दो हज़ार फ़ीट ऊपर, जहाँ डर के सिवा कुछ नहीं बचता

दीप्ति कुशवाह

 

फ़ॉल’ के दूसरे भाग के आने से पहले पहली फ़िल्म की स्मृति

आईमैक्स में ‘फ़ॉल 2: डेडपॉइंट’ का पोस्टर देखा तो उसकी रिलीज़ की उत्सुकता बाद में हुई, पहले पैर थरथरा उठे। स्मृति सीधे 2022 की उस जंग लगी मीनार पर जा पहुँची, जहाँ दो लड़कियाँ फँसी थीं और सिनेमाघर में सुरक्षित बैठा दर्शक अपने तलवों के नीचे की ज़मीन टटोलने लगा था। मुझे याद आया, फ़ॉल – भाग एक देखने के बाद मैं कुछ देर तक धड़कनों को सँभालने की कोशिश करती बैठी रही थी।

कुछ फ़िल्में कहानी समाप्त होने के साथ हमारा पीछा छोड़ देती हैं, कुछ हमारे शरीर में कहीं रह जाती हैं। ‘फ़ॉल’ दूसरी तरह की फ़िल्म थी। अब उसके दूसरे भाग का पोस्टर सामने था और देह ने मस्तिष्क से पहले, पहली फ़िल्म को पहचान लिया।

मनुष्य को ऊँचाइयों से प्रेम है। वह पहाड़ पर चढ़ता है, शिखर पर झंडा गाड़ता है, आकाश छूती इमारतें बनाता है और फिर उन्हीं की सबसे ऊँची मंज़िल पर खड़ा होकर नीचे फैली दुनिया को देखकर अपने सामर्थ्य पर मुग्ध होता है। धरती पर रहते हुए उसे अपने छोटे होने का बोध बना रहता है, ऊँचाई पर पहुँचकर कुछ क्षणों के लिए भ्रम होता है कि उसने अपनी लघुता पर विजय पा ली है। लेकिन ऊँचाई की अपनी क्रूर बुद्धि होती है। वह मनुष्य को ऊपर बुलाती अवश्य है, पर वहाँ पहुँचाकर उसकी सारी वीरता से एक-एक वस्त्र उतरवा लेती है।

साल 2022 में आई स्कॉट मैन की फ़िल्म ‘फ़ॉल’ इसी क्रूर बुद्धि की कहानी है। अब इसका दूसरा भाग ‘फ़ॉल 2: डेडपॉइंट’ आ रहा है। इस बार संकट एक नए पर्वत, नई चढ़ाई और नए पात्रों के साथ लौटेगा। संभव है कि निर्माता पहले से अधिक खतरनाक दृश्य रचें, कैमरा और गहरे गर्त में झाँके और दर्शकों की धड़कनों से फिर वैसा ही खिलवाड़ किया जाए। लेकिन दूसरे भाग की प्रतीक्षा करते हुए पहली ‘फ़ॉल’ याद आती है।

‘फ़ॉल’ की कहानी बहुत विस्तृत नहीं थी। शायद उसे विस्तृत होना भी नहीं चाहिए था। बेकी अपने पति डैन को एक पर्वतारोहण दुर्घटना में खो चुकी है। एक वर्ष बाद भी वह उस मृत्यु से बाहर नहीं आ पाई। जीवन उसके लिए चलना नहीं, केवल बीतना रह गया है। तभी उसकी साहसी और कुछ हद तक दुस्साहसी मित्र हंटर उसे रेगिस्तान के बीच खड़े लगभग दो हज़ार फ़ीट ऊँचे, जर्जर बी-67 टेलीविजन टावर पर चढ़ने के लिए तैयार करती है। उद्देश्य है डैन की राख को वहाँ से हवा में बिखेरना। मानो जितनी ऊँचाई पर उसकी स्मृति को मुक्त किया जाएगा, उतनी ही गहराई से बेकी स्वयं जीवन में लौट सकेगी।

दर्शक सुरक्षित स्थान पर बैठा पहले ही समझ जाता है कि जंग खाए हुए उस टावर पर चढ़ना अच्छा विचार नहीं है। दर्शकों की सबसे बड़ी योग्यता यही है कि वे दूसरों के संकट से कुछ मिनट पहले बुद्धिमान हो जाते हैं। हम मन-ही-मन दोनों लड़कियों को रोकना चाहते हैं, जबकि जानते हैं कि यदि वे हमारी सलाह मान लेंगी तो फ़िल्म वहीं समाप्त हो जाएगी। वे चढ़ती हैं और हमारे भीतर भय भी उनके साथ-साथ सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है।

फ़िल्म की असली सफलता उसकी कथा में नहीं, उस भय को देह तक पहुँचा देने में है। कैमरा कभी उनके पैरों के नीचे से झाँकता है, कभी टावर के सँकरे ढाँचे को विराट खाली आकाश के बीच अकेला छोड़ देता है। नीचे धरती दिखाई देती है, पर इतनी दूर कि उसका होना भी किसी सहायता का आश्वासन नहीं देता। एक समय के बाद दर्शक को लगता है कि वह फ़िल्म देख नहीं रहा, स्वयं उस लोहे के ढाँचे से चिपका हुआ है। हथेलियों में नमी आने लगती है, पैरों में एक विचित्र झनझनाहट भरती है और शरीर कुर्सी पर सुरक्षित होने के बावजूद ऊँचाई की भाषा समझने लगता है।

टावर की सीढ़ी टूटकर नीचे गिरती है और बेकी तथा हंटर सबसे ऊपर स्थित छोटी-सी गोलाकार जगह पर फँस जाती हैं। इसके बाद फ़िल्म भय की किसी विशाल प्रयोगशाला में बदल जाती है। वहाँ न छाया है, न पर्याप्त पानी, न भोजन, न मोबाइल का नेटवर्क और न नीचे उतरने का मार्ग। उनके चारों ओर खुला आकाश है, पर यही खुलापन कारागार बन जाता है। सामान्यतः बंद कमरा घुटन पैदा करता है, ‘फ़ॉल’ बताती है कि कभी-कभी अनंत विस्तार भी मनुष्य को उतनी ही निर्ममता से कैद कर सकता है।

फ़िल्म यहाँ एक बहुत आदिम सत्य तक पहुँचती है; सभ्यता से दो हज़ार फ़ीट ऊपर मनुष्य बहुत शीघ्र अपने आविष्कारों से वंचित हो जाता है। महँगा फ़ोन वहाँ केवल एक चमकता हुआ निर्जीव टुकड़ा है। सोशल मीडिया पर हज़ारों लोगों को रोमांच दिखाने वाली हंटर के पास ऐसा कोई दर्शक नहीं जो उसकी वास्तविक चीख सुन सके। कैमरा हर क्षण दर्ज कर सकता है, पर बचा नहीं सकता। नीचे संसार अपनी गति से चलता रहता है और ऊपर दो लड़कियों का समूचा ब्रह्मांड पानी की कुछ बूँदों, एक रस्सी, दूरबीन, ड्रोन और घटती हुई आशा में सिमट जाता है।

‘फ़ॉल’ को केवल सर्वाइवल थ्रिलर मानना उसके भीतर उपस्थित भावनात्मक अँधेरे को अनदेखा करना होगा। बेकी केवल टावर से नीचे उतरने का संघर्ष नहीं कर रही, वह डैन की मृत्यु, अपने अपराधबोध और हंटर से जुड़े एक कटु रहस्य से भी जूझ रही है। ऊँचाई पर कोई बात छिपाने की जगह नहीं रहती। वहाँ झूठ भी खुले आकाश में खड़ा दिखाई देता है। हंटर की निर्भीकता के भीतर उसकी असुरक्षा है और बेकी की दुर्बलता के भीतर जीवित रहने की वह शक्ति, जिससे वह स्वयं अब तक अपरिचित थी।

फ़िल्म में कई प्रसंग ऐसे हैं जिनकी तार्किकता पर प्रश्न उठाए जा सकते हैं। कुछ संयोग सुविधाजनक लगते हैं, कुछ उपाय अविश्वसनीय और कुछ दृश्य स्पष्टतः दर्शक को चौंकाने के लिए रचे गए हैं। लेकिन भय के अपने तर्क होते हैं। जिस क्षण एक गिद्ध किसी जीवित या अर्धमृत देह के ऊपर मँडराता है, उस क्षण दर्शक पटकथा की कमियाँ गिनना स्थगित कर देता है। भूख, प्यास और धूप धीरे-धीरे मनुष्य को ऐसी सीमा तक ले जाते हैं, जहाँ नैतिकता और सभ्यता के सारे सुंदर वाक्य पीछे छूटने लगते हैं। जीवित रहने की इच्छा किसी दर्शन की भाषा में नहीं बोलती; वह रक्त, हिंसा और अंतिम उपाय की भाषा जानती है।

पानी और ज़रूरी सामान वाला बैग उनसे कुछ नीचे लगी संचार-डिश पर अटक गया है। हंटर रस्सी के सहारे वहाँ उतरती है और किसी तरह बैग हासिल भी कर लेती है, लेकिन ऊपर लौटने के प्रयास में गिरकर उसी डिश पर उसकी मृत्यु हो जाती है।

निर्जलीकरण, भय और असह्य अकेलेपन से जूझती बेकी इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाती। उसे लगता रहता है कि उसने हंटर को ऊपर खींच लिया है और उसकी मित्र अब भी उसके पास बैठी है, उससे बातें कर रही है, उपाय सुझा रही है, जीवित रहने का साहस दे रही है। बहुत बाद में जब भ्रम टूटता है, तब बेकी देखती है कि वह इतने समय से अकेली थी और हंटर की देह नीचे डिश पर पड़ी है।

यह उद्घाटन फ़िल्म को केवल रोमांच से उठाकर मनोवैज्ञानिक त्रासदी में रख देता है। जिस मित्र से वह बातें कर रही थी, साहस पा रही थी, वह वास्तव में उसके पास थी ही नहीं। मन कभी-कभी असह्य अकेलेपन से बचने के लिए उपस्थिति का निर्माण कर लेता है।

इसके बाद हंटर की देह को सहायता का माध्यम बनाकर संदेश नीचे पहुँचाने वाला प्रसंग विचलित करता है। मित्रता, शोक और जीवित रहने की विवशता एक ही दृश्य में टकराते हैं। बेकी को जीवित लौटने के लिए उस देह का उपयोग करना पड़ता है जिसे वह छोड़ना नहीं चाहती। जीवन कई बार मनुष्य से बहुत कठोर मूल्य माँगता है। वह कहता है, जिसे बचाया नहीं जा सकता उसे विदा करो, अन्यथा तुम भी उसके साथ समाप्त हो जाओगे।

फ़िल्म का टावर तब केवल लोहे का ढाँचा नहीं रह जाता। वह बेकी के शोक का रूपक बन जाता है। वह एक वर्ष से भीतर ही भीतर ऐसी ही किसी ऊँचाई पर फँसी हुई थी। नीचे जीवन दिखाई देता था, पर वहाँ लौटने का रास्ता नहीं मिलता था। डैन की स्मृति से उसका प्रेम उसे बचा भी रहा था और बाँधे भी हुए था। टावर से उतरना इसलिए केवल शारीरिक मुक्ति नहीं,  अपने मृत प्रेम से जीवन की ओर लौटने की कठिन स्वीकृति भी है।

‘फ़ॉल’ कोई महान दार्शनिक फ़िल्म होने का दावा नहीं करती। वह अपनी सीमित कथा, कम पात्रों और एक मुख्य स्थान के भीतर रहती है। फिर भी वह एक गहरी बात कह जाती है- साहस का अर्थ भय का अभाव नहीं है। साहस उस क्षण जन्मता है जब भय इतना अधिक हो कि शरीर साथ छोड़ने लगे, फिर भी मन अगला छोटा-सा उपाय खोजे। कभी वह उपाय एक रस्सी होता है, कभी पानी की अंतिम बूँद, कभी कोई असंभव छलाँग और कभी केवल यह निर्णय कि अभी मरना नहीं है।

अब ‘फ़ॉल 2: डेडपॉइंट’ आने वाली है। वह पहली फ़िल्म से अधिक भव्य, अधिक खतरनाक और तकनीकी रूप से अधिक चमत्कारी हो सकती है। पर उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती ऊँचाई बढ़ाना नहीं, पहली फ़िल्म की उस घबराहट को फिर जीवित करना होगी जो परदे से उतरकर दर्शक की देह में बस जाती थी।

पहली ‘फ़ॉल’ देखने के बाद मैंने नीचे धरती को पहले से अधिक प्रेम से देखा था। स्थिर फ़र्श, साधारण दीवारें और पैरों के नीचे मौजूद ज़मीन अचानक विलासिता लगने लगी थीं। कुछ फ़िल्में समाप्त होकर हमें कहानी याद दिलाती हैं; कुछ हमें अपने शरीर की याद दिलाती हैं… जीवित होने की मामूली समझी जाने वाली कृपा की।

‘फ़ॉल’ हमें दो हज़ार फ़ीट ऊपर ले जाकर अंततः यही सिखाती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी विजय शिखर छू लेना नहीं, अपने पैरों के नीचे की धरती तक जीवित लौट आना है।

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दीप्ति वि. कुशवाह
कृतियाँ
1, भारतीय लोकचित्रकलाओं पर सचित्र पुस्तक “मोतियन चौक पुराओ” ,
2. कविता संग्रह – “आशाएँ हैं आयुध” – महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी से कविता श्रेणी में संत नामदेव पुरस्कार (प्रथम) पुरस्कार
3. निबंध संग्रह – “गही समय की बाँह” (महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी से निबंध श्रेणी का आचार्य रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार.
4. बाल कविता संग्रह – ‘दक्ष की फुलवारी (महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का अनुदान)
5. विज्ञान पर सरस लेखों का संग्रह – ‘विज्ञान वैभव’
6. प्रबंध काव्य – ‘एक स्त्री का देश : ताराऊ’
संस्कृति मंत्रालय द्वारा दी जाने वाली सीनियर फेलोशिप (विषय- लोककला सुईकारी: दशा और दिशा)
व्यावसायिक अनुवाद के क्षेत्र में लगभग 20 वर्षों से कार्य
लोककला के लिए, “पंडित मन्नालाल मिश्र अलकंरण”, “श्रीमती रामकुंवर पालीवाल संस्कृति सम्मान”, द्वारिकाप्रसाद सक्सेना साकीबा कला सम्मान (विदिशा)
सौ कलाकारों वाले संगीत महानाट्य “मयूरपंख” का लेखन.

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