा है और इसका वातावरण शहरी है। बाद की फ़िल्मों की तुलना में इसमें संपादन कुछ ज़्यादा पारंपरिक है। हाथ में पकड़े कैमरे का बहुत इस्तेमाल है, क्लोज़-अप बहुत हैं और…

बेला तार: और लंबे-लंबे मोनोलॉग भी।

हावर्ड एफ़: हाँ, लंबे मोनोलॉग भी। इन फ़िल्मों में ऐसे परिवार हैं जिनकी निजी ज़िंदगी आर्थिक परिस्थितियों से बुरी तरह प्रभावित होती है। खासकर “फ़ैमिली नेस्ट” में घर की कमी एक बड़ी समस्या है। फिर 1980 के दशक के मध्य से, “मैकबेथ” के बाद, जो 1982 में बनी थी, आपकी की फ़िल्मों का समय और फैलने लगता है। शॉट लंबे होते जाते हैं, कट कम होते जाते हैं और कहानियाँ ज़्यादातर गाँवों, किसानों और छोटे समुदायों के बीच जाने लगती हैं। हम “डैमनेशन”, “सातांतांगो” और “वर्कमाइस्टर हार्मनीज़” जैसी फ़िल्मों के दृश्य भी देखेंगे।

मुझे लगता है कि शुरुआत से ही आपकी ज़्यादातर फ़िल्मों में एक ऐसे देश का दृश्य दिखाई देता है जिसने बहुत कुछ झेला है। राजनीतिक परिस्थितियों ने आपको बहुत चोट पहुँचाई है, शायद मौसम और दूसरी परिस्थितियों ने भी। फिर भी आपकी फ़िल्मों को देखकर कुछ लोग आपको बहुत उदास या निराशावादी मानते हैं, लेकिन मुझे आपकी फ़िल्में आखिरकार उम्मीद से भरी ज़्यादा लगती हैं। मेरे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। आपकी फ़िल्मों में अच्छी मात्रा में हास्य भी है।

सुसान सॉन्टाग ने आप को उन फ़िल्मकारों में गिना था जिनकी फ़िल्में सिनेमा की तय परंपराओं का साहस के साथ उल्लंघन करती हैं। मुझे नहीं लगता कि आप खुद अपने बारे में ऐसा कहेंगे। आप उस तरह के व्यक्ति नहीं हैं। लेकिन मुझे लगता है कि आप दुनिया को इसी तरह देखते हैं। अगर आप कुछ कहना चाहें तो कह सकते हैं।

बेला तार: मैं सिर्फ़ एक बात कहना चाहता हूँ। मैंने इस छोटी फ़िल्म को इसलिए चुना क्योंकि मुझे लगा कि यह एक तरह का बयान है। अगर आप हमारे पूरे काम को देखें, और यहाँ मैं अकेले काम नहीं करता, तो आपको हमारी सभी फ़िल्मों में एक चीज़ दिखाई देगी। वे इंसान की गरिमा के बारे में हैं। मेरे लिए यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। अगर आप इन फ़िल्मों को समझने की कोई कुंजी खोज रहे हैं, तो यही वह कुंजी है।

हावर्ड एफ़: लेकिन मुझे दिलचस्प लगता है कि आप इंसानी गरिमा की बात ऐसे लोगों के बीच करते हैं जो समाज के हाशिए पर हैं, बाहर छूटे हुए हैं, अक्सर बहुत मुश्किल हालात में जी रहे हैं।

बेला तार: उनके पास भी इंसानी ज़िंदगी है। आप उन्हें बाहरी या हाशिए के लोग क्यों कह रहे हैं?

हावर्ड एफ़: मेरा मतलब है कि आम तौर पर समाज उन्हें ऐसा ही मानेगा।

बेला तार: वह तो दुखी इंसान है। आप कह सकते हैं कि कोई व्यक्ति हाशिए पर है क्योंकि वह समाज का हिस्सा नहीं है।

फ़िल्म “फ़ैमिली नेस्ट” से एक दृश्य

हावर्ड एफ़: ठीक है। फ़ैमिली नेस्ट, यह आपकी पहली फ़ीचर फ़िल्म है और उस तथाकथित तीन फ़िल्मों वाली शृंखला की पहली फ़िल्म भी।

बेला तार: और इस साल इस फ़िल्म को बने पूरे 30 साल हो गए हैं।

हावर्ड एफ़: हाँ। लेकिन मेरे हिसाब से यह आज भी उतनी ही प्रभावी है। उसका एक दृश्य है। हाल ही में रिलीज़ हुई डीवीडी में इस दृश्य के आखिरी हिस्से के लिए सबटाइटल दिए गए हैं। वहाँ एक टेलीविजन समाचार आता है, जो साफ़ तौर पर उस समय की सरकार और कम्युनिस्ट पार्टी से प्रभावित खबर है। आप उस समाचार वाले हिस्से के बारे में थोड़ा बता सकते हैं?

बेला तार: मुझे यह देखकर थोड़ा बुरा लग रहा है, क्योंकि अब आप पूरी फ़िल्म के एक बहुत छोटे हिस्से को देख रहे हैं और वह मेरे लिए थोड़ा परेशान करने वाला है। लेकिन इस फ़िल्म के बारे में मुझे कुछ कहना है। जब मैंने यह फ़िल्म बनाई थी, मैं 22 साल का था। उस समय मुझे सिनेमा बहुत पसंद था। मैं अक्सर सिनेमा देखने जाता था, लेकिन हर बार मुझे वही घटिया फ़िल्में देखने को मिलती थीं। हर चीज़ में झूठ था। उसमें सब कुछ बनावटी था। खराब अभिनेता, बेवकूफ़ी भरी कहानियाँ, खराब रंग। मुझे लगता था कि यहाँ असली ज़िंदगी है और फ़िल्मों का असली ज़िंदगी से कोई संबंध नहीं है। मैं 22 साल का था, मेरे भीतर बहुत ऊर्जा थी और मैंने तय किया कि नहीं, हम दरवाज़े पर दस्तक देकर अनुमति नहीं माँगेंगे। हम अपनी तरह से फ़िल्म बनाएँगे।

हमने यह फ़िल्म बनाई और तय किया कि इसे बिल्कुल वास्तविक होना चाहिए। हमने हाथ में पकड़े 60 मिलीमीटर कैमरे से शूट किया। कोई पेशेवर अभिनेता नहीं था, सारे असली लोग, असल जीवन के लोग थे। हमारे पास सिर्फ़ पाँच शूटिंग दिन थे। कोई संवाद लिखे हुए नहीं थे, कुछ भी नहीं था। यह बहुत ही कम बजट की फ़िल्म भी नहीं थी, बल्कि लगभग बिना बजट की फ़िल्म थी। लेकिन मुझे यह तरीका बहुत पसंद था, क्योंकि इससे हम लोगों के बहुत करीब जा सकते थे। हम दिखा सकते थे कि वे कैसे जीते हैं, उनकी भावनाएँ क्या हैं, उनकी प्रतिक्रियाएँ क्या हैं और असली ज़िंदगी किस तरह चलती है। मुझे इस बात पर बहुत गर्व है कि हमने यह फ़िल्म उस तरह बनाई।

हावर्ड एफ़: उस समय फ़िल्म बनाने में एक राजनीतिक आंदोलन जैसा भी था। मैंने उसे अलग-अलग नामों से सुना है, जिनमें बुडापेस्ट स्कूल भी शामिल है।

बेला तार: वह कुछ युवा लोगों का समूह था। हम फ़िल्में बनाना चाहते थे, लेकिन जैसा मैंने बताया, हम सिनेमा में जो देख रहे थे, उससे बहुत नफ़रत करते थे। हमारे सामने दो रास्ते थे। मेरे कुछ साथी सोच रहे थे कि वे नकली डॉक्यूमेंट्री या छद्म डॉक्यूमेंट्री बनाएँ। वे ज़्यादातर राजनीतिक फ़िल्में बनाना चाहते थे और पूरी व्यवस्था के खिलाफ़ जाना चाहते थे। दूसरी तरफ कुछ लोग थे जो एक नई फ़िल्मी भाषा तलाशना चाहते थे। वे प्रयोगात्मक फ़िल्में बनाते थे। हम सब एक ही स्टूडियो में काम करते थे। हमारे पास पूरे काम के लिए बहुत छोटा बजट था और हम हमेशा इस बात पर लड़ते रहते थे कि पैसा प्रयोगात्मक फ़िल्म बनाने वालों को मिले या डॉक्यूमेंट्री बनाने वालों को। मैं हमेशा बीच में था, क्योंकि मेरी दिलचस्पी असली इंसानी भावनाओं में थी, लोगों के बीच होने वाले उस संवाद में थी जो सिर्फ़ शब्दों से नहीं होता। साथ ही मेरे भीतर सामाजिक संवेदना भी थी। लेकिन दूसरी तरफ़ मैं फ़िल्म की भाषा को लेकर भी बहुत उत्सुक था। यही वह समय था। यह फ़िल्म 1977 में बनी थी। उस दौर में कुछ फ़िल्मकारों ने बहुत अच्छा काम किया।

हावर्ड एफ़: शायद मुझे थोड़ा संदर्भ पहले दे देना चाहिए था। मुझे लगता है आप फ़िल्म देखकर समझ गए होंगे कि ससुर अपनी बहू को लगातार परेशान कर रहा है। वह अपने बेटे की पत्नी को उस छोटे से फ़्लैट से निकालना चाहता है, जहाँ बहुत सारे लोग साथ रह रहे हैं। उस समय घरों की बहुत कमी थी। मुझे लगता है कि उस ससुर का व्यवहार काफ़ी हद तक तानाशाही वाला है और फिर आप उसे…

बेला तार: फ़िल्म को फिर से देखिए। नहीं, ऐसा नहीं है। वह ऐसा पिता है जिसे व्यवस्था पसंद है। उसके मन में ज़िंदगी को लेकर एक मज़बूत कल्पना है। उसके पास ज़िंदगी जीने का अपना तरीका है और वह उसी रास्ते पर आगे बढ़ना चाहता है। बस इतना ही। मैं किसी को जज नहीं करता। मेरे पास यह कहने का अधिकार नहीं है कि वह तानाशाह है।

हावर्ड एफ़: ठीक है।

बेला तार: नहीं, वह एक बदकिस्मत आदमी भी है।

हावर्ड एफ़: मैं यह नहीं कह रहा कि उसके प्रति सहानुभूति नहीं हो सकती। लेकिन वह निश्चित रूप से घर के बाकी लोगों पर अपने नज़रिए को थोपना चाहता है। और इस दृश्य में आपने कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी टीवी खबर को क्यों रखा?

बेला तार: उस समय जब आप टीवी चलाते थे, तो आपको अक्सर वही देखने को मिलता था जो वे दिखाना चाहते थे।

हावर्ड एफ़: हाँ, लेकिन उसे फ़िल्म में रखने का फ़ैसला तो आपने किया।

बेला तार: नहीं। अगर आप आज टीवी चलाएँ तो आप देख सकते हैं कि आपके बॉस मिस्टर बुश क्या कर रहे हैं। वही बात है। यह चलता रहता है। मैं सिर्फ़ एक बात कहना चाहता हूँ। यह एक परिवार की कहानी थी और असल में यह एक बड़ी प्रेम कहानी है। एक औरत और एक आदमी एक-दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन वे खुश नहीं हो पाते। बात इतनी सी है। उनकी ज़िंदगी किस तरह बर्बाद होती जाती है। उनके भीतर बहुत कुछ करने की क्षमता है, लेकिन उनके पास उसे करने की संभावना नहीं है। यही असली त्रासदी है। अगर आप कुछ कर सकते हैं और कुछ करना चाहते हैं, लेकिन आपके पास उसे करने का कोई मौका नहीं है, तो यह बहुत दुखद है। इसी वजह से मुझे वे लोग पसंद हैं और मैं उन्हें अपने बहुत करीब महसूस करता हूँ। उस महिला के बारे में भी एक बात बताना चाहता हूँ जो इस फ़िल्म की मुख्य पात्र है। वह “सातांतांगो” में भी थी और “वर्कमाइस्टर” में भी। आज भी हमारा संपर्क है। वह अभिनेत्री नहीं है और आज भी अभिनेत्री नहीं है। वह एक कामगार है।

हावर्ड एफ़: अब हमें आगे बढ़ना चाहिए। हम 1982 में बनी “मैकबेथ” का एक छोटा सा परिचय देंगे। यह हंगरी के टेलीविजन के लिए बनाई गई थी। यह सिर्फ़ दो टेक में बनाई गई फ़िल्म है। यह लगभग एक घंटे की फ़िल्म है। पहला टेक पाँच मिनट का है और दूसरा लगभग 55 मिनट का। इसे वीडियो पर शूट किया गया था और इसकी शैली भी कुछ अलग है। इसमें एक तरह का नाटकीय…

फ़िल्म “मैकबेथ” से एक दृश्य

बेला तार: आप देखेंगे कि यह अलग नहीं है।

हावर्ड एफ़: ठीक है। मैं अपने नोट्स देखकर ही बात कर पा रहा हूँ।

बेला तार: नहीं, मैं सिर्फ़ यह देखना चाहता था कि आप क्या दिखाने वाले हैं।

हावर्ड एफ़: अच्छा, एक बार फिर से सोचता हूँ। ठीक है। 1979 या 1978 में जब आपने “फ़ैमिली नेस्ट” बनाई और फिर “मैकबेथ” बनाई, तब आपके काम करने के तरीके में कुछ बदल गया था। क्या आप इस बारे मे बताएँगे?

बेला तार: सबसे पहले, “फ़ैमिली नेस्ट” पूरी करने के बाद मैंने जर्मनी के मैनहाइम में ग्रां प्री जीता। उसके बाद मैं फ़िल्म स्कूल चला गया, क्योंकि मुझे कहा गया कि अगर मेरे पास डिप्लोमा नहीं है तो मैं फ़ीचर फ़िल्म निर्देशित नहीं कर सकता। इसलिए मुझे फ़िल्म स्कूल जाना पड़ा। सौभाग्य से वहाँ मेरे एक बहुत अच्छे प्रोफ़ेसर थे। उन्होंने मुझसे कहा, “जाओ और फ़िल्म बनाओ। यहाँ बैठकर मत रहो। मैं तुम्हें कुछ नहीं सिखा सकता।” वह बहुत अच्छे इंसान थे। उनके कारण मैं फ़िल्म स्कूल में रहते हुए दो फ़ीचर फ़िल्में बना सका। फिर तीसरे या चौथे साल में उन्होंने एक दिन मुझे बुलाया और कहा, “अब स्कूल में कुछ करने का समय आ गया है।” उन्होंने कहा, “अगर तुम स्कूल का कार्यक्रम देखो तो तुम्हें शास्त्रीय साहित्य का कोई रूपांतरण करना होगा।” उस समय मुझे दूसरे प्रोफ़ेसर के लिए शेक्सपियर की पूरी रचनाएँ पढ़नी थीं। उसी शाम मैं “मैकबेथ” पढ़ रहा था। मैंने अपने प्रोफ़ेसर को फ़ोन करके पूछा, “’मैकबेथ’ ठीक रहेगा?” उन्होंने कहा, “ठीक है।” इस तरह “मैकबेथ” बनी। उन्होंने ही मुझे इसके लिए प्रेरित किया और आगे बढ़ाया।

अगर आप इस फ़िल्म की तुलना मेरी दूसरी फ़िल्मों से करेंगे तो आपको फिर लंबे मोनोलॉग मिलेंगे, लंबे दृश्य मिलेंगे और मनोवैज्ञानिक निरंतरता भी मिलेगी। जिसे मैं बहुत पसंद करता हूँ और जिसे हमेशा दिखाना चाहता हूँ, वह यहाँ भी मौजूद है। एक और चीज़ जो मेरी सभी फ़िल्मों में बहुत महत्वपूर्ण है, वह है कलाकारों के साथ काम करने का हमारा तरीका। हम उन्हें सिर्फ़ अभिनेता की तरह इस्तेमाल नहीं करते। सबसे पहले मैं उनकी अपनी शख्सियत को देखता हूँ। मेरे लिए यह ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि कोई व्यक्ति बहुत अच्छा अभिनेता है या नहीं। अगर उसकी शख्सियत और फ़िल्म के किरदार में समानता है, तो वह मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है। इस मामले में मैं बहुत ज़्यादा निर्देशन नहीं करता। मैं सिर्फ़ एक स्थिति बनाता हूँ, कलाकारों को उस स्थिति में रखता हूँ और उन्हें काम करने देता हूँ। मेरे लिए असली निर्देशन यही है कि आप सब कुछ सही स्थिति में रखें। तब कलाकार खुद शुरू कर सकता है और वह अभिनय नहीं करता, बल्कि उस स्थिति में जीता है।

जब “मैकबेथ” बनी तो हंगरी में बहुत बड़ा विवाद हुआ। लोगों ने कहा कि यह असली शेक्सपियर नहीं है। हमने शेक्सपियर के महान नाटक को बर्बाद कर दिया है। उन्हें लगा कि हम इसे किसी घर की साधारण औरत और उसके पति की कहानी जैसा बना रहे हैं, जो बस पैसा चाहते हैं। और हाँ, क्योंकि यही सच है। यही “मैकबेथ” है। मैकबेथ और लेडी मैकबेथ जो करते हैं, वे सत्ता और पैसा चाहते हैं। लेकिन मूल कहानी की धारा वही रहती है।

हावर्ड एफ़: इसमें एक निरंतरता भी दिखाई देती है। लेकिन यहाँ, उदाहरण के लिए, आप अपने पात्रों के साथ कैमरा चलाते रहते हैं और उनसे कट करके दूर नहीं जाते, जैसा आपने शुरुआती फ़िल्मों में किया था।

बेला तार: हाँ, बहुत ज़्यादा। हमने इसे बुडा के किले में शूट किया था। वह जगह बहुत खूबसूरत थी। वहाँ लगभग 300 मीटर लंबी एक भूलभुलैया थी और आखिर में एक आँगन था। अंत में वहाँ लड़ाई होती है। हमारे पास घोड़े थे और बहुत सारी अजीब चीज़ें थीं। मुझे यह काम बहुत पसंद आया। इस प्रोजेक्ट पर 150 लोगों ने काम किया था। यह मेरे लिए बहुत सुंदर अनुभव था। हम हर शाम जाते थे और आधी रात के दौरान शूट करते थे। कुल 15 दिन थे। पहले दस दिन रिहर्सल के थे और उसके बाद पाँच दिन शूटिंग हुई। बाकी बात यह है कि जब आप हाथ में पकड़े कैमरे से 55 मिनट लंबे टेक शूट करते हैं और सीढ़ियों पर ऊपर-नीचे जाते हैं, तो हम एक दिन में सिर्फ़ एक या दो टेक ही कर सकते थे। पहला कैमरा निर्देशक थककर गिर गया और दूसरा आया और उसने अगला टेक शूट किया। यही हमारी स्थिति थी। अगर 35वें मिनट में किसी से गलती हो जाए तो सब रोकना पड़ता था और फिर शुरुआत से करना पड़ता था। यह किसी डरावने अनुभव से कम नहीं था।

हावर्ड एफ़: मैं कल्पना कर सकता हूँ कि कलाकारों के लिए यह कितना मुश्किल रहा होगा…

बेला तार: हाँ। अगर किसी से गलती हो जाती थी तो… उदाहरण के लिए वह बूढ़ा आदमी, जो असल ज़िंदगी में शराब का आदी था और दुर्भाग्य से अब इस दुनिया में नहीं है। आप सोच सकते हैं कि जब उसने आखिरकार पूरा संवाद याद कर लिया था…

हावर्ड एफ़: अब हम अगली फ़िल्म “डैमनेशन” पर बात करेंगे, जो कि 1988 की फ़िल्म है..

बेला तार: 1987

हावर्ड एफ़: आपने इसे 1987 में शूट किया था, लेकिन…

बेला तार: नहीं, 1987 में आई भी।

हावर्ड एफ़: 1987। लेकिन IMDb.com पर…

बेला तार: IMDb.com बेकार है। वहाँ सब कुछ गलत है। सब कुछ।

हावर्ड एफ़: अच्छा, मैं जानता हूँ।

फ़िल्म “डैमनेशन” से एक दृश्य

बेला तार: सच में, सब कुछ गलत है। मसलन मैंने “द मैन फ़्रॉम लंदन” के बारे में पढ़ा कि उसका एक मुख्य किरदार वोल्कर स्पेंगलर है।

हावर्ड एफ़: जबकि वह फ़िल्म में है ही नहीं।

बेला तार: नहीं। एक बार हमने सोचा था कि शायद वोल्कर आकर यह भूमिका करे, लेकिन वह बीमार हो गया और आ नहीं सका। फिर ऐसी बात को वे प्रकाशित क्यों करते हैं जो पूरी तरह गलत है? IMDb की बात मत सुनिए।

हावर्ड एफ़: खैर, अब हम 1987 की “डैमनेशन” पर बात करते हैं। क्रेडिट के बाद फ़िल्म का पहला दृश्य आता है। मुझे लगता है, और आपसे बहस करना मुझे बहुत पसंद है, कि इसमें देखने की प्रक्रिया पर ज़्यादा जोर दिखाई देता है। फ़िल्म के बिल्कुल पहले दृश्य में ही यह बात सामने आती है। इस समय तक आप उपन्यासकार लास्लो क्रास्नाहोरकाई के साथ काम करने लगे थे। ऐसा लगता है कि आपको उनकी भाषा और लेखन का एक दृश्य और ध्वनि वाला रूप मिल रहा था। उनके लेखन को फ़िल्म में बदलते समय आपका तरीका क्या था?

बेला तार: सबसे पहले मैकबेथ के बाद हमने “अल्मानैक ऑफ़ फ़ॉल” नाम की फ़िल्म बनाई। मुझे कहना होगा कि यह मेरी ज़िंदगी की सबसे निराशाजनक फ़िल्म थी। मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन उस समय मुझे कहीं कोई उम्मीद या कोई रास्ता दिखाई नहीं देता था। वह बहुत अजीब फ़िल्म थी। वह रंगीन फ़िल्म थी। हमने रंगों, रोशनी और हर चीज़ के साथ प्रयोग किया। इसके बाद हंगरी में हमारे लिए बहुत खराब स्थिति बन गई। हर कोई कह रहा था कि हम फ़िल्म के खिलाफ़ हैं, समाज के खिलाफ़ हैं, पूरी व्यवस्था के खिलाफ़ हैं। लेकिन हमें इसकी परवाह नहीं थी। फिर एक दिन मेरे एक दोस्त, जो साहित्य के आलोचक थे, उन्होंने मुझे “सातांतांगो” की पांडुलिपि दी। मैंने किताब पढ़ी और मैं बहुत प्रभावित हुआ। मैंने लेखक लास्लो को फ़ोन किया और कहा कि मैं आपसे मिलना चाहता हूँ। हम मिले। वह मेरी ही पीढ़ी के हैं, मुझसे सिर्फ़ एक साल बड़े हैं। फिर हमने सातांतांगो की पटकथा पर काम शुरू किया।

उस समय हंगरी के फ़ीचर फ़िल्म स्टूडियो में हम सबके खिलाफ़ माहौल था। कोई हमें काम नहीं देना चाहता था। उस समय मुझे लगने लगा था कि अब कोई रास्ता नहीं है। “अल्मानैक ऑफ़ फ़ॉल” के बाद मैं फिर वही गंदे, बदसूरत लोगों और बदसूरत कहानियों के साथ आ रहा था। हर कोई कह रहा था, “जहन्नुम में जाओ।” फ़िल्म इंडस्ट्री में हमारे लिए कोई जगह नहीं थी। मुझे लग रहा था कि सब खत्म हो गया है। तभी मेरी मुलाकात एक ऐसे आदमी से हुई जिसका एक छोटे से तहखाने में विज्ञापन स्टूडियो था। उसके पास एक कैमरा था। मैंने उससे कहा, “मैं कुछ करना चाहता हूँ। अगर मैंने काम नहीं किया तो मैं मर जाऊँगा।” मैंने लास्लो से कहा कि आकर पटकथा लिखो। मेरे मन में एक विचार था। एक औरत है जो गाती है और एक आदमी है जो सोना लेकर आता है। यह थोड़ा फ़िल्म नोयर जैसा विचार था। लास्लो आया और हमने मिलकर “डैमनेशन” की पटकथा लिखी। इसी तरह हमारा साथ काम करना शुरू हुआ। उससे पहले हमने “सातांतांगो” की पटकथा भी लिखी थी, लेकिन हम उसे बना नहीं पाए। उसके लिए हमें लगभग दस साल इंतज़ार करना पड़ा। आखिरकार बर्लिन की दीवार गिरने के बाद उसे बनाने का मौका मिला। उससे पहले हम ऐसा नहीं कर सकते थे। यह फ़िल्म अकेलेपन के बारे में है। अगर आप मेरी सभी फ़िल्मों को देखें तो उनमें गरिमा, मनोवैज्ञानिक निरंतरता और इंसानी अकेलापन दिखाई देगा। मेरे सभी नायक अकेले हैं, यहाँ तक कि मैकबेथ भी। यह मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। “डैमनेशन” के बारे में मैं इतना ही कह सकता हूँ।

हावर्ड एफ़: इस फ़िल्म में और अगली फ़िल्मों में भी, जैसे “सातांतांगो” और “वर्कमाइस्टर हार्मनीज़”, ऐसा लगता है कि लोग एक-दूसरे के साथ विश्वासघात करते हैं और बहुत क्रूर व्यवहार करते हैं। क्या यह सब मूल रचनाओं से आया है? या फिर यह दुनिया को देखने के आपके तरीके में आया बदलाव है, खासकर “फ़ैमिली नेस्ट” की तुलना में? मुझे लगता है कि वहाँ, भले ही ज़िंदगी मुश्किल है, एक युवा निर्देशक यह सोचता है कि शायद हम दुनिया को बदल सकते हैं। यहाँ ऐसा लगता है कि आप अभी भी दुनिया को बदलने की संभावना देखते हैं, लेकिन अब लोगों को दुनिया की क्रूरता दिखाकर।

बेला तार: अगर आप 22 साल के हैं तो आपको सचमुच लगता है कि दुनिया के आधे हिस्से को खत्म कर देना चाहिए। आप एक फ़िल्मी योद्धा होते हैं। आपको लगता है कि ठीक है, चलो आगे बढ़ते हैं, समाज के खिलाफ़ जाते हैं, समाज को बदलते हैं और सब ठीक हो जाएगा। लेकिन बाद में मुझे समझ आया कि समस्या सिर्फ़ सामाजिक नहीं है। अगर आप “अल्मानैक ऑफ़ फ़ॉल” देखें तो उसमें सिर्फ़ सामाजिक समस्याएँ नहीं हैं। यह अस्तित्व का सवाल है। और अगर आप और गहराई में जाएँ तो समझ में आता है कि यह पूरी कायनात का सवाल है। गड़बड़ सिर्फ़ सामाजिक नहीं है, सिर्फ़ अस्तित्व की नहीं है। यह बहुत बड़ी है। शायद इसी वजह से “डैमनेशन “ में हमने समय को बाकी फ़िल्मों से थोड़ा अलग तरीके से इस्तेमाल किया। बस इतना ही। लोग इसे क्रांतिकारी फ़िल्म कहते हैं क्योंकि इसमें समय का इस्तेमाल कुछ अलग ढंग से किया गया है। बाकी फ़िल्मों में भी हम समय के साथ काम करते थे, लेकिन यहाँ यह तरीका थोड़ा ज़्यादा आक्रामक था।

हावर्ड एफ़: मुझे “डैमनेशन”, “सातांतांगो” और “वर्कमाइस्टर हार्मनीज़” में एक तरह का विरोधाभास दिखाई देता है। माफ़ कीजिए, मैं इसे बहुत सरल करके कह रहा हूँ, लेकिन एक तरफ़ बहुत शांत दृश्य हैं, बहुत लंबे टेक हैं, कैमरा धीरे-धीरे चलता है और दूसरी तरफ़ अचानक शराबखानों में लोगों के नशे में होने, नाचने और संगीत से भरे बहुत शोर वाले दृश्य आते हैं। यह बदलाव काफ़ी चौंकाने वाला होता है और फिर अचानक फ़िल्म वापस उसी शांति में चली जाती है। अब हम “सातांतांगो” की बात करते हैं, यह फ़िल्म लगभग सात घंटे लंबी है…

बेला तार: सात घंटे 15 मिनट। बीच में दो इंटरवल हैं।

हावर्ड एफ़: सही। अभी हम शराबखाने वाले एक दृश्य पर बात करते हैं। इस फ़िल्म में आप एक असाधारण काम करते हैं। यह दृश्य फ़िल्म में बाद में फिर आता है। ऐसा सिर्फ़ एक बार नहीं है। बाद में हम इसी घटना को खिड़की के बाहर से देखेंगे। फ़िल्म की संरचना में यह लगभग असामान्य चीज़ है। साहित्य में ऐसा ज़्यादा देखने को मिलता है। जैसे चार अध्याय आगे जाने के बाद आप किसी पुराने अध्याय में वापस चले जाएँ और वही घटना फिर से पढ़ें। लेकिन आपने फ़िल्म में ऐसा किया है और यह बहुत असाधारण है।

फ़िल्म “वर्कमाइस्टर हार्मनीज़” से एक दृश्य

बेला तार: सबसे पहले, यह एक रूपांतरण है। लेकिन वास्तव में पूरी तरह ऐसा भी नहीं है। हमने उपन्यास का इस्तेमाल किया है और उस उपन्यास में 12 अध्याय हैं। हमने उपन्यास की संरचना को काफ़ी हद तक रखा। जब हमने किताब पढ़ी थी तो मुझे वह बहुत पसंद आई थी और हमने उसकी पटकथा लिखी। लेकिन वह पटकथा आखिरकार कूड़ेदान में चली गई। जब वास्तव में फ़िल्म बनाने का समय आया तो हमें समझ में आया कि इसका सीधा रूपांतरण करना असंभव है। लास्लो क्रास्नाहोरकाई ने हंगरी के मैदानों की वास्तविकता के बारे में किताब लिखी थी। अगर मैं सिर्फ़ किताब को फ़िल्म में बदलने की कोशिश करता तो मैं खो जाता। मुझे समझ में आया कि मुझे खुद हंगरी के उन मैदानों में जाना होगा। मुझे वही वास्तविकता खोजनी होगी जो उसने देखी थी और फिर उसका अपना रूप बनाना होगा। किताब का इस्तेमाल करना है, लेकिन फ़िल्म वास्तविकता के बारे में बनानी है। मेरी सभी फ़िल्मों में अगर आप ध्यान से देखें तो वे हमेशा वास्तविकता और कल्पना के बीच कहीं होती हैं। मुझे असली पलों का इस्तेमाल करना पसंद है। मैं बहुत सारे क्षण ऐसे रखता हूँ जिनमें कलाकारों को कुछ हद तक अपनी तरफ़ से करने की जगह होती है। दूसरी तरफ़ मुझे यह भी पसंद है कि हर चीज़ बहुत अच्छी तरह से बनी हो, पूरी तरह व्यवस्थित हो।

जाँ-ल्यूक गोदार ने एक बार कहा था – “सुंदरता और सत्य दो अलग ध्रुव हैं।” एक तरफ़ दस्तावेज़ और दूसरी तरफ़ कल्पना। यह बात बिल्कुल सही है। अगर आपके पास सिर्फ़ कल्पना है और वास्तविकता के प्रति कोई संवेदना नहीं है तो आप असफल हो गए। आप उसे कला कह सकते हैं, लेकिन वह बनावटी होगी। मेरे लिए सबसे बड़ा खतरा तब है जब कोई मुझसे कहता है, “आप कलाकार हैं।” नहीं। मैं सिर्फ़ वास्तविकता, असली लोगों, उनकी भावनाओं और उनकी इच्छाओं को समझने की कोशिश करता हूँ। हाँ, जिस रूप में हम यह सब करते हैं, उसमें कला ज़रूर होती है।

और एक बात। उदाहरण के लिए, “फ़ैमिली नेस्ट” की वह महिला, जो पहले जोड़े के पीछे दिखाई देती थी, वही वहाँ नाच रही थी। आप “मैकबेथ” में मैकडफ़ की भूमिका निभाने वाले आदमी को भी देख सकते हैं। और वह लड़की जो अंदर देख रही है, वही अब “द मैन फ़्रॉम लंदन” की मुख्य पात्र है। मुझे उन्हीं लोगों के साथ काम करना पसंद है। वे एक तरह से मेरा परिवार हैं और मुझे यह बहुत अच्छा लगता है।

हावर्ड एफ़: इस फ़िल्म में और “वर्कमाइस्टर हार्मनीज़” में भी गाँव के लोग एक ऐसे आदमी की तरफ आकर्षित होते हैं जो लगभग किसी झूठे मसीहा जैसा है। वह उन्हें किसी तरह की उम्मीद देता है और वे उसके पीछे चल पड़ते हैं। “वर्कमाइस्टर” में भी लोग इसी तरह के एक व्यक्ति की ओर आकर्षित होते हैं। मैं सोच रहा था कि क्या आप इसके ज़रिए फ़ासीवाद के बारे में कुछ कहना चाहते थे? या फिर यह बात उपन्यास में ही थी? या आप लोगों के इस तरह के व्यक्तित्व की ओर आकर्षित होने की बात कर रहे थे? मैं बस सवाल रख रहा हूँ।

बेला तार: नहीं। जैसा मैंने कहा, हम सिर्फ़ यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि हमारे आसपास क्या है। मैं आपको अपने नज़रिए से चीज़ें दिखाना चाहता हूँ। यह मेरा नज़रिया है। हो सकता है मैं पूरी तरह गलत हूँ। लेकिन मेरे लिए यह एक नैतिक सवाल है। मुझे जो दिखाई देता है, जिस तरह दिखाई देता है, उसे आपको बताना मेरी ज़िम्मेदारी है। आपको दिखाना मेरी ज़िम्मेदारी है। उसके बाद आप फ़ैसला कर सकते हैं। अगर आपको पसंद नहीं है, आप सहमत नहीं हैं, तो आप बाहर जा सकते हैं। लेकिन अगर मैं इन फ़िल्मों में जनता के पैसे, यानी टैक्स का पैसा इस्तेमाल करता हूँ, तो मुझे ईमानदार होना पड़ेगा। मुझे उन्हें बताना होगा कि मैं क्या सोचता हूँ। मेरे लिए यह एक नैतिक सवाल है।

हावर्ड एफ़: यहाँ हम आपकी शुरुआती फ़िल्मों के शहरी माहौल से बहुत दूर आ गए हैं। इन बाद की फ़िल्मों में गाँव और छोटे शहर हैं। क्या यह मूल रचनाओं की वजह से है? या आपने जानबूझकर इन जगहों की तरफ़ रुख किया? आप शहर से दूर क्यों चले गए?

फ़िल्म “सातांतांगो” से एक दृश्य

बेला तार: जगहों की भी अपनी कहानी होती है। लोकेशन भी फ़िल्म का एक मुख्य पात्र है। हर जगह का अपना चेहरा होता है। वह हमें बहुत कुछ बताती है। मेरे लिए यह उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अभिनेता। मैं हमेशा सही लोकेशन खोजने में बहुत समय लगाता हूँ। लेकिन मैंने कभी ऐसा फ़ैसला नहीं किया कि अब मैं शहर में फ़िल्म नहीं बनाऊँगा या अब मैदानों में फ़िल्म नहीं बनाऊँगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या करना चाहते हैं।

”फ़ैमिली नेस्ट” की मुख्य बात पूरी तरह घुटन के बारे में है। हम दिखाना चाहते थे कि साथ रहना कितना मुश्किल हो सकता है, लोग एक-दूसरे को मार डालने की हद तक क्यों पहुँच सकते हैं और उनके बीच क्या हो रहा है। इसलिए हमने क्लोज़-अप का इस्तेमाल किया। हम चेहरों के बहुत करीब गए और उन्हें एक-दूसरे के ऊपर दबाव की तरह रखा। लेकिन जब हम हंगरी के मैदानों के बारे में बात कर रहे थे और उस निराशा को दिखाना चाहते थे जो वहाँ के खुले विस्तार में है, तो हमें बड़े और खुले दृश्य लेने पड़े। “सातांतांगो” में आपको यह साफ़ दिखाई देता है। लेकिन दोनों जगह हम एक ही चीज़ के बारे में बात कर रहे हैं, इंसान और प्रकृति के बीच के रिश्ते के बारे में और प्रकृति तथा समय के बीच के रिश्ते के बारे में। “डैमनेशन” में लगातार बारिश होती रहती है। “सातांतांगो” में भी बारिश और कीचड़ है। यह उस दुनिया का ही हिस्सा है।

हावर्ड एफ़: आपने पहले अपनी फ़िल्मों के अस्तित्व से जुड़े पहलू की बात की थी। मुझे लगता है कि अगले दृश्य में यह बात बहुत साफ़ दिखाई देगी। “वर्कमाइस्टर हार्मनीज़” का एक दृश्य है जिसमें लोगों की एक भीड़ अस्पताल में दाखिल होती है। इसमें एक…

बेला तार: अब वह आपको फ़िल्म का सबसे ताकतवर दृश्य दिखाने वाला है। इसके बाद शायद आप फ़िल्म देखने नहीं आएँगे।

हावर्ड एफ़: बाकी फ़िल्म भी उतनी ही अच्छी है। इस दृश्य में एक ऐसा क्षण आता है जिसे हम किसी रहस्यमय अनुभव या अचानक हुई अनुभूति की तरह देख सकते हैं। उसके बाद सब कुछ बदल जाता है। मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन जब भी मैं इसे देखता हूँ, अक्सर रो पड़ता हूँ। मैंने आपको पहले भी बताया है। क्या आप बता सकते हैं कि इस दृश्य के पीछे आपकी कल्पना क्या थी?

बेला तार: मैं “रहस्यमय” या “आध्यात्मिक” जैसे शब्द इस्तेमाल करना पसंद नहीं करता। मैं आपको एक बात बता सकता हूँ। उन्हें पीछे मुड़ना ही था, क्योंकि उनके पीछे एक दीवार थी। यह एक तथ्य है। मैं फिर वही बात कह रहा हूँ। कोई चीज़ आपको रहस्यमय लग सकती है, लेकिन अगर आप निर्देशक हैं तो आपको हमेशा एक सही भौतिक स्थिति बनानी होती है। फिर आप उस दृश्य को समझ पाएँगे। अगर वहाँ दीवार नहीं होती और वे पीछे मुड़ते, तो शायद दृश्य कुछ ज़्यादा भावुक हो जाता। सौभाग्य से वहाँ दीवार थी और उन्हें पीछे मुड़ना ही पड़ा।

हावर्ड एफ़: मैं थोड़ी देर के लिए विरोधी पक्ष की भूमिका निभाता हूँ। उस क्षण अचानक संगीत क्यों आता है? क्या यह इसलिए है कि वे दीवार के सामने आ जाते हैं? या वहाँ उनकी चेतना में कोई बदलाव आता है?

बेला तार: नहीं। हम सिर्फ़ एक चीज़ दिखाना चाहते थे। आप सब कुछ नष्ट कर सकते हैं। लेकिन अगर आपका सामना ऐसे व्यक्ति से हो जो पहले ही पूरी तरह टूट चुका है, जो ज़िंदगी और मौत के बीच की सीमा पर है, तो आपको रुकना पड़ता है। हर इंसान के भीतर अगर थोड़ी भी मानवता है, तो उसे वहाँ रुकना होगा। यही मेरी उम्मीद भी है। मुझे अभी भी इंसानियत पर विश्वास है। मुझे लगता है कि हर व्यक्ति के भीतर यह मानवता है, क्योंकि यह हमारे खून में है। मुझे पता है कि शायद यह मेरी एक कल्पना है, लेकिन मैं इस पर विश्वास करना चाहता हूँ।

हावर्ड एफ़: मुझे लगता है कि आपकी फ़िल्मों से यह बात साफ होती है। अब हम आपकी फ़िल्म “द मैन फ़्रॉम लंदन” पर बात करेंगे। यह कुछ मायनों में एक जॉनर फ़िल्म है, लेकिन मुझे लगता है कि यह आपकी शैली के लिए बिल्कुल सही है। तस्वीरों से भी आपको इसका अंदाज़ा हो जाएगा। यह “सिमेनॉन” के उपन्यास पर आधारित है। इस बार हम हंगरी में नहीं हैं। हंगरी समुद्र से घिरा हुआ देश नहीं है और यहाँ हम उसके मैदानों में भी नहीं हैं। फ़िल्म कोर्सिका के समुद्र किनारे शूट की गई है। फ़िल्म में पानी और ज़मीन दोनों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। आपने सिमेनॉन को ही क्यों चुना? इस कहानी में आपको क्या आकर्षित किया?

बेला तार: कहानी थोड़ी लंबी है और बहुत दिलचस्प भी नहीं है। लेकिन एक बात पक्की है। जब मैंने यह उपन्यास पढ़ा था, तब शायद मुझे पढ़े हुए 20 साल हो चुके थे, लेकिन मुझे उसमें सिर्फ़ एक चीज़ याद रही। पूरा वातावरण। एक आदमी जो बंदरगाह के रेलवे स्टेशन पर रात में काम करता है। वह एक ऊँची जगह पर बने छोटे-से केबिन में बैठा रहता है। उसका काम रेल की पटरी बदलना है। जहाज़ आता है, लोग उतरते हैं, ट्रेन में जाते हैं और ट्रेन उन्हें कहीं दूर ले जाती है। वह वहाँ से सब कुछ देख सकता है। पूरा शहर सो रहा है और वह अकेला अपने छोटे-से केबिन में बैठा है। मुझे यह बात बहुत पसंद आई। फिर वही अकेलापन, जो मेरे काम में एक तरह की सनक जैसा है, मुझे वहाँ दिखाई दिया। बाद में जब मैंने लास्लो के साथ काम करना शुरू किया तो मुझे पूरी चीज़ समझ में आने लगी। हमने जो फ़िल्म बनाई, वह सिमेनॉन से प्रेरित है। लेकिन यह हमारी फ़िल्म है। जॉर्ज सिमेनॉन के बेटे ने भी फ़िल्म देखी और कहा, “यह सिमेनॉन के उपन्यास का पहला पूरी तरह सफल रूपांतरण है।” हमने कहानी में बहुत बदलाव किए थे। हमने लगभग आधी कहानी हटा दी थी। फिर भी उसे यह बहुत पसंद आया। लेकिन यह बात बहुत महत्वपूर्ण नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि हम एक ऐसे आदमी के बारे में फ़िल्म बनाना चाहते थे जिसकी उम्र 50 साल से ज़्यादा है। उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बहुत एक जैसी है। उसके टावर से पब तक और पब से घर तक का रास्ता बहुत छोटा है। सोना, खाना, फिर काम पर जाना। यही उसकी ज़िंदगी है। उसका परिवार है और उसकी ज़िंदगी में कुछ बदलने की कोई संभावना नहीं है। फिर एक दिन उसे एक छोटा-सा मौका मिलता है। उसके सामने एक लालच आता है। फ़िल्म इसी बारे में है कि वह उस मौके को कैसे खो देता है। एक अपराधी कुछ चुरा लेता है, लेकिन हमने अपराध की कहानी पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। फ़िल्म में “डैमनेशन” की तरह थोड़ा फ़िल्म नोयर भी है। शायद यही वजह थी कि मैंने इसे चुना।

हावर्ड एफ़: मेरा मानना है कि यह निश्चित रूप से देखने लायक है, जैसे आपकी बाकी सभी फ़िल्में। हमने शुरुआत प्रोलॉग से की थी, जो यूरोप के भविष्य और खासकर अपने देश हंगरी के भविष्य के बारे में बेला की प्रतिक्रिया थी। मैं इस बातचीत का अंत आपके कुछ साल पहले दिए गए एक इंटरव्यू की उस पंक्ति से करना चाहता हूँ, जो मुझे बहुत पसंद है। पत्रकार ने आपसे पूछा था, “क्या हंगरी में हालात सुधर रहे हैं?” और आपने जवाब दिया था, “हम हंगरी के लोग हमेशा बहुत आलसी रहे हैं। फ़ासीवाद के लिए बहुत आलसी, कम्युनिज़्म के लिए बहुत आलसी। हम बहुत ज़्यादा खाते हैं, बहुत ज़्यादा पीते हैं और बहुत ज़्यादा प्रेम करते हैं।”

बेला तार: यह सच है।

हावर्ड एफ़: धन्यवाद, बेला।

 

[ प्रस्तुत साक्षात्कार ऑडियंस के सामने एक सभागार में किया गया था, जहाँ फ़िल्मों के दृश्य भी दिखाये जा रहे थे। साक्षात्कार फ़िल्म विद्यार्थी के लिए एक तरह की मास्टरक्लास है। ]

 

सुमन शेखर मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर हैं और फ़िल्म लेखन, निर्देशन तथा अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पिछले एक दशक से रंगमंच से जुड़े सुमन ने लेखक और निर्देशक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई है।

उनकी रचनात्मक यात्रा सिनेमा और साहित्य, दोनों माध्यमों में समान रूप से विस्तृत है। उनकी फ़िल्में देश-विदेश के प्रतिष्ठित फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित हो चुकी हैं। अभिनीत फ़िल्म ‘ख़्वाबिदा’ को एनएफ़डीसी द्वारा बेस्ट रोमांटिक फ़िल्म का सम्मान प्राप्त हुआ, वहीं ‘The Saddist’ और फ़ीचर फ़िल्म ‘लाइफ टाइम डेथ’ में उनके अभिनय को सराहा गया।

सुमन शेखर की कहानियाँ और कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनकी कहानी कथादेश की ‘कथा-समाख्या’ में, बया और पाठ में आई हैं, कविताएँ ‘वागर्थ’, ‘आलोचना’, ‘सरस्वती’ पत्रिका समेत कई बड़ी पत्रिकाओं और वेब में आई हैं। सिनेमा, रंगमंच और साहित्य के बीच सक्रियता बनी हुई है। वर्तमान में वे मुंबई में रहकर लेखन और सृजन के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

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