सुमन शेखर
“प्यारे, तुम्हारी आँखें बदल गई हैं, फ़िल्म अब भी वही है।” मेरे मित्र ने कहा था।
फ़िल्में तब एक विशाल, सफ़ेद रंग की दीवार पर दिखाई जाती थीं। मुझे ख़ास तौर पर वो फ़िल्में याद हैं जिनमें पानी होता था। झरने, समुद्र तट, समुद्र की गहराई, नदियाँ या जलप्रपात। बहते पानी की आवाज़ सुनते ही सभी बच्चों को पेशाब करने की ज़बरदस्त इच्छा होती थी, और हम वहीं, स्क्रीन के दोनों ओर पेशाब कर देते थे। मेरे बचपन के सिनेमाघर में हमेशा पेशाब, चमेली और गर्मियों की ठंडी हवा की महक आती थी।
बचपन अब किसी और जीवन की कथा लगता है। बचपन में फ़िल्में देखने वाला अब ख़ुद फ़िल्म बनाने लगा है। फ़िल्म बनाना अपने आप पर किया गया अत्याचार है, ख़ासकर इसे लिखने और परदे पर उतारने वालों के लिए। यहाँ कुछ भी ठीक नहीं है, मैं भी नहीं।
‘मैं एक अभिनेता हूं और मैं बहुत अच्छे से कष्ट सहता हूं।’ मेरे अभिनेता का कहा गया वाक्य मुझे मेरी ही बात लगती है। दर्द और मेरा जीवन, किसने किस पर कब्ज़ा किया है, कह नहीं सकता।
जिन रातों में कई तरह के दर्द एक साथ होते हैं, उन रातों में मैं ईश्वर पर विश्वास करता हूँ और उनसे प्रार्थना करता हूँ। जिन दिनों मुझे केवल एक तरह का दर्द महसूस होता है, उन दिनों मैं नास्तिक हो जाता हूँ।
मुझे सपने बहुत आते हैं। मेरी ज़िन्दगी एक बुरे सपने के सिवा कुछ भी नहीं। सपने नींद को कुतरने के लिए आते हैं। जितना गहरा सपना, उतनी अधूरी नींद।
मेरे हिस्से ख़ुशी कभी अच्छी सी ख़ुशी की तरह नहीं आई। हँसना कभी सुंदर हँसी की तरह नहीं आया। रुकना हमेशा सुंदर से ठहराव से वंचित रहा। किसी के साथ की गई बातचीत, कभी भी सच्ची बातचीत की तरह महसूस नहीं हुई। जो भी आया हिस्से में, हमेशा अधूरा और भटकाव भरा ही आया। कुछ भी ऐसा नहीं आया कि उस पर उंगली रखकर कह सकूँ कि हाँ, यही तो चाहिए था, इसी का तो सपना देखा था।
क्या मुझे बचाया जा सकता है! कौन बचाएगा! प्यार पहाड़ों को हिला सकता है, लेकिन जिसे आप प्यार करते हैं उसे बचाने के लिए यह काफ़ी नहीं है। मेरे पास क्या है! पीछे पलटकर देखता हूँ, अपना जिया किसी और का जिया लगता है। ख़ुद के लिए कितना पराया सा हो गया हूँ!
इन दिनों मैं बहुत बुरी तरह फँस गया हूँ। एक अच्छी सुकूनभरी नींद न मिल पाने का श्राप झेला है मैंने सालों से। पहले नींद नहीं आती थी, अब आती है तो दुख से लदा हुआ उठ बैठता हूँ। बिस्तर के इर्द गिर्द असीम पीड़ा और एकांत का मलबा फैला होता है। जब भी आँखें बंद करता हूँ मन साठ के दशक में चहलकदमी करने लगता है। वही अधूरी ज़िन्दगी, वही अधूरे सपने, बमेड्रिड का वही छोटा सा गुफ़ानुमा सफ़ेद घर जिसकी छत से कितने ही बादलों को बरसते देखा, हाथ में हर वक़्त रहने वाली कोई किताब, एकांत का चरम, अकेलेपन का बड़ा घेरा, ख़ुद से दुगुनी उम्र के लड़के को पढ़ना सिखाता हुआ, धूप में गिरकर बेहोश होने का बहाना, माँ। अजीब से सपने। एक रात में कई-कई सपने। हर प्रहर अलग-अलग कहानी में धँसा फँसा पाता हूँ। हर सपना एक ट्रायल की तरह आता है। उठते ही फूटकर रोने का मन करता है। अब तो सपने आँखें बंद होने का इंतज़ार भी नहीं करते।
दिन, रात के बासी सपने की गुत्थी सुलझाते हुए बीत जाता है, हाथ कुछ भी नहीं आता। निराशा और अपराध के गर्त में लेटा रहता हूँ। ज़िन्दगी, कल्पना और वास्तविकता के बीच कहीं भँवर में अटका भर रह गया। अभिनय और निर्देशन के बिना दशकों यूँ ही बेज़ार गुज़ार देना! फ़िल्म ज़िंदगी है, या ज़िंदगी फ़िल्म की कहानी का प्लॉट!
लगातार पकड़े रहने की ज़िद और सनक के बावजूद दिनों दिन कला हाथ से मरीचिका सी छलती-छूटती रही। कितने जतन किए, स्वयं से कितना ही छल किया, हाथ में फिर भी कुछ नहीं आया। इससे अधिक दुखद बात क्या होगी एक कलाकार के लिए। अब न देह साथ देती है, न मन। व्याधियों का घर बनकर रह गया है मेरा शरीर। मन संग्रहालय है सारी स्मृतियों का।
वास्तविकता और कल्पना के बीच
रस्सी में बंधे गेंद सा झूलता ही रहा
न इधर का स्वाद मिला, न उधर की गंध
बहुत बाद में जब आँख खुली
गेंद रस्सी से टूटकर ब्रह्मांड में थी
परिक्रमा करती हुई-
किस्सों कहानियों की
छुटती-मिलती कई निशानियों की
भावों के शहद चाटती हुई
लोगों के टोह लेती हुई
जीने के धुत्त नशे में
कल्पना और स्मृति का स्वाद लेती हुई
गेंद दरसअल कहीं थी ही नहीं, फिर भी सब जगह थी
मैं रस्सी की तलाश में हूँ।
एडगर देगास ने कहा है, ‘कला वह नहीं है जो आप देखते हैं, बल्कि वह है जो आप दूसरों को दिखाते हैं।’ मेरी कला मेरा प्रतिबिम्ब नहीं है क्या!
मृत पेड़ से जीवन की कल्पना!
“तुम नींद से इतना भागते क्यों हो, सो जाया करो..” वह हर रात कहती है।
“कहीं से भागता हुआ कहीं और को पहुँच जाता हूँ। हम जहाँ पहुँचते हैं, वहाँ का हमने एक सपना देखा होता है, पहुँचते ही तसल्ली होती है। मेरे लिए थकान से भागकर नींद की शरण लेना तसल्ली की तरह है, लेकिन नींद और सपने के बीच की क्रूरता से मैं निचुर जाता हूँ। न बिना रहा जाता है, न साथ…” मैंने कहा।
वह मुस्कुराई।
“एक बात कहूँ!”
“हाँ, कहो…” उसने कहा।
“मुझे हर रात लगता है कि मैं सोऊँगा और शायद अगली सुबह मैं सबके लिए ‘और सोया हुआ ही रह गया’ की तरह याद किया जाऊँगा। क्षमा की मुद्रा पकड़े रात का सिर्फ़ दो प्रहर बचता है, डर और ज़्यादा दुहराव में बढ़ता जाता है, सुबह को मैं मृत न पाया जाऊँ…” मैंने कहा। मेरे आँसू गिरे, उसने उंगली में समेटकर चाट लिया।
“अब बस करो, सो जाओ” उसने कहा, “आज रात काफ़ी बात हो गई है।”
“मुझे बचा लो न!” मैंने घुटने पर बैठकर गिड़गिड़ाते हुए कहा।
उसने थपकी देकर फिर से हमेशा की तरह नींद की नदी में धकेल दिया। मैं हाथ-पैर मारता त्राहिमाम करता रहा। साँसें फूलती रहीं, आँखें बंद होती-खुलती रहीं..
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पता है सामने चल क्या रहा है, पूछना बेमानी है, फिर भी पूछ लेते हैं। उस समय न सवाल सही है, न जवाब। केवल आवाज़ सच है, हूक और तड़प सच है, चुप्पी, उदासी, बोलते हुए शब्द का अचानक हाथ से फिसल जाना और उसकी थाह लेना सच है। ऐसे में कहा गया कोई भी वाक्य, पूछा हुआ कोई भी सवाल केवल औपचारिकतावश नहीं है, यह एक लड़ाई है ख़ुद से। बड़ी लड़ाई, जिसके भीतर कई छोटी-छोटी लड़ाइयाँ एक साथ चल पल रही होती हैं, हम ही लड़ रहे होते हैं, हार रहे होते हैं, बार-बार हार रहे होते हैं, दुख ले रहे होते हैं। उस वक़्त बस एक आवाज़, एक आहट की ज़रूरत होती है जो हमें बचा सकती है, कुछ पल के लिए ही सही। उस वक़्त हमारा कहा गया कोई भी वाक्य सांत्वना है ख़ुद के लिए, ख़ुद की पीठ पर सहलाया गया हाथ है, जो एक पीठ से होकर दूसरी पीठ तक फैल जाता है।
टॉलस्टॉय ने कहा था, ‘लेखन आत्मा को माँजती है।’ मुझे न इसके बिना जीना आ रहा, न ही मरना आसान सा लगता है। अधूरी लिखित कहानियों के तले दबता जा रहा हूँ। सारे अधूरे वाक्य, अधूरी इच्छाएँ मुझे रौंदती जाती हैं। हर रोज़ इस उम्मीद में जागता हूँ कि शायद लंबे समय से चले आ रहे ‘अवकाश’ पर विराम लगे। इतना लंबा अवकाश नहीं मिलना था। शायद यह श्राप है ऊपर वाले का! मौक़ा था पादरी बनकर जीवन संवारने का, इस मौक़े को कहानी बनाने के पन्नों में दफ़न किया और इन्हीं कहानियों ने अब मुझे।
न उसने जीना आसान पाया
न मौत ही मौत की तरह आई
स्मृति और कला की आँच में
मौत बहुत धीमे-धीमे त्वचा छोड़ती रही
कला जैसे-जैसे छूटती गयी
ज़िन्दगी ने उतना ही अधिक निचोड़ा, मरोड़ा, चबाया, छोड़ा
उसकी प्रतिभा ने उसे ज़िन्दगी दी
उसकी प्रतिभा ही उसका हिंसक बनी।
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लियोनार्डो द विंची के शब्दों में कहें, ‘पेंटिंग कविता है जिसे महसूस करने के बजाय देखा जाता है, और कविता पेंटिंग है जिसे देखने के बजाय महसूस किया जाता है।’ फ़िल्म सारी विधाओं का मिश्रण है, जिसे जितना देखा जाता है उतना ही महसूस भी किया जाता है। बचपन में नदी के किनारे मेरे हाथ में छोटी-सी छड़ी थमाकर मुझे पानी में गिरे साबुन से खेलने का लोभ देकर मेरी माँ और उनकी सहेलियाँ गाना गाती रहीं, नृत्य करती रहीं। शायद वह प्रथम पल रहा होगा मेरे जीवन का जब मैंने पहली कविता लिखी होगी और उसका शीर्षक रखा होगा, ‘एकांत का शोर’। मुझे लगता है मेरी सारी कहानियाँ, फ़िल्म के संवाद उसी शीर्षक को दी गयी सहानुभूति हैं।
एक कलाकार के लिए उसका बीता हुआ बचपन सच्चा मार्गदर्शक होता है, कला की बनी-बनाई ज़मीन होता है। बचपन की पूर्णता कला में साफ़ दिख जाती है, बचपन का अधूरापन, अकेलापन, कमियाँ कला में रह-रहकर ज़िंदगी भर तमाम कोशिशों के बाद भी दिखती रहती हैं।
हम लिखते हैं ताकि उन यातनाओं को भूल सकें। हम फ़िल्म बनाते हैं ताकि उन कहानियों को दृश्य-रूप में दर्ज कर सकें, कहानियाँ कई दृश्यों के रूप में अदद बची रह जाएँ। फ़िल्म बनाना युद्ध के मैदान में लड़ना है। शुरुआती दिनों में अंधाधुंध युद्ध होता है, कहाँ तीर लगेगा, कहाँ चाकू चुभेगा, कहा नहीं जा सकता। यह एक नशा है, जो चढ़ गया तो फिर छूटता नहीं।
जीवन का एक हिस्सा होने वाली फ़िल्म जीवन के सारे हिस्से पर आधिपत्य स्थापित कर लेती है, मन और तन को सबसे ज़्यादा प्रताड़ित करती है, पोषित करती है, फिर प्रताड़ित करती है, फिर पोषित…..
अपनी ही कहानी का सुर अपना न लगे
कहानी मगर सबको सच्ची सी लगे
अपनी ही कहानी गर अपनी लगी
लोग नाप लेंगे नब्ज़ बड़ी आसानी से मेरी
धत्त,
आसान-सी चीज़ को और आसान नहीं करना था
अपनी ही कहानी कहनी थी
मगर नब्ज़ ज़रा दूर-सी लगनी थी
धत्त…
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शास्त्र कहता है, ‘कलाविद का हृदय बहुत नाज़ुक होता है, उसके हृदय में देवता का वास होता है,’ लेकिन काश, सारी कहानी ‘काश’ पर आकर अटक जाती है कि काश ऐसा हुआ होता।
हेनरी वार्ड बीचर ने कहा है, ‘प्रत्येक कलाकार अपने ब्रश को अपनी आत्मा में डुबाकर अपने आप का चित्र तैयार करता है।’ मैंने बिना काम के दिनों में अपने डिसप्ले पर रंगे हैं कई अधूरे क़िस्से, गद्य के हिस्से, कुछ ऐसे भी जिन्हें लिख देने के बाद दोबारा खोला ही नहीं गया। ये नोट्स अनंत के धुँध में झिलमिलाते किसी शक्ल से की गई बातें हैं, सारा लिखा एक बिंदु ‘…’ पर आकर रुका हुआ है। इसमें कई ग्लानियों, अनुभूतियों, अज़ाहिर अवसाद को मैंने सुख की तरह भरा है। जब जब लिखे को पढ़ता हूं सुख मिलता है, जाने कैसा ही सुख, अपने घाव को खुरचने में भला कैसा सुख!
जो भी मिला, अधूरा ही मिला। प्यार की सबसे ज़्यादा चाह में सबसे कम प्यार मिला। कहानियाँ कहने की चाह में कहानियाँ ही गुम हो गयीं। अच्छी फ़िल्म बनाने की चाह में देह ने भी धोखा दिया। सटीक शब्दों में कहूँ तो मैं अधूरेपन का देवता हूँ। मेरे हिस्से ऊपर वाले ने आकांक्षा भरी लेकिन उसकी पूर्ति का रास्ता खोखला दिया।
प्यार ज़िन्दगी नहीं है। यह श्रेष्ठ सुख देता है, पर बचा नहीं सकता, किसी को नहीं।
आँखें बंद करता हूँ तो माँ बार-बार सामने आ जाती है। उनसे किया गया संवाद, जो तब सुख लगता था, अब दुख के समंदर में धकेल देता है। संवाद क्रूर नर्तन करते हैं। ‘दर्द क्षणिक है, फ़िल्में अमर’, पढ़ा गया सबसे सुंदर वाक्य था। दर्द की मात्रा इतनी ज़्यादा रही कि हर जगह इसी का कब्ज़ा रहा। ‘अमरता’ धोखा है। हम दरअसल उतना ही बचते हैं, जितनी चाहत हमारी नस्लों को होती है, जिस नज़र से वे हमें देखती हैं।
जब भी याद करता हूँ, सुख से सूखा हुआ रेत-सा बचपन दिखता है।
“आपके अच्छे बेटे होने का फ़र्ज़ निभा नहीं पाया।”
“तुम निभाते भी कैसे! मुझे कोई अफ़सोस भी नहीं, बस एक आख़िरी चाह पूरी कर देना।”
“वादा है…”
“तुम निभाते कब हो!”
“इस बार ज़रूर…”
“दूर से देखती थी तो कला में सुख दिखता था। तुम्हें देखकर एहसास हुआ कि इससे अधिक पीड़ा कहीं नहीं है।” माँ मरने के ठीक पहले अस्पताल के बिस्तर पर है। “मैंने कहा था, बस अपनी कहानी में मुझे दर्ज मत करना। फिर भी तुम्हारी सारी कहानियों का सिरा मुझसे शुरू होकर मुझ तक आकर दम तोड़ता है। तुमने मुझे अपनी कहानी में इस्तेमाल किया है, अब मत करना।”
“आपको कैसे पता, माँ!”
“यही एक अधूरी चाह है, जिसकी पूर्ति में तुमने इतनी कहानियों, फ़िल्मों का सहारा लिया। शुरुआत में ही पूरी हो गई होती तो इतनी कहानियाँ जन्म न लेतीं। आख़िरी फ़िल्म में तुम इसके क़रीब पहुँचे, तो हाथ खड़े हो गए।”
“लेकिन लोगों ने मेरी कहानी में बारिश देखी, पुल देखे, जंगल देखे, माँ को नहीं देखा।”
“जिसने तुम्हें देखा है, फ़िल्मों में मुझे न देखकर भी मुझे महसूस कर लिया। तुम मुझसे अछूते न रहे, फ़िल्म तुमसे अछूती न रही।”
एक अदद-सी ख़ुशी के लिए
कई ख़ुशी के मौक़े मसलता रहा
उसकी धूल पर अजन्मी स्मृतियों का स्वाहा
वादा निभाना नहीं आया, पर करना नहीं छोड़ा
वह इतनी बेसुध रही जाने की राह में
कि उसके आख़िरी वाक्य के आने की कामना भी
शेष रह गई
शायद
अपने जल्दी ही भाँप जाते हैं अपनों के झूठे वादे का स्वाद
अधूरे वादों के डब्बे में भरते नए वादे
फिर बस उनकी मुस्कान में शेष रह जाती है।
जिस छटपटाहट से किसी कहानी ने फ़िल्म का रुख माँगा, जिस फ़िल्म ने ख्याति दी, कुछ अच्छे लोग दिए, एक वक़्त बाद उसी पर हँसना आया।
दोस्त ने कहा, तुम्हारा घर म्यूज़ियम है।
वह शायद मुझसे ज़्यादा मुझे जान गया था। मैं घर को म्यूज़ियम समझ रहा था, उसने मेरे भीतर म्यूज़ियम देख लिया। पेंटिंग्स, किताबें, फ़िल्मों और स्मृतियों का म्यूज़ियम।
“मैंने एक ड्राफ़्ट लिखा था ‘लत’ पर, वह अब एक कहानी की शक्ल में तैयार है।”
“मरते-मरते भी जाने कहाँ जाओगे इतना दुख भरकर! कला ताली के सिवा कुछ नहीं देती, बच्चे। चुप… शांत… अब तो सो जा…” उसने गले से लगा लिया।
और फ़िल्म बदल गई।
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Pain and Glory (स्पेनिश: Dolor y gloria)
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निर्देशक: Pedro Almodóvar
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वर्ष: 2019
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भाषा: स्पेनिश (Spanish)
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शैली: ड्रामा / आत्मकथात्मक मनोवैज्ञानिक नाटक
सारांश
Pain and Glory एक उम्रदराज़ फ़िल्म निर्देशक सल्वाडोर माल्यो (एंतोनियो बांडेरास) की कहानी है, जो शारीरिक बीमारियों, मानसिक थकान और रचनात्मक ठहराव से जूझ रहा है। वर्षों से फ़िल्मों से दूर हो चुके सल्वाडोर का वर्तमान बार-बार उसे उसके अतीत की ओर लौटाता है। बचपन की ग़रीबी, माँ के साथ बिताए दिन, पहली प्रेमानुभूति, युवावस्था का प्रेम, पुराने सहयोगियों से बिछड़ना और कला के प्रति उसका समर्पण, ये सब स्मृतियाँ वर्तमान के साथ लगातार संवाद करती रहती हैं।
एक पुरानी फ़िल्म की पुनर्प्रदर्शनी के बहाने उसका सामना उस अभिनेता से होता है जिससे वर्षों पहले उसका संबंध टूट गया था। इस मुलाक़ात के बाद वह अपने अतीत के कई अधूरे रिश्तों और घावों का सामना करता है। वह अपने पुराने प्रेमी से भी मिलता है और समझता है कि समय भले ही आगे बढ़ गया हो, स्मृतियाँ मनुष्य के भीतर जीवित रहती हैं। इसी यात्रा में वह दर्द से राहत पाने के लिए नशे की ओर भी जाता है, लेकिन अंततः लेखन और सृजन ही उसके लिए आत्ममुक्ति का माध्यम बनते हैं।
फ़िल्म का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह बाहरी घटनाओं से अधिक स्मृति, पछतावे, कला और आत्मस्वीकार की कहानी है। सल्वाडोर अपने जीवन की विफलताओं और उपलब्धियों को अलग-अलग नहीं देखता; वह समझने लगता है कि कलाकार की रचना उसके जीवन के सुख-दुःख से ही जन्म लेती है। इसी कारण फ़िल्म का शीर्षक – Pain and Glory (दर्द और गौरव) एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही जीवन के दो अभिन्न पक्ष बन जाते हैं।
इस फ़िल्म को पेद्रो अल्मोदोवार की सबसे व्यक्तिगत और आत्मकथात्मक कृतियों में माना जाता है। एंतोनियो बांडेरास के अभिनय को व्यापक प्रशंसा मिली और उन्हें 2019 के कान फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी मिला।
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सुमन शेखर मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर हैं और फ़िल्म लेखन, निर्देशन तथा अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पिछले एक दशक से रंगमंच से जुड़े सुमन ने लेखक और निर्देशक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई है।
उनकी रचनात्मक यात्रा सिनेमा और साहित्य, दोनों माध्यमों में समान रूप से विस्तृत है।
उनकी फ़िल्में देश-विदेश के प्रतिष्ठित फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित हो चुकी हैं। अभिनीत फ़िल्म ‘ख़्वाबिदा’ को एनएफ़डीसी द्वारा बेस्ट रोमांटिक फ़िल्म का सम्मान प्राप्त हुआ, वहीं ‘The Saddist’ और फ़ीचर फ़िल्म ‘लाइफ टाइम डेथ’ में उनके अभिनय को सराहा गया।
सुमन शेखर की कहानियाँ और कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनकी कहानी कथादेश की ‘कथा-समाख्या’ में, बया और पाठ में आई हैं, कविताएँ ‘वागर्थ’, ‘आलोचना’, ‘सरस्वती’ पत्रिका समेत कई बड़ी पत्रिकाओं और वेब में आई हैं। सिनेमा, रंगमंच और साहित्य के बीच सक्रियता बनी हुई है। वर्तमान में वे मुंबई में रहकर लेखन और सृजन के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
