‘मट्टो की साइकिल’ : प्रश्नों के बीहड़ में भटकता मन

 

ललन चतुर्वेदी

 

मेरे लिए ‘मट्टो’ की साइकिल’ देखना निजी अनुभवों और स्मृतियों से गुज़रना है। इसे देखते हुए मैंने इसके संवादों से अधिक दृश्यों पर गौर किया। मैं कल्पना में खो गया कि यदि यह मूक फ़िल्म होती तो और भी लाजवाब होती। मट्टो (प्रकाश झा), उनकी नायिका और उनकी बेटियों की वेश-भूषा ही इतना कुछ कह देती है कि बहुत कुछ कहने को शेष नहीं रह जाता। इस फ़िल्म में साइकिल एक प्रतीक बन कर उभरी है तो दूसरी तरफ़ यह निर्धन व्यक्ति की बुनियादी ज़रूरत भी है। कहने दीजिए की साइकिल उसकी सहचरी है, मित्र है और उसके पूरे परिवार का सपना भी। एक गरीब आदमी का सपना हवाई जहाज़ चढ़ने का नहीं होता। उसके जीवन में छोटी-छोटी चीज़ें ही खुशियों का रंग भरती है। क्या कभी हमने सोचा है कि जिन चीज़ों को हम कबाड़ समझ कर फेंक देते हैं, उनसे करोड़ों लोगों की भूख मिटती है। हर आदमी के घर में कुछ चीज़ें गोदाम में डंप कर रखी हुई होती हैं। यदि वही वस्तुएँ किसी गरीब बच्चे को मिल जाएँ तो वह चहक उठेगा।

फ़िल्म का नायक मट्टो (प्रकाश झा) मजदूर है जिसके पास एक पुरानी साइकिल है। वह इसी साइकिल पर सवार होकर मजदूरी करने जाता है। घर में शौचालय भी नहीं है। उन्हें दिशा-मैदान (शौच-त्याग) के लिए बाहर खेतों में जाना पड़ता है। स्त्रियाँ कहाँ जाती हैं, इसे सप्रयोजन नहीं दिखाया गया। फ़िल्म की बारीकी यह है कि जिन चीज़ों को नहीं दिखाया गया है, वे ज़्यादा बोलती हैं। मैं समझता हूँ कि यह फ़िल्म रईसों के लिए तो बिल्कुल नहीं है। वे एजेंडे और मसाला फ़िल्मों के शौक़ीन होते हैं। यह फ़िल्म इस पारंपरिक मिथक को तोड़ती है कि फ़िल्में केवल मनोरंजन अर्थात इन्टरटेनमेंट के लिए नहीं बनायी जाती हैं। आयातित गाड़ियों में चलने वाले क्या समझेंगे कि एक मजदूर के लिए साइकिल का क्या महत्व है? सत्य तो यह है कि साइकिल उसके लिए लाइफ़-लाइन है। एक बेहद पुरानी साइकिल जिसकी चेन कई बार उतरती है तो कभी स्टैंड में स्प्रिंग नहीं होने से सड़क पर घसीटते हुई चलती है और उसे रस्सी या तार के सहारे बाँधकर चलाना होता है। चाहे वह जिस हालत में हो, उस साइकिल से पूरे परिवार को प्यार है। बेटियाँ उसे तल्लीन होकर पोंछती हैं। नायक उसे कई बार मिस्त्री के पास ले जाकर उसकी मरम्मत करवाता है। येन-केन प्रकारेण उसे चालू हालत में रखना उसके लिए बड़ी चुनौती है। वह दृश्य तो और मार्मिक है जब उसकी बेटी एक दिन उस साइकिल को मिस्त्री के पास ले जाती है और उसका सीट कवर बदलवाती है तब उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रह जाता है। एक बच्चे को नए कपड़े पहनने से जो खुशी होती है, वही खुशी उसे सीट कवर बदलवाने से होती है। आखिर कोई क्यों नहीं चाहे कि उसके पास एक अच्छी साइकिल हो। पूरे परिवार की सामूहिक इच्छा है कि उनके पास एक अच्छी साइकिल हो। पर क्या यह इतना आसान है? दैनिक मजदूरी से इतने ही पैसे मिलते हैं कि दो शाम की सूखी रोटी और एक सब्ज़ी नसीब हो।

गरीब व्यक्ति की हर इच्छा अपवित्र लगती है। एक तो वह सपने देखता नहीं है और दूसरे यदि देखता है तो नियति उसके सपनों को नाकाम करने के लिए तमाम साज़िशें करने से कब चूकती है? मट्टो एक दिन मजदूरी कर लौटते समय सड़क किनारे लकड़ियों के ढेर के सहारे साइकिल खड़ी करता है। गौर करने लायक है जिस साइकिल में स्टैंड नहीं होता लोग उसे दीवार के सहारे या पेड़ के सहारे खड़ा करते हैं। इस बीच एक बेलगाम ट्रैक्टर ड्राइवर उसकी साइकिल को रौंदकर भाग जाता है। पीछे-पीछे मट्टो बदहवास-सा दौड़ता है लेकिन वह ड्राइवर को पकड़ नहीं पाता है। आँसुओं से भरी हुई आँखों के साथ वह घर लौट कर ज़मीन पर बैठ जाता है। पूरे परिवार में मातमी सन्नाटा पसर जाता है। दुःख या पीड़ा का ऐसा दृश्यांकन वायरल है। यह वही साइकिल है जिस पर उसने एक दिन अपनी पत्नी को कैरियर पर बैठाकर अस्पताल भर्ती कराने के लिए ले गया था। बीमार पत्नी के लिए फलों का जूस खरीदने का दृश्य भी बहुत मार्मिक है। बाज़ार गरीब व्यक्ति को बेज़ार कर देता है। एक शेर याद आ रहा है –

घर आकर माँ-बाप रोये बहुत अकेले में।

मिट्टी के खिलौने भी बड़े महँगे थे मेले में। 

यह सोचने योग्य है कि आज के समय में भी हम ज़ोमैटो को फ़ूड डिलीवरी के लिए जितना  चार्ज दे देते हैं, उससे एक गरीब आदमी का भर पेट भोजन हो सकता है (मैं जानता हूँ मेरे इस ऑब्ज़र्वेशन पर लोग टीका-टिप्पणी कर सकते हैं)। साइकिल अब मरम्मत के योग्य नहीं रह जाती है और मट्टो उसे कबाड़ी वाले को बेच देता है। उसके अवशेष के रूप में एक घंटी बच जाती है, जिसे उसकी बेटी ने खुलवाकर रख लिया था। जिस समय साइकिल कबाड़ी वाला ठेले पर लाद कर चलता है परिवार के सभी सदस्य उसे ऐसे देख रहे होते हैं, मानो उसके प्रिय का शव जा रहा हो। इस फ़िल्म को देखते हुए शिद्दत से महसूस हुआ कि मौन कितना मुखर होता है !

अब मट्टो पैदल ही मजदूरी स्थल पर पसीने से तर-बतर होकर पहुँचता है और अकसर विलम्ब होने के कारण उसे मुंशी की डाँट सुननी पड़ती है। फ़िल्म में देखने योग्य यह भी है कि एक मामूली आदमी जब पैदल या साइकिल से सड़क पर चलता है, उसके समानांतर कीमती वाहनों से साधनसम्पन्न लोग तेज़ी से निकल रहे होते हैं। इसको बेहतरीन तरीके से कैमरामैन ने विज़ुअलाइज़ किया है। इसकी वास्तविक अनुभूति मुझे इसलिए हुई कि जब मैं शहर की सड़कों पर बरसात के दिनों में घर की ओर आ रहा होता था तो कभी-कभार कार वाले मेरे कपड़ों को कीचड़ से रंग कर निकल जाते थे। बहरहाल, मट्टो की पीड़ा में पूरा परिवार शामिल है। उसकी बेटी मनकों की माला बनाकर कुछ दिनों में कुछ पैसे इकठ्ठा करती है। वह अपने पिता को पैसा देती है और इस तरह उधारी/क़िस्त पर एक नयी साइकिल लेकर मट्टो बहुत तेज़ी से घर पहुँचता है। इस साइकिल पर बैठते हुए उसे ऐसे सुख और आनंद की अनुभूति होती है जो किसी को पहली बार हवाई जहाज़ में बैठने पर होती है। उसका घंटी बजाना बहुत कुछ कहता है। उसकी बेटियाँ साइकिल आ जाने से इतनी खुश है कि उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। घर आने पर उसकी पत्नी साइकिल पर जल चढ़ाती है, सिन्दूर लगाती है और प्रसाद बाँटती है। लेकिन यह खुशी अधिक दिनों तक रह नहीं पाती है। मजदूरी कर लौटते समय उसकी साइकिल गुंडे छीन लेते हैं। वह पागलों की तरह उनके पीछे दौड़ता है लेकिन वे चम्पत हो जाते हैं। उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। और अंत में थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने का दृश्य इस व्यवस्था की कलई खोल कर रख देता है। दरोगा जी झंडोत्तोलन की तैयारी में जानबूझकर व्यस्त हैं और स्कूली बच्चे हाथ में तिरंगा लिए हुए लौटते दिखाई दे रहे हैं। पार्श्व में ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां’ की ध्वनि सुनाई दे रही है। ये दृश्य हमारे सिस्टम के गाल पर करार तमाचा हैं। मट्टो  मानो अपने सपनों की कब्रग्राह से लौट रहा है। वह हमें प्रश्नों के बीहड़ में छोड़ गया है। मुझे बाबा नागार्जुन याद आ रहे हैं –

“किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है?”

मैंने प्रकाश झा की चर्चित फ़िल्में नहीं देखी है लेकिन इस फ़िल्म को देखने के बाद लगा कि वे कमाल के निर्देशक ही नहीं, अभिनेता भी हैं। कम समय, कम बजट और चुस्त संवाद के बल पर अच्छी फ़िल्में बन सकती हैं, अर्थपूर्ण हो सकती हैं। ‘मट्टो की साइकिल’ इसका अन्यतम उदाहरण है। मैं मानता हूँ कि फ़िल्में और किताबें कभी पुरानी और अप्रासंगिक नहीं होतीं। यह भावनाओं का संसार है।

(यह फ़िल्म एमेज़ॉन प्राइम पर देखी जा सकती है।)  

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ललन चतुर्वेदी (मूल नाम – ललन कुमार चौबे)

वास्तविक जन्म तिथि : 10 मई, 1966

मुज़फ्फरपुर (बिहार) के पश्चिमी इलाके में

नारायणी नदी के तट पर स्थित बैजलपुर ग्राम में

शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी), बी एड., विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नेट जेआरएफ़ परीक्षा उत्तीर्ण

प्रकाशित कृतियाँ : प्रश्नकाल का दौर , बुद्धिजीवी और गधे (दो व्यंग्य संकलन), ईश्वर की डायरी , यह देवताओं का सोने का समय है एवं आवाज़ घर (तीन कविता संग्रह) तथा साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर कविताएँ एवं व्यंग्य प्रकाशित।

संपर्क :

ललन चतुर्वेदी

202,असीमलता अपार्टमेंट

मानसरोवर एन्क्लेव,हटिया

रांची – 834003

मोबाइल नं. 9431582801

ईमेल: lalancsb@gmail.com

 

 

 

 

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