मनीष वैद्य
आज से क़रीब पचास साल पहले जल संकट की भयावहता आज की तरह गंभीर भले ही न रही हो, लेकिन देश के कुछ हिस्सों में यह तब भी एक बड़े संकट के रूप में साफ़ तौर पर नज़र आने लगा था। दरअसल यह आज के बड़े और देशव्यापी संकट की दस्तक थी, दुर्भाग्य से हम इस दस्तक को न तब समझ पाए और न ही आज गले-गले तक इस संकट में धँस जाने के बाद भी समझ पा रहे हैं। बात बहुत छोटी-सी है कि पानी से जीवन है, बिना पानी के जीवन की कल्पना भी बेमानी है। पानी को न हम उगा सकते हैं और न हम बना सकते हैं, उसे सिर्फ़ बचाया जा सकता है।
इसी छोटी-सी सरल बात को 1971 में बनी मशहूर फ़िल्म ‘दो बूँद पानी’ बड़ी तफ़सील और मार्मिकता के साथ पर्दे पर उकेरती है। आज से क़रीब पचास साल पहले निर्माता-निर्देशक और स्क्रिप्ट रायटर ख़्वाजा अहमद अब्बास ने इस फ़िल्म के ज़रिये राजस्थान की मरुभूमि के एक ऐसे गाँव का ख़ाका खींचा है, जहाँ बारिश के रूठ जाने और ज़मीनी पानी के ख़त्म हो जाने से कई सालों के अकाल में लोग बूँद-बूँद पानी तक के लिए मोहताज हैं। एक लंबे वक्फ़े तक राजस्थान की मरुभूमि में पानी एक सपना रहा है, एक किस्म की मृग मरीचिका। जो धूप में पानी की तरह चमकता तो था पर वहाँ पानी कहीं नहीं था। पूरी फ़िल्म उस गाँव से रूठे हुए पानी को फिर से लौटा लाने की जद्दोजहद में एक परिवार के संघर्ष की मार्मिक दास्ताँ कहती है। यह एक तरह से बूँद-बूँद पानी के लिए तरसते समाज का शोकगीत या उसका कारुणिक आख्यान रचता है।
इन पचास सालों में पानी का यह संकट विकराल होते हुए रेतीले इलाके से आगे बढ़कर अब लगभग पूरे देश में पसर चुका है। इस फ़िल्म का लेखक उस दौर में भविष्य के इस आसन्न संकट को अपनी दूरदर्शिता में देख पा रहा था। दरअसल कहानी लिखते वक़्त लेखक अपने निजी और अनुभूत ज़मीनी जीवनानुभवों से यथार्थ रचता है और अपनी कल्पना शक्ति से उसमें इस तरह रंग भरता है कि वह पूरी तरह सच नहीं होने पर भी पाठक या दर्शक को अपने आसपास या अपने से जुड़ा सच लगने लगता है। वहाँ लेखक पीछे छूट जाता है और कहानी का पाठक या दर्शक से निजी रागात्मक संबंध बन जाता है। इस फ़िल्म की कथा वस्तु भी ऐसी ही है। यह फ़िल्म तब दर्शकों को चौंकाती थी, डराती थी। आशंकाओं और चिंता के साथ पानी का सवाल उनके ज़ेहन में रोपती थी। इन सबके बावजूद हमने पचास सालों में इस फ़िल्म के कथानक से कुछ नहीं सीखा। न हमारे समाज ने और न ही किसी सत्ता ने। इसी कारण हमारे आसपास आज यह हालात बन रहे हैं। यहाँ तक कि हरे-भरे पानीदार समृद्ध इलाकों में भी अब पानी की पुकार साफ़ सुनाई देने लगी है। दुर्भाग्य से राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके के एक गाँव की यह कहानी अब देश के कई गाँवों की हक़ीकत बन चुकी है। साल-दर-साल ऐसे बदनसीब गाँवों की तादात बढ़ती ही जा रही है।
लोक कथाएँ लोक और सत्य को समाहित करते हुए सदियों से कही-सुनी जाती है। वैसे तो देश-दुनिया की अपनी हज़ारों-हज़ार लोक कथाएँ पीढ़ियों से किसी ख़ज़ाने की तरह हमारे आसपास मौजूद रहती आईं हैं पर राजस्थान तो लोक कथाओं की क़िस्सागोई का सबसे बड़ा गढ़ रहा है। यह फ़िल्म ऐसी ही एक बहुत ख़ूबसूरत प्रेम कहानी की लोक-कथा से शुरू होती है। भारतीय गाँव का एक युवक गंगासिंह ससुराल से विवाह के कुछ साल बाद गौना करवाकर पत्नी गौरी को अपने ऊँट से ला रहा है। रास्ते में दूर तक फैले रेतीले समुन्दर के बीचोबीच पत्थर के दो स्मारक बने हुए हैं, उनके पास दोनों कुछ देर सुस्ताने के लिए रुकते हैं। अनपढ़ गंगा की आठवीं जमात तक पढ़ी-लिखी पत्नी गौरी वहाँ उन पत्थरों पर लिखी हुई उस लोक-कथा की इबारत पढ़ती है। गंगा इसे ध्यान से सुनता है। दोनों पत्थरों पर लिखा है, “तू पी…”, वह आगे पढ़ती है,
जल थोड़ा, स्नेह बहुत
लगा प्रेम का बाँध
तू पी… तू पी…
कहते-कहते दोनों ने तजे प्राण
दो प्यासे प्रेमियों की इस अमर कथा में जब इस मरुभूमि में उनके पास महज दो बूँद पानी ही बचता है तो वे एक-दूसरे से उसे पीकर प्राण बचाने की मनुहार करने लगते हैं। दोनों के बीच इतना घना प्रेम था कि वे “तू पी…तू पी…” कहते-कहते अपने प्राण दे देते हैं लेकिन वह दो बूँद पानी कोई एक नहीं पीता। गंगा उससे सवाल करता है कि यदि ऐसा कोई मौका आया तो वह क्या करेगी। बिना एक पल गँवाए गौरी कहती है कि वह अपने पति के लिए जान दे देगी। आगे इसी क्रम में गौरी अपने पति को गाँव तक पानी लाने वाली नहर का काम करने के लिए प्रेरित करते हुए शिरी और फ़रहाद की कहानी सुनाती है कि शिरी के प्रेम की ख़ातिर ही फ़रहाद ने पहाड़ काटकर शिरी के गाँव तक पानी का मुँह मोड़ दिया था।
ये दोनों कथाएँ सदियों पहले के समाज में पानी के मोल को ज़ाहिर करती हैं। ये कथाएँ ही दरअसल इस फ़िल्म की आधारभूमि तैयार करती हैं। इन कथाओं से उपजा प्रेम गंगा और गौरी के अंतस को सींचता है और गंगा पानी के लिए एक बड़ी लड़ाई में जी-जान से जुट जाता है। यह एक उदात्त प्रेम कहानी भी है। पूरा गाँव ख़ाली हो जाने के बाद भी गौरी अपने प्रिय की प्रतीक्षा करते हुए उस गाँव में ही बनी रहती है। क्योंकि वह एक संकल्प लेकर गया है। स्त्री की बात का मान लेकर एक पवित्र मिशन पर गया है। वह सदियों से प्यासी अपनी धरती माँ के लिए पानी की सौग़ात लेने गया है। उसकी आँखों में अपने बाबा के सूखे खेतों की रगों में पानी रंजा कर खिलखिला कर लहलहाते हरे-भरे खेतों का सलोना सपना झिलमिलाता है। यहाँ प्रेम की गहरी अनुभूति है, पराकाष्ठा है, उदात्तता है।
दरअसल प्रेम में जो संकल्प होते हैं, वे बड़े से बड़े काम को करवा लेते हैं। कई बार मनुष्य के सामर्थ्य से भी बड़े काम। प्रेम के संकल्प में बड़ी ताक़त होती है। एक-दूसरे के प्रति प्रेमियों के निस्वार्थ प्रेम की बानगी और उसकी संकल्प शक्ति को हम अतीत और वर्तमान की कई असंभव कथाओं में संभव होते देखते हैं। हमारी पीढ़ी ने चाहे उस मरुभूमि में “तू पी… तू पी…” कहते हुए उन दो प्रेमियों को प्राण तजते नहीं देखा, हमने चाहे शिरी-फ़रहाद को नहीं देखा लेकिन हमने अपने इस समय में दशरथ माँझी को ज़रूर देखा है। वह हमारे वक़्त का आदमी है जो प्रेम के कारण ही जब एक संकल्प करता है तो उसे पहाड़ का सीना चाक करने से कोई रोक नहीं पाता। पहाड़ को अपने भीतर से आख़िर उसे ‘रास्ता’ देना ही पड़ा।
‘दो बूँद पानी’ भी इसी उदात्त प्रेम की कहानी है जो बड़ी ख़ूबसूरती से रची, बुनी और फ़िल्माई गई है। इसमें अपने वक़्त के कई मानीखेज और ज़रूरी सवाल भी गुँथे हुए हैं। साक्षरता, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, पलायन, स्त्री-विमर्श, विज्ञान, तकनीकी पर भरोसे और पानी-पर्यावरण के मुद्दों के साथ-साथ गाँव की मानसिकता, शोषण, अंधविश्वास, गाँवों में एक-दूसरे के साथ खड़े होने का भाव आदि को अच्छी तरह से चित्रांकित किया गया है। देखते हुए दर्शक को कभी यह अहसास नहीं होता कि यह किसी काल्पनिक भारतीय गाँव की कहानी है। उसे लगता है कि वह ख़ुद भी उसी गाँव और मिट्टी का बाशिंदा है। लम्बू इंजीनियर कहता है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैले हमारे मुल्क के रहवासी, चाहे वे किसी भी धर्म, सम्प्रदाय या जाति के क्यों न हों; सब एक हैं, सबकी तकलीफ़ें और सबकी मुक्ति का मार्ग एक ही है। हमें मिलकर इनका सामना करना होगा। पलायन और उसका दर्द सबके लिए समान होता है।
यह फ़िल्म नेशनल अवॉर्ड जीतने में कामयाब रही थी और दर्शकों के दिलों में भी गहरी पैठ बनाने में सफल रही थी। हालाँकि इस फ़िल्म पर हमेशा से यह सवाल भी बना रहा कि यह एक वृत्तचित्र है या फ़िल्म। इसमें पानी के मुद्दे को इस तरह हाईलाइट किया गया है कि कई जगह एक फ़िल्म से आगे बढ़कर यह एक वृत्तचित्र का आभास देने लगती है लेकिन मुकम्मल तौर पर देखें तो यह एक भरी-पूरी फ़िल्म ही है, जिसमें कथा के ज़रिए पानी की चिंता और उससे जुड़े सवालों को बड़ी साफ़गोई और प्रभावोत्पादक तरीके से कहा गया है।
यह पूरी फ़िल्म प्रकारान्तर से गाँव में पानी के सपने की कहानी है। इसके हर पात्र का एक ही सपना है कि रेगिस्तान के इस सूखे इलाके में किसी तरह पानी पहुँचे। कौल इंजीनियर इस सपने को गंगा के ही नहीं, गौरी, गंगा के पिता, गाँव के लोगों और सोनकी की आँखों में बो देता है। गंगा इन सपनों की ख़ातिर नहर को पूरा करने के काम में अपने आप को खपा देता है। यह फ़िल्म बड़ा संदेश देती है कि पानी को ज़मीनी काम करते हुए ही पाया जा सकता है। केवल बातें करते रहने, भाग्य की बारिश के विश्वास या परम्परागत जल स्रोतों के भरोसे बैठे रहने से बात नहीं बनने वाली। इसके लिए हम सबको मिलकर एक बेहतर कल की उम्मीद के साथ बारिश की बूँदों की मनुहार करना होगी। उन्हें सहेजकर साल भर उपयोग में लेने के लिए ज़रूरी जल संरचनाओं का निर्माण करना पड़ेगा।
एक तरफ़ हम विकास के बड़े-बड़े दावे करते हुए चाँद और मंगल पर जीवन की संभावनाएँ तलाश रहे हैं लेकिन ज़मीनी पानी के ख़ज़ाने को बचा नहीं पा रहे हैं। साल-दर-साल धरती का पानी ख़त्म होता जा रहा है। इसे हमारे पुरखों ने अपने खून-पसीने से ज़मीन की नीली नसों में रंजाकर हमारे उपयोग के लिए सहेजकर रखा था लेकिन हमने अगली पीढ़ियों तो दूर अपने आगे आने वाले वक़्त का भी ध्यान नहीं रखा और करोड़ों सालों से सुरक्षित इस जमा निधि का इतना दुरुपयोग किया है कि अब हर साल देशभर के कई इलाकों में बूँद-बूँद पानी के लिए लोगों को मीलों दूर तक भटकना पड़ रहा है।
इस फ़िल्म के कुछ संवाद बेहद मार्मिक बन पड़े हैं। जैसे गंगा के पिता उससे पूछते हैं कि बहू क्या लायी है तो वह कहता है, “हाँ दहेज लायी है।” वे निराश भाव से पूछते हैं – “पानी लाई है? परिवार के लिए, मेरे सूखे खेतों के लिए पानी लाई है क्या?” फिर पूछते हैं – “अच्छा.. बहू कैसी है?” वह बताता है कि सुंदर है तो वे कहते हैं – “तगड़ी है या नहीं, दो घड़ा पाणी सर पर उठाकर ला सके।“ जब गंगा “हाँ” कहता है तो बूढ़े पिता की आँखों में चमक भर उठती है। वे अपनी छोटी-सी ज़मीन में अकाल में सूखते जा रहे पौधों की तरफ़ उम्मीद से देखते हुए कहते हैं – “इस मुर्दा ज़मीन में जान आ जाएगी बहू के दो बूँद पानी लाने से। जगत में पाणी के अलावा कुछ नहीं। पाणी है तो हम हैं, पाणी नहीं तो कुछ भी नहीं।” बहू और बेटी दोनों दूर-दूर से सर पर घड़े लेकर भी आती हैं लेकिन पानी तो ज़मीन में ही ख़त्म हो गया तो उन्हें कहाँ से मिलता। वे अपने खेत में बाजरे की फ़सल उगाने का सपना देखते हुए पानी के इंतज़ार में ही आखिरकार दम तोड़ देते हैं।
इसी तरह एक और संवाद है, जब बहू दूर जाकर जैसे-तैसे एक घड़ा पानी भरकर लाती है तो सवाल उठता है कि इस पानी से कौन नहाए। गंगा अपने पिता से कहता है तो वे कहते हैं – “बुढला तो जिन दिन मरे, उनी दिन न्हावें।” जब वे अपनी बहू को नहाने के लिए अपनी बेटी से कहलवाते हैं तो वह कहती है – “मोकलवाना का एक दिन पहले ही नहाई है।” यानी यहाँ आने से एक दिन पहले ही नहाई है। अंततः गंगा उस पानी से सर से पाँव तक नहाता है तो पूरा गाँव अजूबे की तरह उसे देखने आ खड़ा होता है। कुछ और संवाद हैं जैसे “बोलने तो सब आवे,पाणी देने कोई नी आवे।” “म्हारी सौगंध.. अब नहर के पाणी के साथ ही वापस आना।” “जिनके जेब में पीसा है, उनके लिए पाणी की कोई कमी नहीं है।” “बालू में जो पाणी दिखे, वो नज़र का धोखा है।” आदि। इसके संवाद प्रेम धवन और सरदार जाफ़री ने लिखे हैं।
इसके गीत भी पानी की महत्ता बताने में पीछे नहीं हैं। जयदेव के मधुर संगीत से सजे कैफ़ी आजमी के गीत उस प्यास को और गहरी मानवीय संवेदना की तरफ़ ले जाते हैं, जहाँ फ़िल्म हमारी संवेदना को जगाकर चरम पर ले जाती है। पहला ही गीत, जो उन दिनों ख़ासा लोकप्रिय भी हुआ था – “पीतल की मेरी गागरी, दिल्ली से मोल मंगाई रे.. पाँवों में घुँघरू बाँध के, अब पनिया भरने जाई रे…।” इस गीत में रेगिस्तान में पानी लेने जाती पनिहारिनों की सुंदर सिनेमेटोग्राफ़ी भी बड़ी खूबसूरत बन पड़ी है। परवीन सुल्ताना और मीनू पुरुषोत्तम की दिलकश आवाज़ में इन्हें सुनना पुरसुकून अहसास है। कितनी सुंदर पंक्ति है “अपना मुखड़ा नया लगे, हम जब-जब देखें पानी में…।” इसी तरह आशा भोंसले की आवाज़ में “जा री पवनिया पिया के देस जा” बहुत मीठा गीत है।
“एक दिन ऐसा भी था, पानी था गाँव में… लाती थी गागरी भर के, तारों की छाँव में…” या “कहाँ से पानी लाएँ… कहाँ से प्यास बुझाएँ…” गीत बड़ा ही मार्मिक है। पूरा गाँव पलायन करता है और इधर पार्श्व में यह गीत बजता है- “अपने वतन में दो बूँद पानी नहीं तो यहाँ जिंदगानी नहीं… तोड़ के सारे रिश्ते-नाते… पानी जिस दिन आएगा, लौट आएँगे नाचते-झूमते… प्यारी धरती छोड़ें कैसे… कसमें अपनी तोड़ें कैसे…” गीतों के बोल कई जगह दर्शकों की आँखें गीली कर देते हैं।
‘दो बूँद पानी’ के ज़रिए स्त्री सशक्तिकरण के मुद्दे को बड़े मुखर ढंग से सामने रखा गया है। इसमें पढ़ी-लिखी गौरी का किरदार बड़ा ही सशक्त उभर कर आता है। पानी की समस्या का सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा घर की औरतों को उठाना पड़ता है। हमारे समाज में घर के लिए पानी जुटाने की ज़िम्मेदारी औरतों की ही है। फ़िल्म के ज़रिए औरतों द्वारा पानी के लिए किए गए श्रम को भी दिखाया गया है। इसमें सुदूर रेगिस्तान में बसे भारतीय गाँव की औरतें दस-बारह कोस दूर तक रेत के ढूहों को पार करते हुए अपने परिवारों के लिए ज़रूरी पानी का इंतज़ाम जैसे-तैसे करती हैं लेकिन बदकिस्मती से उन कुओं में भी पानी ख़त्म हो चुका है।
अपने समय के लोकप्रिय कलाकारों – सिम्मी ग्रेवाल ने गौरी, जलाल आगा ने गंगा, किरण कुमार ने कौल इंजीनियर तथा मधु चंद्रा ने गंगा की बहन सोनकी का किरदार बड़ी ही शिद्दत से निभाया है। वे अपने किरदारों में इतना रम गए हैं कि फ़िल्म में उन्हें अलग से पहचान पाना मुश्किल है। गाँव के इन किरदारों को निभाना अभिनय के लिहाज़ से बड़ा चुनौतीपूर्ण रहा होगा लेकिन फ़िल्म देखकर लगता है कि कलाकारों ने इसके लिए बहुत कड़ी मेहनत की। बोली-बानी और पहनावा ही नहीं, ग्रामीणों की तरह रेतीले इलाकों में काम करते हुए उनके हाव-भाव को अपना लेना बहुत कठिन होता है। सिम्मी ने तो अपने अभिनय में जैसे प्राण ही फूँक दिए हैं। भावात्मक दृश्यों में उनका मार्मिक अभिनय देखते ही बनता है। इस फ़िल्म में लम्बू इंजीनियर की भूमिका के लिए ख्यात अभिनेता अमिताभ बच्चन को लिया जाना था पर तब तक वे एक व्यस्त अभिनेता बन चुके थे, लिहाज़ा किरण कुमार से यह रोल करवाना पड़ा। किरण कुमार के करियर की यह पहली फ़िल्म थी, जिसने उन्हें ख़ूब पहचान दिलाई।
ख़ुद ख्व़ाजा अहमद अब्बास ने इस फ़िल्म की चर्चा करते हुए अपनी आत्मकथा ‘आय एम नॉट एन आयलैंड’ में लिखा है कि लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें राजस्थान के जल संकट पर फ़िल्म बनाने के लिए प्रेरित किया था। इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया। अब्बास साहब की फ़िल्में हमारे देश की धड़कन को बख़ूबी पहचानती हैं और इन्हें देखते हुए हम उस दौर के भारत की एक मुकम्मल झलक पाते हैं। युवा पीढ़ी को इन फ़िल्मों के ज़रिए अपने समाज को जानने, उसके इतिहास से रूबरू होने और इंसानियत के मूल्य सीखने की प्रेरणा मिलती है। वे फ़िल्मकार के साथ अच्छे उपन्यासकार, कहानीकार, पत्रकार और चिंतक भी रहे हैं। इसकी बानगी उनकी फ़िल्मों में मिलती है। वे कला माध्यमों के ज़रिए मनुष्यता के उच्चतम मूल्यों को समाज में स्थापित करने की ज़ोरदार पैरवी करते हैं। ‘दो बूँद पानी’ की कहानी में भी तकनीक की जगह मनुष्य और मनुष्यता ही सबसे ऊपर नज़र आते हैं।
गाँव में धीरे-धीरे जल संकट इतना भयावह रूप ले लेता है कि वहाँ के बाशिंदों को अपना घर-बार छोड़कर पलायन करना पड़ जाता है। अकेले गौरी का परिवार यहीं छूट जाता है। कारण वह अपने पति को गाँव तक नहर लाने वाली परियोजना में काम करने के लिए भेज चुकी है और यहीं रहकर उसका इंतज़ार करती है। गंगा वहाँ अपने काम में लम्बू इंजीनियर यानी कौल साहब के साथ जी-जान से जुटा रहता है और इधर गौरी प्रसव पीड़ा को सहती है। उसकी बहन सोनकी को कुएँ पर अकेली पाकर गाँव का ही मंगल सिंह उससे बलात्कार करता है। वह उसी की बंदूक छीनकर उस पर चलाती है, उसे मरा हुआ समझ कर भाग जाती है और नहर पर मज़दूरी करने लगती है। बाद में कौल इंजीनियर उससे शादी करता है।
आख़िरकार एक दिन गंगा का सपना उसकी ग़ैर मौजूदगी में पूरा होता है और इंदिरा नहर का छलछलाता हुआ पानी सुदूर पंजाब से आकर उस मरुभूमि की प्यास बुझाता है। पानी उसके गाँव तक पहुँचता है। मंगल सिंह जो अब तक यही मानता रहा कि यह नहर एक छलावा है और कभी गाँव तक नहीं आ सकती। वह अपने हालातों, अपने पिता की मौत और अपने डाकू बनने के पीछे पानी नहीं होने को ही ज़िम्मेदार मानता रहा। नहर आने पर वह ख़ुद भी अपनी बंदूक पानी में फेंक देता है।
हम इस फ़िल्म के निर्माण के दौर को याद करें तो पाते हैं कि साठ-सत्तर के दशक का वह एक नए राष्ट्र के निर्माण का समय था। लोगों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने वाली योजनाएँ आकार ले रही थीं। बड़े बाँध, नहरें, सड़कें, हॉस्पिटल्स और कॉलेज खुल रहे थे। उन दिनों के सरकारी अफ़सर, डॉक्टर और इंजीनियर भी बड़ी प्रतिबद्धता और कड़ी मेहनत से बेहतर देने की कोशिश करते थे। वे किसी भी हद तक जाकर और ज़्यादा मेहनत कर देश को नया रूप देने में जुटे थे। उसी दौरान फ़िल्म में दिखाई गई यह नहर भी बनकर तैयार हुई थी। सुदूर पंजाब से राजस्थान तक छः सौ किलोमीटर लंबी नहर देश की सबसे पहली बड़ी नहर परियोजना थी, जिसे रिकार्ड समय में पूरा किया गया था। वह भी भौगोलिक चुनौतियों और तमाम संसाधनविहीनता के बावजूद। इससे राजस्थान के फ़िल्म में दिखाए गए भारतीय गाँव की तरह के सैकड़ों गाँवों के क़रीब पंद्रह लाख हेक्टेयर सूखे खेतों तक पानी पहुँच सका।
दुखद यह भी है कि अब ऐसी फ़िल्में नहीं बन रहीं जो आम लोगों की समस्याओं से रूबरू हों। हमारी इधर की फ़िल्मों से गाँव, उसके लोग, उनकी बोली-बानी, किसान-मज़दूर, नदियाँ-पहाड़, खेत-खलिहान, कुएँ-पनघट सब तेज़ी से लुप्त हो चुके हैं। भूले-भटके नज़र भी आते हैं तो बड़े सुंदर-सलोने, जिनमें नायक-नायिका बेलिहाज नाच-गा सकें। आज फ़िल्में साधारण लोगों के जीवन से दूर होती जा रही हैं। तभी वे आम दर्शकों में उतनी लोकप्रिय नहीं हो पा रही हैं।
उस गाँव में पानी होने का, सूखी फसलों के लहलहाने का, रेगिस्तान में फूल खिलाने का सपना तो पूरा हो जाता है पर देश के कई गाँव आज भी इस सपने से बहुत दूर हैं। उन सब गाँवों को भी इस भारतीय गाँव के गंगा और सोनकी की तरह कड़ी मेहनत करना पड़ेगी। किसी गौरी को इसके लिए अपने पति को प्रेरित करना होगा। किसी पिता को अपने बेटों को इस काम में जुट जाने को कहना पड़ेगा। इधर के दिनों में हम पानी के मामले में बड़े लापरवाह होते जा रहे हैं। न हम बारिश का पानी सहेज पा रहे हैं और न ही पारम्परिक जल स्रोतों की परवाह कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में पानी के बड़े संकट से हमें कोई नहीं बचा सकता। हमें समय रहते पानी के लिए ज़रूरी चिंता करनी होगी। इसके लिए समाज और सरकारों को मिलकर स्थायी निदान निकालने होंगे ताकि हमारे चेहरों पर पानी बचा रह सके और हमारे गाँव-क़स्बे पानीदार बन सकें।
000
मनीष वैद्य समकालीन हिंदी के चर्चित कथाकार हैं। उनके प्रमुख कहानी-संग्रह हैं : ‘टुकड़े-टुकड़े धूप’, ‘फुगाटी का जूता’, ‘वांग छी’, ‘चयनित कहानियाँ’ और ‘गुलाबी इच्छाएँ’। उनका पहला उपन्यास ‘धूलकोट’ (2026) हाल ही में प्रकाशित हुआ है।
उन्हें ‘वागीश्वरी सम्मान’, ‘अमर उजाला शब्द छाप सम्मान’, ‘शब्द साधक रचना सम्मान’, ‘अंतर्राष्ट्रीय शिवना कथा सम्मान’, ‘स्पंदन कृति सम्मान’, ‘कुमुद टिक्कू श्रेष्ठ कथा सम्मान’, ‘प्रतिलिपि सम्मान’ तथा ‘यशवंत अरगरे सकारात्मक पत्रकारिता सम्मान’ सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी रचनाओं का पंजाबी, बंगाली, मराठी और उड़िया में अनुवाद हुआ है। उनकी एक कहानी विश्वविद्यालय के स्नातक पाठ्यक्रम तथा एक अन्य स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल है। जल संरक्षण पर उनकी पुस्तक ‘जमा रसीदें’ चर्चित रही है। उनकी रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी हुआ है।
ईमेल: manishvaidya1970@gmail.com
