अमेय कान्त
तेज़ी से बदल रहा समय हर चीज़ का विकल्प देने का वादा करता है। कई बार भावनाओं का भी! अब हम हर चीज़ को ‘रेप्लिकेट’ कर लेना चाहते हैं। ऐसा करने में हम अक्सर भूल जाते हैं कि इस दौरान ख़ुद को कितना खो रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) हर दिन अपनी ही सीमाओं को ध्वस्त कर रही है। लेकिन इस तोड़-फोड़ में हमारे भीतर भी हर दिन कुछ टूट रहा है जिसका एहसास हमें ख़ुद नहीं हो पाता। हमारी ही ईजाद की हुई तकनीक और भीतर बचे मनुष्य के भीतर का द्वंद्व हर दिन और ज़्यादा गहरा, और ज़्यादा जटिल होता जा रहा है। ऐसे में कई बार ठहरकर सोचने की ज़रूरत पड़ती है कि विकल्पों की सीमा क्या है, किस दिशा में कहाँ तक जाकर ठहर जाएँ। ओटीटी पर इस साल की शुरुआत में आई मराठी फ़िल्म ‘उत्तर’ ऐसे ही सवालों से मुठभेड़ करती है।
मराठी फ़िल्म इंडस्ट्री से कई अच्छी और विचारप्रधान फ़िल्में निकलकर आती रही हैं। बॉलीवुड और दक्षिण के सिनेमा की चकाचौंध के बीच मराठी सिनेमा का अपेक्षाकृत छोटा लेकिन अपना एक खास दर्शक वर्ग है। अपनी हल्की-फुल्की कमर्शियल फ़िल्मों के बीच उसने गंभीर फ़िल्मों की गुंजाइश हमेशा बनाकर रखी है। इसके चलते पिछले कुछ सालों में ‘श्वास’, ‘कोर्ट’, ‘अस्तु’, ‘सैराट’, ‘नटरंग’, ‘काकस्पर्श’, ‘पिम्पळ’, ‘नटसम्राट’ जैसी विविध विषयों पर आधारित कई फ़िल्में देखने को मिली हैं। इसी कड़ी में फ़िल्म ‘उत्तर’ तकनीक और मानवीय संवेदना के बीच के जटिल रिश्ते को टटोलने की कोशिश करती है।
उमा भालेराव अपने बेटे निनाद के साथ पुणे के एक अपार्टमेंट में रहती है। उमा आकाशवाणी में एक जानी-मानी अनाउंसर है। निनाद एआई और मशीन लर्निंग विषयों के साथ ग्रेजुएशन कर रहा है। उमा की ज़िंदगी में अपनी नौकरी के अलावा उसका बेटा है, उसके अपने रिश्तों का एक छोटा-सा दायरा है। निनाद की नज़र में रिश्ते बस ज़रूरत के लिए होते हैं। एक दिन उमा अपने बेटे से कहती है, “माँ का पहला प्रेम उसकी संतान होती है।” बेटा पूछता है, ” लेकिन क्या पहला प्रेम टिकता भी है, या छोड़कर यूँ ही चला जाता है कहीं?” इस वाक्य में पिता के चले जाने की टीस है। माँ कहती है, “समय आने पर इसका उत्तर मिलेगा तुम्हें।” उमा एक सिंगल मदर है, लेकिन एक स्त्री भी है। यह बात समझना निनाद के लिए थोड़ा मुश्किल है। पिता के गुज़रने के बाद माँ के जीवन में किसी और पुरुष की मौजूदगी ने उसके किशोर मन को झकझोर दिया था। उसके मन में पड़ा कड़वाहट का एक बीज अब पेड़ बन चुका है। रिश्तों और प्रेम के प्रति वह रूखा हो गया है। कहीं न कहीं अपनी माँ के प्रति भी। भीतर बहती नदी को जैसे उसने खुद ही रोक दिया है। बचपन की दोस्त क्षिप्रा से वह कहता है कि किसी और की ज़िंदगी में दाखिल होना उसकी नज़र में बस बेवजह की घुसपैठ है। किसी परिचित से लगातार प्रेम और आत्मीयता से बात करना भी उसे एक बोझ लगता है।
उमा की दुनिया अचानक उथल-पुथल हो जाती है जब एक दिन एक छोटी-सी दुर्घटना के बाद उसे अपने दिमाग में मौजूद मल्टीपल क्लॉट्स के बारे में पता चलता है। उसके पास अब बस कुछ ही महीने बाकी हैं। वह यह बात निनाद को बताना चाहती है लेकिन बेटे के करियर के अहम पड़ाव में वह उसे इस मानसिक झटके से दूर भी रखना चाहती है। इस बीच निनाद के प्रोजेक्ट का अंतिम दौर है। वह एआई की मदद से ऐसा प्रोजेक्ट बनाना चाहता है जो न सिर्फ़ इंसान की तरह बात करे, बल्कि इंसान की कमी को भी पूरा कर दे। इसके लिए वह अपनी माँ की आवाज़ के कई सैम्पल लेता है। माँ की सारी हिदायतों, सारी बातों को वह सहेजना शुरू करने लगता है। माँ और बेटा अब अलग-अलग तरह से अपने अंतिम दौर में हैं। बेटा माँ के अंतिम दौर से बेख़बर है लेकिन माँ अपने बेटे के साथ इस समय को जी लेना चाहती है, उसके साथ हवा के झोंकों को महसूस करना चाहती है।
फिर एक दिन मन का बोझ हल्का करने के लिए उमा अपनी बड़ी बहन के पास कोंकण जाती है। जाते समय उसके अपने बेटे से “चल रे” कहने में एक ख़ालीपन है, अलविदा की गूँज है। बेटा अपनी माँ के लौटकर आने की अनिश्चितता से पूरी तरह अनजान है, लेकिन माँ खुद यह जानती है। एक ड्रामैटिक आयरनी है। इसी बीच निनाद का प्रोजेक्ट सफल हो जाता है। लेकिन उमा वापस नहीं लौट पाती।
निनाद कोंकण जाकर वहीं उमा की अंतिम क्रियाएँ पूरी करता है। वापस लौटने के बाद अब उसके पास बस माँ की कुछ चीज़ें और यादें हैं। साथ ही उसके बोले गए शब्द हैं, वाक्य हैं जो उसने अपने प्रोजेक्ट के लिए सहेजकर रख लिए थे। अपने अंदर की टूटन को वह ज़ाहिर नहीं करना चाहता। क्षिप्रा उसके भीतर के इस बाँध को तोड़ना चाहती है लेकिन निनाद ने अपने चारों तरफ़ ‘इट्स ओके’ और ‘कोई प्रॉब्लम नहीं है’ की मज़बूत दीवार बना रखी है। वह किसी को इस परकोटे के अंदर दाखिल नहीं होने देना चाहता। निनाद खुद को पूरी तरह प्रोजेक्ट बेहतर बनाने में झोंक देता है।
अपनी माँ की कमी को उसने एक सिम्युलेशन से पूरा कर लिया है। कम से कम उसे तो यही लगता है। अपने इस मशीन लर्निंग प्रोजेक्ट को वह ‘अन-मिस’ नाम देता है। एक बड़ी प्रतियोगिता के डेमो में भी उसका प्रोजेक्ट बेहद सफल रहता है जब उमा की मौत से अनजान एक बीमार बच्ची उमा की रोबोटिक आवाज़ को असली मानकर उससे बात करती है और इस कृत्रिम ‘उमा’ के मुँह से अपना नाम सुनकर जैसे उसे ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी मिल जाती है।
निनाद क्षिप्रा के साथ अपनी इस कामयाबी को सेलिब्रेट करता है। इस दौरान क्षिप्रा उसे उमा का एक संदेश सुनाती है जो उसने अपनी मौत से कुछ दिन अपने बेटे के लिए रिकॉर्ड किया था। पिछले कई दिनों से अपनी माँ की सिम्युलेटेड आवाज़ सुनने के बाद निनाद का जैसे अपने बनाए ‘अन-मिस’ के खोखलेपन से अचानक सामना हो जाता है। उसके भीतर के किले की सारी दीवारें ध्वस्त हो जाती हैं। वह फूट-फूटकर रोता है।
‘उत्तर’ एआई और आई (माँ) के प्रतीकों के बहाने कई अहम सवाल खड़े करती है। रोबोटों और एआई द्वारा इंसानों पर हावी होने को लेकर भारत और दुनिया भर में कई फ़िल्में और सीरीज़ बनती रही हैं। कहीं इसे भविष्य के बड़े संकट की तरह देखा गया है, कहीं मददगार की तरह। यह फ़िल्म तकनीक को कहीं दोष नहीं देती, बस दर्शक को उस महीन लकीर के नज़दीक ले जाकर खड़ा कर देती है जो संवेदना की तकनीकी प्रतिकृति और उसकी वास्तविक अनुभूति के बीच फ़र्क करती है।
क्षितिज पटवर्धन इससे पहले कई फ़िल्मों का लेखन कर चुके हैं लेकिन बतौर निर्देशक यह उनकी पहली फ़िल्म है। एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि अगर लोग चीज़ों को महसूस कर पा रहे हैं तो इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। फ़िल्म में दो पीढ़ियों के बीच फ़र्क को दिखाने के लिए सिनेमैटोग्राफ़ी और कलर टोन का खास ध्यान रखा गया है। निर्देशक ने कलाकारों को अभिनय के लिए काफ़ी स्पेस दिया है। उमा की भूमिका में रेणुका शहाणे का अभिनय बेहद सहज है। उनके किरदार का हल्का-फुल्का हास्य उसके भीतर की जीवंतता और रिश्तों के प्रति उसकी सहजता को उभारता है। उनका अपनी खनकदार आवाज़ में आकाशवाणी पर ‘नमस्कार’ कहना दूरदर्शन के धारावाहिक ‘सुरभि’ में बतौर एंकर उनकी भूमिका की याद दिला जाता है। उमा के बेटे निनाद की भूमिका अभिनय बेर्डे ने निभाई है। ऋता दुर्गुले क्षिप्रा और निर्मिती सावंत उमा की बड़ी बहन की भूमिका में हैं।
‘उत्तर’ उन सूक्ष्म अनुभूतियों की बात करती है, जिनका कोई विकल्प नहीं होता। मशीनें बेशक हमारी स्मृतियों, आवाज़ों और संवादों को सहेज सकती हैं, उन्हें हमारे और करीब ला सकती हैं। लेकिन जो खो चुका है या जिसे हम लगातार खोते जा रहे हैं, उसे ‘अन-मिस’ कर लेना शायद ख़ुद को दी गई एक तसल्ली भर है।
000
(यह फ़िल्म फ़िलहाल ज़ी-5 ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म पर अंग्रेज़ी सबटाइटल्स के साथ उपलब्ध है।)
