“मैं एक किताब हूँ और तुम एक फ़ुटनोट”

राजेश सक्सेना

 

(“मैं एक किताब हूँ और तुम एक फ़ुट नोट” यह कथन हिटलर के सबसे खतरनाक और सेकंड इन कमान राइसमार्शल हरमन गोरिंग का है, जो अपने मनोचिकित्सक डगलस कैली से कहता है!)

 

न्यूरेम्बर्ग, एक ऐसा शहर जो दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर के अमानवीय विचारों की प्रयोगशाला बना और फिर बाद में द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर एवं जर्मनी की पराजय और पतन के बाद, युद्ध के अमानवीय अपराधों के लिए चले मुकदमों का साक्षी भी बना। इसी विषय पर आधारित हॉलीवुड की फ़िल्म “न्यूरेम्बर्ग” एक बेजोड़ फ़िल्म है, जो अमेज़ॉन प्राइम पर है और अच्छी बात यह कि यह हिन्दी डब में भी उपलब्ध है। यह फ़िल्म 60 लाख यहूदियों की नृशंस हत्याओं के अपराधियों पर मुकदमों के चलाए जाने की फ़िल्म है।

फ़िल्म की शुरुआत में मित्र देशों और ब्रिटिश सेना के सैनिक युद्ध क्षेत्र से लौट रहे हैं। ठीक इसी समय एक कार आ रही है, जिसमें से एक सफ़ेद कपड़ा लहरा रहा है। इस कार पर नाज़ी का स्वस्तिक चिह्न बना है। कार से एक रोबदार, मोटा व्यक्ति उतरता है। कुछ लोग चिल्लाते हैं, “अरे, ये तो हरमन गोरिंग है”, फ़्यूहरर (हिटलर) की आर्मी का सेकंड इन कमान, दाहिना हाथ! हरमन अपनी पत्नी और बच्ची के साथ सरेंडर करता है और उसे हिरासत में ले लिया जाता है!

पूरी फ़िल्म को जानने-समझने के लिए न्यूरेम्बर्ग के उन क़ानूनों को समझना ज़रूरी है, जो हिटलर ने 1934-35 में बनाए थे। ये क़ानून अप्रत्यक्ष रूप से यहूदियों (Jews) को चिह्नित कर उन्हें जर्मनी से बेदख़ल करने (निकालने) के लिए बनाए गए थे!

* नागरिकता क़ानून बनाया, जिसमें यहूदियों को अपनी नागरिकता सिद्ध करनी होगी!

* कोई यहूदी जर्मन से शादी नहीं करेगा!

* सरकारी अस्पताल, स्कूल आदि में यहूदी वर्जित रहेंगे!

* यहूदी लोगों को येलो बैंड अपने हाथ पर लगाना होगा, जिससे उन्हें आसानी से पहचाना जा सके!

* कोई भी यहूदी अपना निजी व्यापार नहीं कर सकेगा!

इस तरह के सात क़ानून बनाए और उन्हें पहले न्यूरेम्बर्ग और फिर जर्मनी में लागू किया! इन क़ानूनों के चलते हिटलर ने लगभग 60 लाख यहूदियों को अमानवीय यातनाओं के अनेक तरीकों से मौत के घाट उतारा और अंत में, जब जर्मनी की पराजय हुई, तो ख़ुदकुशी कर ली!

इस फ़िल्म में युद्ध के बाद बचे हिटलर के राइसमार्शल, सेकंड इन कमान हरमन गोरिंग, रुडोल्फ़ हैस, डॉ. ली सहित 22 युद्ध अपराधियों पर मुकदमा चलाए जाने का अद्भुत फ़िल्मांकन किया गया है। फ़िल्म ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है, जिसमें आर्य रक्त, जर्मन जातीय श्रेष्ठता-बोध को अहंकारी और सर्वशक्तिमान मानकर नाज़ियों के द्वारा किए गए अमानुषिक, कलुषित अत्याचारों और यहूदियों की शृंखलाबद्ध हत्याओं के अंतहीन सिलसिले को दिखाया गया है!

फ़िल्म में मुकदमों को चलाए जाने की तैयारी होती है, जिसमें ब्रिटेन, मित्र देश और अमेरिका आदि कहते हैं कि हरमन गोरिंग और उसके जीवित साथियों पर मुकदमा चलाकर उन्हें न्याय प्रक्रिया के बाद सज़ा दी जानी चाहिए! इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट का एक ट्रिब्यूनल बनाया जाता है, जिसमें चार जज हैं। अभियोजन के लिए अमेरिका के एक जस्टिस जैक्सन को चुना गया, जो अगले प्रमोशन के बाद अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई बनने की राह पर थे!

अंतर्राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल तय करता है कि मुकदमा उसी शहर में चलाया जाए, जहाँ से हिटलर के फ़ासीवाद, नाज़ीवादी विचार ने पूरे देश के लोगों को भी इस नाज़ी विचार की चपेट में ले लिया था। इसीलिए यह ज़रूरी था कि लोगों को बताया जाए कि जनता कितने गलत और ख़ूनी अपराधियों के विचारों को संरक्षण दे रही थी! सभी 22 अपराधियों में सबसे ज़्यादा बहादुर, युद्ध प्रबंधन और सैन्य संचालन में कुशल व निपुण, बुद्धिमान, मानसिक रूप से शक्तिशाली और प्रखर तर्क-संपन्न हरमन गोरिंग ही था। उसकी तर्क शक्ति के आगे हर कोई अनुत्तरित हो जाता था!

इन अपराधियों को सभ्य, मानवीय और न्यायिक प्रक्रिया चलाकर सज़ा दिलवाना एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य था! इस कार्य के लिए सेना के मनोचिकित्सक डॉ. कैली डगलस को अमेरिका से बुलाया गया! डॉ. कैली सभी 22 अपराधियों के साथ एक मनोवैज्ञानिक संबंध बनाता है और उनकी भावनाओं के अनुसार मानवीय व्यवहार करके उनसे इन भयानक अपराधों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण जानकारी इकट्ठा करता है। इसमें वह सबसे ज़्यादा भावुक और मानवीय रिश्ता हरमन गोरिंग के साथ बनाकर उसकी पत्नी एमी और बेटी इरडा के साथ भी विश्वसनीय रिश्ता बना लेता है और गोरिंग के पत्र ले जाकर देता है!

इस फ़िल्म में जातीय नफ़रत, कथित राष्ट्रीय विचारधारा से उपजी अमानवीय हिंसक गतिविधियाँ, हत्याएँ, नागरिक क़ानून और दूसरी तरफ़ न्याय, प्रेम, मनुष्यता के साथ अपराधियों को फाँसी के फंदे तक ले जाना भी है! सबसे मार्मिक और करुणा का रिश्ता डॉ. कैली डगलस का है, जो अपने कैदी और उसके परिवार के प्रति सदाशयता रखकर अपना काम करता है, लेकिन उसकी इस सदाशयता के कारण वहाँ से हटा दिया जाता है!

मुकदमे का ट्रायल चलता है और पूरे जर्मनी में प्रसारित किया जाता है। रिचर्ड जैक्सन अपना पक्ष रखते हुए कहते हैं, “हरमन गोरिंग, आप हिटलर की सेना के सेकंड इन कमान थे। आपने आदेश देकर यहूदी लोगों के लिए कंसन्ट्रेशन कैंप बनाए और उन्हें कभी गैस चैंबर में डालकर, कभी ज़िंदा जलाकर, कभी भूखा रखकर मार डाला।” हरमन आदेश देने की बात तो मानता है, लेकिन उन्हें यातनाएँ देने और मारने की बात नहीं स्वीकारता! वह जानता था कि जेल और कैंप में रखने की सज़ा को वह काट लेगा और फिर बाहर आकर सामान्य ज़िंदगी बिता सकता है। वह हत्याओं और यातनाओं के आरोप को सिरे से ख़ारिज कर देता है! जैक्सन कहता है, तुमने यहूदी नागरिकों के लिए फ़ाइनल सॉल्यूशन, मतलब सबको मार देने का आदेश दिया था! लेकिन गोरिंग अपने शब्दजाल में फँसाकर कहता है, “आप गलत कह रहे हैं, मिस्टर जैक्सन!”

दरअसल, सरेंडर उसका एक चालाकी भरा नाटक था। यह बात डगलस कैली समझ लेता है और जैक्सन को बताता है कि आप उसे तर्क में नहीं हरा सकेंगे। वह एक बहुत शातिर, तेज़ दिमाग़ का व्यक्ति है। आप उसे लगाव, मनोवैज्ञानिक भावनाओं के साथ समझकर ही मुकदमे में सच्चाई के पास ले जा सकते हैं! हरमन गोरिंग और डॉ. डगलस कैली के संवाद बहुत ही रोचक और तर्कपूर्ण हैं। गोरिंग डॉ. कैली से कहता है, “तुम मेरे साथ गुज़ारे गए अनुभव और समय को किताबों और लेखों में लिखकर प्रसिद्धि पाओगे!”

“मैं एक किताब हूँ और तुम एक फ़ुटनोट।” यह वाक्य कैली को लग जाता है। वह उसे मोटा हत्यारा कहता है! मुकदमे में जैक्सन पूछता है, “क्या आप 60 लाख यहूदियों की हत्याओं का अपराध स्वीकारते हैं?” फिर गोरिंग कहता है, “नहीं, हम कोई दोषी नहीं हैं। मैंने कोई अपराध नहीं किया, जो किया देश के लिए किया।”

अभियोजन पक्ष द्वारा सारे 22 अपराधियों को एक फ़िल्म दिखाई जाती है, जिसमें अश्वित्ज़ कैंप सहित सभी कंसन्ट्रेशन कैंपों में की गई अमानवीय बर्बरता और हत्याओं के ख़ौफ़नाक वाकए दिखाए जाते हैं, लेकिन गोरिंग नकार देता है। वह कहता है, “मैंने ऐसे… मैंने फ़ाइनल सॉल्यूशन का मतलब कंप्लीट सॉल्यूशन लिखा है। आप देख सकते हैं! हम यहूदियों को जर्मनी से निकालना चाहते थे, लेकिन मारने का कोई आदेश मैंने नहीं दिया। ये वहाँ कैंप के इंचार्ज, हिमलर और अमोन जैसे लोगों ने किया है। उनके किए के लिए मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ!”

गोरिंग का यह शब्दजाल जैक्सन पर भारी पड़ता देख, ब्रिटिश अभियोजक रिचर्ड ग्रांट खड़े होते हैं। वे हरमन से पूछते हैं, “हरमन, आप हिटलर के बाद सबसे बड़े सेना नायक हैं और आप यह नहीं जानते थे कि अश्वित्ज़, सोबिबोर, प्लासजो के कंसन्ट्रेशन कैंपों में कैदियों के साथ क्या हो रहा था?”

हरमन कहता है, “मैं नहीं जानता था!”

अश्वित्ज़ कैंप में लगभग 12 लाख यहूदियों को कसाई की तरह मार दिया गया। क्या आप यह नहीं जानते थे?

हरमन कहता है, “मैं नहीं जानता था!”

कुल मिलाकर 60 लाख यहूदी जनता को मार दिया गया। क्या आपको नहीं मालूम?

हरमन कहता है, “नहीं, मुझे नहीं मालूम।”

रिचर्ड ग्रांट पूछते हैं, “क्या आप अब भी खुद को हिटलर का अनुयायी मानते हैं?”

जवाब में हरमन कहता है, “हाँ, मैं मानता हूँ!”

बस, फिर गोरिंग और अपराधियों का दोष सिद्ध हो जाता है और उन्हें फाँसी की सज़ा सुना दी जाती है। लेकिन यहाँ गोरिंग फाँसी से पहले ही अपने पास दवाइयों में रखे साइनाइड के कैप्सूल को खाकर जान दे देता है! डगलस को याद आता है, गोरिंग ने कहा था “एक दिन मैं भी तुम्हें जादू दिखाऊँगा और फाँसी के फंदे से बच निकलूँगा।”

अंत में कैली अमेरिका पहुँचकर किताब लिखता है और कुछ प्रेस चर्चाओं में कहता है कि नाज़ी विचार, तानाशाह होना केवल हिटलर तक सीमित नहीं है। इस तरह के हिंसा भरे विचार के लोग खुद के लिए, सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं। ये कितने लोगों को मरवा सकते हैं। ये बहुत ख़तरनाक लोग हैं। ये दुनिया में कहीं भी हो सकते हैं, अमेरिका में भी हो सकते हैं! इस पर कैली की किताब बैन हो जाती है और खुद डॉ. कैली भी मनोरोगी हो जाते हैं और अंत में साइनाइड खाकर आत्महत्या कर लेते हैं! फ़िल्म का छायांकन बेहद प्रभावी और सच्चाई के नज़दीक जाकर दर्शकों को युद्ध और उसके पीछे की वैचारिक मनोदशा, अहंकार, श्रेष्ठ होने के दंभ और पागलपन को दिखाने में कामयाब होता है!

फ़िल्म के निर्देशक जेम्स वैंडरबिल्ट ने यह एक बहुत बेजोड़ फ़िल्म बनाई है। ऐतिहासिक क्रूरताओं और खलनायकों के कसाई जैसे व्यवहार को फ़िल्म में चित्रित करना बेहद चुनौती भरा था, लेकिन जेम्स ने यह कार्य बख़ूबी किया! फ़िल्म में सबसे ज़्यादा प्रभावशाली और सशक्त हरमन गोरिंग की भूमिका में कलाकार रसल क्रो का अभिनय बेहद प्रभावी है। उन्होंने गोरिंग के आत्ममुग्ध व्यक्तित्व और यथार्थ-बोध को बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। इसी कड़ी में डॉ. डगलस कैली की भूमिका में रेमी मेलक ने बहुत ज़बरदस्त अदाकारी की है। उनका जुड़ाव और व्यवहार बहुत वास्तविक लगा!

रॉबर्ट जैक्सन की भूमिका में मिशेल सायमन ने अपने सधे हुए अभिनय से न्यायिक, तार्किक, तथ्यपरक और वज़नदार भूमिका का निर्वहन किया! ब्रिटिश अभियोजक के रूप में रिचर्ड ग्रांट की सशक्त भूमिका डेविड मैक्सवेल ने बहुत प्रभावी तरीके से निभाई! जेलर कलन एंडर्स की भूमिका जॉन सेलेटरी ने बहुत सराहनीय और ताक़तवर अभिनय किया है! पूरी टीम ने इस फ़िल्म को अपनी भूमिकाओं से कामयाबी के शिखर तक पहुँचाया!

यह फ़िल्म हमें अपने समय में तानाशाही की नई प्रविधियों और स्वरूपों की ओर तथा फ़ासिज़्म के नए उपादानों, नाज़ी सेना के नए रूप के हिटलर, गोरिंग, गायबोल्स, हिमलर, अमोन, रुडोल्फ़, डॉ. ली जैसे लोगों और उनकी सोच से निर्मित SA और SS जैसे सैन्य समानांतर संगठनों की पहचान और उनकी सोच के प्रति आगाह करती है। यह एक ज़रूरी हस्तक्षेप के साथ बनी बहुत हिला देने वाली फ़िल्म है, जिसे ज़रूर देखना चाहिए!

000

राजेश सक्सेना

एम.ए. (हिन्दी साहित्य) और विद्युत इंजीनियरिंग में डिप्लोमा।
मध्य प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी से सेवानिवृत्त।

देश भर की कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, समालोचनाएँ और सामाजिक विषयों, फ़िल्मों तथा गीतों पर आलेख प्रकाशित होते रहे हैं।

कविता-संग्रह ‘उनके जीवन का मालकौंस’ मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित।

Share

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *