नसीरुद्दीन शाह : जब अभिनेता पर्दे से उतरकर नागरिक बन जाता है

संदीप नाईक

 

एक अभिनेता, एक रंगकर्मी और असहमति की नैतिक आवाज़

​भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार अपनी फ़िल्मों की संख्या से नहीं, बल्कि उन फ़िल्मों के भीतर उठाए गए सवालों की धार से पहचाने जाते हैं। नसीरुद्दीन शाह इसी दुर्लभ परंपरा के प्रतिनिधि हैं। उन्होंने हिंदी सिनेमा में परंपरागत ‘नायक’ की घिसी-पिटी परिभाषा को सिरे से ख़ारिज किया। वे प्रेमी बने, मजदूर बने, शिक्षक, पुलिस अधिकारी, सनकी फ़ोटोग्राफ़र, कुंठित क्लर्क और सत्ता के दमनकारी चेहरे भी बने। लेकिन पर्दे पर व्यवस्था के विभिन्न रूपों को जीने वाले इस अभिनेता की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वास्तविक जीवन में भी उन्होंने सत्ता, समाज और बहुसंख्यकवाद के सामने अपनी नागरिक आवाज़ को कभी गिरवी नहीं रखा।

​नसीरुद्दीन शाह को केवल ‘स्टार’ या ‘अभिनेता’ कहना उनके फलक को सीमित करना है। वे समानांतर सिनेमा (पैरेलल सिनेमा) और भारतीय आधुनिक रंगमंच के उस आंदोलन का केंद्र बिंदु हैं, जिसने कला को महज़ सस्ता मनोरंजन बनने से रोककर सामाजिक चेतना का औज़ार बनाया।

 

राष्ट्रीय नाटय विद्यालय, पूना फ़िल्म और टेलीविजन संस्थान और मोटलीकी नाट्य-यात्रा

​नसीरुद्दीन शाह के शिल्प की नींव राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) और पुणे के पूना फ़िल्म एवं टेलीविजन संस्थान (FTII) में पड़ी। 1973 में NSD से स्नातक होने के दौरान इब्राहिम अल्काज़ी के कठोर अनुशासन और वैश्विक नाट्य-साहित्य ने उनकी अभिनय दृष्टि को गढ़ा। बाद में FTII में उन्होंने कैमरे की भाषा और उसकी सूक्ष्मताओं को समझा।

​हालाँकि शाह स्वयं मानते हैं कि अकादमिक संस्थानों ने उन्हें केवल तकनीकी औज़ार दिए; अभिनय की वास्तविक, गहरी समझ उन्हें थियेटर के मंच पर लगातार पसीना बहाने से मिली। 1970 के दशक के उत्तरार्ध में जब ओम पुरी, शबाना आज़मी, अमरीश पुरी और स्मिता पाटिल जैसी प्रतिभाएँ सिनेमा का चेहरा बदल रही थीं, तब नसीर ने थियेटर को कभी अपनी प्राथमिकताओं से बाहर नहीं होने दिया।

​1979 में टॉम ऑल्टर और बेंजामिन गिलानी के साथ मिलकर उन्होंने नाट्य-समूह मोटली‘ (Motley Productions) की स्थापना की। सैमुअल बेकेट के वेटिंग फ़ॉर गोडो (Waiting for Godot) से शुरू हुआ यह सफर इस्मत चुग़ताई, सआदत हसन मंटो और एंटोन चेखव की साहित्यिक रचनाओं के मंचन तक विस्तृत हुआ। नसीर के लिए थियेटर कोई साइड-बिजनेस या पार्ट-टाइम शौक नहीं, बल्कि वह साधना-स्थल रहा जिसने कैमरे के सामने उनके यथार्थवादी अभिनय को हमेशा जीवंत बनाए रखा।

एक नाटक के दृश्य में नसीरुद्दीन शाह और रजित कपूर
नायक नहीं, हाड़-माँस का संशयग्रस्त मनुष्य

​70 और 80 के दशक के मुख्यधारा सिनेमा में जब नायक ‘लार्जर दैन लाइफ़’ होकर असंभव कारनामे कर रहा था, तब नसीरुद्दीन शाह ने पर्दे पर एक कमज़ोर, जटिल और संशयग्रस्त मनुष्य को स्थापित किया।

  • स्पर्श (1980): दृष्टिबाधित स्कूल के प्रधानाचार्य अनिरुद्ध परमार की भूमिका में उन्होंने अंधेपन को किसी लाचारी या दया के पात्र के रूप में नहीं, बल्कि गहरे आत्मसम्मान और भीतर छिपी असुरक्षा के रूप में जिया। यहाँ प्रेम केवल रोमांस नहीं, दो स्वायत्त व्यक्तियों के बीच बराबरी की खोज है।
  • इजाज़त (1987): गुलज़ार की इस क्लासिक में वे ‘महेन’ के किरदार में वैवाहिक दायित्व, पुरानी स्मृतियों और अपराधबोध के त्रिकोण में फँसे ऐसे व्यक्ति हैं, जिसे समाज आसानी से गलत ठहरा सकता है, लेकिन दर्शक उसकी आंतरिक वेदना से इनकार नहीं कर पाते।
  • पार (1984): गौतम घोष निर्देशित इस फ़िल्म में वे ‘नौरंगिया’ नाम के भूमिहीन, शोषित दलित मजदूर की भूमिका में हैं। गंगा के उफनते पानी में सुअरों के झुंड को तैरकर पार कराने वाला उनका दृश्य भारतीय सिनेमा के सबसे त्रासद और शक्तिशाली दृश्यों में गिना जाता है। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ-साथ वेनिस अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का प्रतिष्ठित ‘Volpi Cup’ मिला, जो वैश्विक स्तर पर भारतीय अभिनय क्षमता की ऐतिहासिक स्वीकृति थी।
  • मासूम (1983): डी.के. मल्होत्रा के रूप में वे एक ऐसे पिता और पति का द्वंद्व जीते हैं, जिसका अतीत उसके शांत पारिवारिक जीवन में तूफ़ान खड़ा कर देता है।
फ़िल्म ‘पार’ का एक दृश्य
व्यवस्था के खिलाफ़ खड़ा अकेला आदमी

​नसीरुद्दीन शाह का सिनेमाई विद्रोही कभी सतही डायलॉगबाज़ी नहीं करता; उसका प्रतिरोध सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की उपज होता है। कुछ फ़िल्में उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व दर्शाती है जो उन्हें अभिनता ही नहीं, वरन एक सजग नागरिक बनाती है। ​अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है (1980): सईद अख्तर मिर्ज़ा की इस फ़िल्म में एक कैथोलिक मैकेनिक का गुस्सा व्यक्तिगत खीझ से शुरू होकर वर्ग-संघर्ष और ट्रेड यूनियन की राजनीतिक चेतना तक पहुँचता है। ​आक्रोश (1980): गोविंद निहलानी की इस कृति में वे एक युवा वकील भास्कर कुलकर्णी की भूमिका में हैं, जो व्यवस्थागत भ्रष्टाचार, पुलिसिया दमन और आदिवासियों पर हो रहे संस्थागत अत्याचार के बीच अपनी अंतरात्मा की आवाज़ से जूझता है। ​जाने भी दो यारो (1983): कुंदन शाह की इस कल्ट डार्क-कॉमेडी में सुधीर मिश्रा के रूप में नसीर सत्ता, रियल एस्टेट माफ़िया, भ्रष्ट नौकरशाही और सनसनीखेज़ मीडिया के गठजोड़ को नंगा करते हैं। ​अ वेडनसडे (2008): एक अनाम ‘कॉमन मैन’ (A Stupid Common Man) की भूमिका में वे उस आम नागरिक के संचित आक्रोश को विस्फोटक रूप देते हैं, जिसे राज्य और आतंकवादी तंत्र दोनों ने उपभोग की वस्तु समझ लिया है।

एक अलग किरदार के रूप में वे फ़िल्म “मिर्च मसाला” के क्रूर सूबेदार के रूप में आते हैं, जहाँ वे प्रतिनायक की ऊँचाई पर पहुँचाते हैं। ​एक महान अभिनेता की पहचान सिर्फ़ संवेदनशील किरदारों से नहीं होती, बल्कि वह नकारात्मकता को भी उतनी ही शिद्दत से चित्रित कर सके। केतन मेहता की मिर्च मसाला (1987) में नसीरुद्दीन शाह ने औपनिवेशिक व्यवस्था के अहंकारी, लंपट और क्रूर ‘सूबेदार’ का चरित्र निभाया। ​ग्रामोफ़ोन सुनने का शौकीन यह सूबेदार पुरुषवादी सामंतवाद और राजकीय आतंक का प्रतीक है। जब मिर्च फ़ैक्ट्री के भीतर स्मिता पाटिल (सोनबाई) और अन्य ग्रामीण महिलाएँ उसके अहंकार पर लाल मिर्च का तीखा प्रहार करती हैं तो नसीर का अभिनय उस पराजित सामंती पौरुष की छटपटाहट को अमर बना देता है। यह भूमिका सिद्ध करती है कि अभिनेता का काम अपने विचारों का प्रचार करना नहीं, बल्कि पात्र के भीतर उतरकर व्यवस्था के क्रूरतम चेहरे को भी प्रामाणिक बनाना है।

फ़िल्म ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ का एक दृश्य
फ़िल्मों में स्त्री-पुरुष संबंधों का पुनर्पाठ

​नसीरुद्दीन शाह के सिनेमा में महिला पात्र कभी ‘शो-पीस’ बनकर नहीं आए। शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, रेखा और दीप्ति नवल जैसी सशक्त अभिनेत्रियों के साथ उनके काम ने हिंदी सिनेमा में स्त्री-पुरुष संबंधों को सामंती सोच से मुक्त किया। ​मंडी (1983) में वेश्यालय की राजनीति हो, भवनी भवाई का लोकनाट्य रूपक हो, या इजाज़त की उलझी हुई घरेलू त्रासदी – उनके पुरुष पात्र महिलाओं को नियंत्रित करने वाले रूढ़िवादी नायक नहीं, बल्कि उनके स्वतंत्र अस्तित्व, बौद्धिक क्षमता और निर्णयों से टकराते या उन्हें स्वीकारते नज़र आते हैं।

​मीडिया, सत्ता और असहमति का साहस

​भारत सरकार ने नसीरुद्दीन शाह को 1987 में पद्मश्री और 2003 में पद्मभूषण से सम्मानित किया। उन्हें तीन बार राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (स्पर्श, पार और इक़बाल) मिल चुका है। लेकिन इन सर्वोच्च राजकीय सम्मानों ने कभी उनकी ज़ुबान पर ताला नहीं लगाया।

सम्मान / मंच वर्ष / क्षेत्र महत्व
Volpi Cup 1984(वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल) ‘पार’ के लिए मिला यह पुरस्कार विश्व सिनेमा में दुर्लभ उपलब्धि है
पद्मश्री एवं  पद्मभूषण 1987 & 2003 भारतीय कला और सिनेमा में योगदान के लिए राष्ट्रीय नागरिक सम्मान
राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार 1979, 1984, 2005 ‘स्पर्श’, ‘पार’ (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) और ‘इक़बाल’ (सहायक अभिनेता)
मोटली थियेटर 1979 से निरंतर भारतीय और विश्व क्लासिक्स का स्वतंत्र, समझौता-विहीन मंचन

सत्ता और मीडिया के साथ उनका संबंध हमेशा तनावपूर्ण रहा है। जब देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण, नागरिकता कानून (CAA-NRC) के विरोध, लिंचिंग की घटनाओं या अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरे बढ़े, तब नसीर ने किसी सुरक्षित चुप्पी की आड़ नहीं ली। उन्होंने बेबाकी से कहा कि एक जागरूक नागरिक होने के नाते देश के वर्तमान और भविष्य पर चिंता जताना उनका संवैधानिक अधिकार है।

​जब मुख्यधारा का बड़ा फ़िल्मी तबका सत्ता के सामने नतमस्तक था या सुरक्षित तटस्थता चुन रहा था, तब नसीर ने छात्रों, अल्पसंख्यकों और प्रदर्शनकारियों के लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में बयान दिए। मीडिया द्वारा उन्हें ‘विवादित’ करार देने की कोशिशों के बावजूद वे कभी अपने बयानों से पीछे नहीं हटे। उनका मानना रहा है कि कला यदि अपने समय के जलते हुए सवालों से मुंह मोड़ ले, तो वह केवल चापलूसी बनकर रह जाती है।

समानांतर से मुख्यधारा और हॉलीवुड तक

​नसीरुद्दीन शाह की रेंज केवल यथार्थवादी या गंभीर सिनेमा तक सीमित नहीं रही। वे उन गिने-चुने अभिनेताओं में हैं जिन्होंने कला सिनेमा के साथ-साथ मसाला और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा में भी उतनी ही सहजता से काम किया:

  1. मुख्यधारा में विविधता: त्रिदेव (1989) और विश्वात्मा (1992) जैसी विशुद्ध कमर्शियल फ़िल्मों में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, तो वहीं मोहरा (1994) में अंधे उद्योगपति/विलेन ‘जिंदाल’ के रूप में अपनी संवाद अदायगी का लोहा मनवाया। सरफ़रोश (1999) में ‘गुलफ़ाम हसन’ के रूप में एक गज़ल गायक और सीमा पार आतंकवाद के साज़िशकर्ता का उनका दोहरा चरित्र अभिनय का पाठ माना जाता है।
  2. अंतरराष्ट्रीय सिनेमा: मीरा नायर की मॉनसून वेडिंग (2001) में तनावग्रस्त पंजाबी पिता ‘ललित वर्मा’ का किरदार हो, या हॉलीवुड फ़िल्म द लीग ऑफ़ एक्स्ट्राऑर्डिनरी जेंटलमेन (2003) में ‘कैप्टन निमो’ की भूमिका, उन्होंने कभी भी स्टीरियोटाइप भारतीय पात्रों तक खुद को सीमित नहीं रखा।
  3. नई पीढ़ी के साथ प्रयोग: मकबूल (2003) में ओम पुरी के साथ भ्रष्ट पुलिसवाले की भविष्यवक्ता जोड़ी, इक़बाल (2005) का शराबी कोच और इश्किया (2010) का उम्रदराज़ आशिक ‘खालूजान’ यह दर्शाते हैं कि उम्र के हर पड़ाव पर उनका शिल्प और अधिक धारदार होता गया।
फ़िल्म ‘सरफ़रोश’ का एक दृश्य
समाहार – असहमति की नैतिकता और सिनेमाई विरासत

​नसीरुद्दीन शाह अपनी आत्मकथा एंड देन वन डे (And Then One Day: A Memoir) में अपने अंतर्विरोधों, असफलताओं, घमंड और असुरक्षाओं को बिना किसी लाग-लपेट के स्वीकार करते हैं। यह निर्मम ईमानदारी ही उनके अभिनय और व्यक्तित्व की रीढ़ है। ​वे अभिनय में किसी ‘स्टाइल’ या ‘मैनरिज़्म’ के कायल नहीं हैं; वे किरदार की आंतरिक सच्चाई को पकड़ने वाले अभिनेता हैं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी विरासत केवल तीन राष्ट्रीय पुरस्कार, दर्जन भर क्लासिक फ़िल्में या वेनिस का ‘वोल्पी कप’ नहीं है। उनकी विरासत है – नागरिक साहस। ​नसीरुद्दीन शाह ने भारतीय सार्वजनिक जीवन को याद दिलाया है कि एक कलाकार की पहली निष्ठा सत्ता, बाज़ार या लोकप्रियता के प्रति नहीं, बल्कि सत्य, मानवीय गरिमा और संविधान के प्रति होती है। जब पर्दा गिर जाता है और रोशनी बुझ जाती है, तब एक अभिनेता का ‘स्टारडम’ समाप्त हो सकता है; लेकिन नसीरुद्दीन शाह एक ऐसे बेचैन, सवाल पूछते और असहमति दर्ज कराते नागरिक के रूप में हमेशा खड़े दिखाई देते हैं, जिसकी इस लोकतंत्र को सबसे ज्यादा ज़रूरत है।

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संदीप नाईक अंग्रेज़ी साहित्य, कानून, सामाजिक कार्य और शिक्षा शास्त्र सहित छह विषयों में स्नातकोत्तर हैं, साथ ही उन्हें एक शोध डिग्री भी प्राप्त है। चार दशकों तक शिक्षा, सामाजिक संगठनों और योजना आयोग के साथ काम करने के बाद इन दिनों घुमक्कड़ी, लेखन-पठन और अनुवाद में सक्रिय हैं।

देवास में रहने वाले संदीप नाईक का अनुभव और सरोकार किसी एक भूगोल तक सीमित नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने आदिवासी इलाकों, गाँवों, जंगलों और कस्बों में लोगों के जीवन को करीब से देखा-समझा है। देश के अलग-अलग हिस्सों की यात्राओं और सामाजिक अनुभवों की छाप उनके लेखन में साफ़ दिखाई देती है।

उनकी कहानियों के साथ पाँच सौ से ज़्यादा आलेख और डेढ़ सौ से ज़्यादा कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। इन दिनों वे कानून की पढ़ाई और अदालतों की बहसों को भी उतनी ही जिज्ञासा से समझ रहे हैं। घुमक्कड़ी, लेखन और सामाजिक सरोकारों के बीच संदीप नाईक लगातार नई चीज़ें सीखने और भारत को उसके लोगों और जीवन के बीच से समझने वाले लेखक हैं।

 

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