अमेय कान्त
दुनिया भर में रिलीज़ होने वाली बड़े बजट और दिग्गज निर्देशकों की फ़िल्मों के मामले में यह साल भी याद किया जाएगा। इनमें प्रमुख हैं – स्पीलबर्ग की ‘डिस्क्लोज़र डे’, डेनिस वलनुव की ‘ड्यून-3’ और हाल ही में रिलीज़ क्रिस्टोफ़र नोलन की फ़िल्म ‘ओडिसी’। भारत की बात करें तो ‘आदिपुरुष’ के सदमे से उबरने के बाद दर्शकों को अब प्रतिभाशाली निर्देशक नितेश तिवारी की फ़िल्म ‘रामायण’ से कुछ बेहतर मिलने की उम्मीदें हैं जिसे दो हिस्सों में बनाया जा रहा है। ‘ओडिसी’ मशहूर हॉलीवुड फ़िल्म निर्देशक क्रिस्टोफ़र नोलन का महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है। ‘ओपनहाइमर’ की ज़बरदस्त कामयाबी के बाद यह नोलन की अगली फ़िल्म है।
माना जाता है कि करीब 700-800 ईसा पूर्व ग्रीक महाकवि होमर ने दो महाकाव्य रचे – ‘इलियड’ और ‘ओडिसी’। इलियड की कहानी यूनान और ट्रॉय के युद्ध की कहानी है। ट्रॉय को ‘इलियन’ भी कहा जाता था जिसके नाम पर इस महाकाव्य का नाम ‘इलियड’ रखा गया। ट्रॉय का युद्ध जीतने के बाद अलग-अलग राज्यों के सम्राट अपने-अपने देश लौट गए, वहीं इथाका के राजा ओडीसियस को अपने देश वापस लौटने में पूरे दस साल लग गए। ये दस साल उसके लिए बहुत रोमांचक रहे और मुश्किल भी। ‘ओडिसी’ ओडीसियस के अपने देश वापस लौटने की कहानी है।
रोमन मिथकों में भी ग्रीक मिथकों के समकक्ष अपने देवता हैं। ग्रीक में सबसे बड़े देवता ज़्यूस रोमन में ज्यूपिटर कहलाते हैं। समुद्र के ग्रीक देवता पोसाइडन रोमन में नेप्च्यून नाम से जाने जाते हैं। इसी तरह ग्रीक देवी अथीना के समकक्ष रोमन में मिनर्वा हैं, एफ़्रोडीटी वीनस हैं, एरोस क्यूपिड हैं, क्रोनस सैटर्न हैं और ग्रीकों के हेराकल्स रोमन में हरक्यूलिस हो जाते हैं। ग्रीक रानी हेलेन जो ट्रॉय के युद्ध की मुख्य वजह बनी, रोमन में हेलेना के नाम से जानी जाती है। ठीक इसी तरह इथाका-नरेश ओडीसियस को रोमन मिथकों में यूलिसिस के नाम से जाना जाता है।
अंग्रेज़ी साहित्य में ग्रीक-रोमन मिथकों के संदर्भ कई जगह देखने को मिलते हैं। ‘यूलिसिस’ नाम से जेम्स जॉयस का प्रसिद्ध उपन्यास है जिसमें यूलिसिस (यानी ओडीसियस) के घर लौटने की इसी कहानी को आधुनिक संदर्भों में दिखाया गया है। दिलचस्प बात यह भी है कि इस भारी-भरकम उपन्यास का पूरा वक्फ़ा सिर्फ़ एक दिन का है! प्रसिद्ध अंग्रेज़ी कवि अल्फ़्रेड टेनिसन ने ‘यूलिसिस’ नाम से ही एक कविता लिखी। लेकिन यह कविता यूलिसिस की यात्रा पर न होकर उसके घर लौट आने के बाद रोज़मर्रा के उबाऊ और नीरस जीवन को लेकर है जहाँ वह अपने खो चुके रोमांच को याद करता है।
ग्रीक महाकाव्यों ‘इलियड’ और ‘ओडिसी’ पर पहले भी कई फ़िल्में बनी हैं। लेकिन 2004 में आई ‘ट्रॉय’ खास तौर पर याद की जाती है। वॉर्नर ब्रदर्स की इस फ़िल्म को पहले नोलन ही निर्देशित करने वाले थे, लेकिन बाद में ‘ट्रॉय’ का निर्देशन वुल्फ़गैंग पीटरसन को मिल गया और नोलन के हाथों में वॉर्नर ब्रदर्स ने ‘बैटमैन बिगिन्स’ की बागडोर सौंप दी। ‘ट्रॉय’ को खास तौर से इसके फ़िल्मांकन और स्टार कास्ट के लिए आज भी याद किया जाता है। फ़िल्म में एकिलीस की भूमिका को ब्रैड पिट ने यादगार बना दिया था। कहानी का नैरेशन ओडीसियस की तरफ़ से था। कुछ समय पहले नेटफ़्लिक्स ने भी इसी पर आधारित एक मिनी सिरीज़ का निर्माण किया लेकिन वह उतनी चर्चित न हो सकी।
नोलन की फ़िल्म ‘ओडिसी’ अपनी रिलीज़ से पहले भी कई तरह से चर्चा में रही। एक कारण था – इसका क्रिस्टोफ़र नोलन की फ़िल्म होना। दूसरे कारण इसके ट्रेलर ने ही पैदा कर दिए। कई वजहों से दर्शकों के एक बड़े वर्ग ने इसे नापसंद भी किया, इस पर ढेरों मीम भी बने। एक वजह थी – ट्रॉय की हेलेन को फ़िल्म में अश्वेत दिखाया जाना जबकि हेलेन की छवि दुनिया भर में अब तक इससे अलग दिखाई गई है। ‘इलियड’ में भी एक जगह हेलेन को श्वेतहस्ता (व्हाइट आर्म्ड) बताया गया है। नेटफ़्लिक्स की ‘ट्रॉय’ सीरीज़ को लेकर भी इसी तरह की बहस हुई थी जब उसमें एकिलीस को अश्वेत दिखाया गया था। दर्शकों के मन में बैठी हुई छवियों को बदलना थोड़ा मुश्किल होता है। इंटरनेट पर कुछ स्रोतों से इसका एक कारण यह पता चलता है कि इतिहास में ग्रीक और अफ़्रीका के कई राजनयिक और व्यापारिक संबंध रहे थे, खास तौर से इथियोपिया के साथ (शायद आज का इथियोपिया नहीं)। इस वजह से ग्रीक मिथकों में अश्वेतों की भी एक खास जगह रही। ग्रीक रानी एंड्रोमेडा को भी अश्वेत ही वर्णित किया गया है। इन्हीं के वंश में आगे चलकर हरक्यूलिस जैसे महायोद्धा का जन्म हुआ। जिन दर्शकों ने पहले ‘ओडिसी’ और ‘ट्रॉय’ पर आधारित पुरानी फ़िल्में देख रखी हैं, कहीं न कहीं ‘ओडिसी’ में हेलेन की छवि का इस तरह टूटना उन्हें थोड़ा परेशान करता है। हालाँकि फ़िल्म में जितना स्क्रीन टाइम हेलेन को दिया गया है, उसे देखकर लगता है कि यह बात ख़ास मायने भी नहीं रखती। भारतीय दर्शकों के लिए तो और भी नहीं। फिर भी कहीं न कहीं एक सवाल मन में अटक जाता है कि निर्देशक को यह बदलाव करने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई।
एक दूसरी बहस नोलन की ‘ओडिसी’ में इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर भी हो रही थी। किसी पौराणिक कहानी में भाषा की अनुरूपता बहुत मायने रखती है इसलिए फ़िल्म में ‘डैड’ जैसे आधुनिक अंग्रेज़ी के शब्द थोड़े खटकते हैं। हालाँकि फ़िल्म के हिंदी डब में ‘पिताजी’ शब्द का इस्तेमाल ठीक लगता है।
क्रिस्टोफ़र नोलन की फ़िल्मों की जब-जब बात होती है, आईमैक्स का ज़िक्र ज़रूर होता है। उनकी लगभग हर फ़िल्म में आईमैक्स का भरपूर और किसी भी और निर्देशक से ज़्यादा इस्तेमाल किया जाता है। आईमैक्स तकनीक से न सिर्फ़ वीडियो का रेज़ोल्यूशन बढ़ जाता है बल्कि फ़्रेम की ऊँचाई ज़्यादा होने से और ज़्यादा डिटेल्स कैप्चर होते हैं। ‘ओडिसी’ के साथ खास बात यह है कि यह पहली ऐसी फ़िल्म है जिसे पूरी तरह आईमैक्स से शूट किया गया है। ख़ास इस फ़िल्म के लिए आईमैक्स ने कम वज़न का एक अलग कैमरा भी बनाया। हालाँकि ऐसी किसी भी फ़िल्म को देखने का असली अनुभव तभी लिया जा सकता है जब थिएटर भी आईमैक्स हो।
लेकिन इसके बावजूद फ़िल्म की कहानी और फ़िल्मांकन इतने बेहतरीन हैं कि बग़ैर आईमैक्स स्क्रीन के भी फ़िल्म गहरा प्रभाव छोड़ती है। होयते वैन होयतेमा नोलन के स्थायी सिनेमैटोग्राफ़र हैं। इस बार भी उन्होंने अद्भुत काम किया है। नोलन की कोशिश रहती है कि वीएफ़एक्स का कम से कम इस्तेमाल हो, इसलिए ज़्यादातर दृश्य वास्तविक सेट-अप में ही फ़िल्माए गए हैं। छोटी-छोटी बातों का बहुत ध्यान रखा गया है। संगीत जाने-माने कंपोज़र लुडविग गोरैन्सन ने दिया है जो नोलन की ही ‘टेनेट’ और ‘ओपेनहाइमर’ के अलावा कई चर्चित फ़िल्मों में संगीत दे चुके हैं। पुराने ग्रीक वाद्यों का इस्तेमाल ज़्यादा हुआ है। ट्रॉय में ग्रीक सेना का घुसने के समय सुनाई देने वाले बैकग्राउंड स्कोर की धीमी लय ट्रॉय के तबाह होने के साथ धीरे-धीरे तेज़ होने लगती है। साउंड इफ़ेक्ट कई जगहों पर बहुत सहजता के साथ आते हैं और चौंका जाते हैं।
सबसे ख़ास बात यह है कि फ़िल्म ओडीसियस की रोमांचक यात्रा न होकर उसके अपराधबोध और आत्मसंघर्ष को भी गहरी संवेदना के साथ दर्ज करती है। वह अपराधबोध जो उसे ट्रॉय में महसूस हुआ जब उसने खुद अपने हाथों से अपने विश्वासों और अपनी आस्थाओं को ढहते देखा, प्रेम को बिखरते देखा, उस विनाश को देखा जिसमें खुद उसकी एक बड़ी भूमिका रही। ग्रीक सम्राट एगमेम्नन ओडीसियस से काफ़ी पहले घर लौट आया था लेकिन लौटने पर उसके अपने ही अतीत के अँधेरे उसका इंतज़ार कर रहे थे। ओडीसियस जब घर लौटता है तो वह अकेला है, अपने साथियों को खो चुका है, थोपे हुए युद्धों में खुद को हार चुका है। फ़िल्म लंबी लड़ाइयों के बाद की इस मनोदशा को भी गहराई से छूती है।
कलाकारों का अभिनय उम्दा है। मैट डेमन, एन हैथवे, रॉबर्ट पैटिंसन जैसे ज़्यादातर कलाकार नोलन की पिछली फ़िल्मों में भी रहे हैं। एलियट पेज जेंडर ट्रांसफ़ॉर्मेशन से पहले नोलन की ‘इंसेप्शन’ में भी काम कर चुके हैं। शार्लीज़ थेरॉन, टॉम हॉलैंड और ज़ेंडाया पहली बार नोलन की किसी फ़िल्म में आए हैं। लुपिटा न्योंग बहुत कम समय के लिए लेकिन दोहरी भूमिकाओं में हैं।
एक अच्छा सिनेमा वही है जो कहानी को बेहतर ढंग से कहने के साथ-साथ हमारे फ़िल्म देखने के अनुभव को भी समृद्ध करे। इस फ़िल्म को देखते हुए यही महसूस होता है।
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