देखने की कला

सुमन शेखर

 

प्रूस्त के बाद अब लिखने के लिए बचा क्या है!

– वर्जीनिया वूल्फ़

कभी-कभी कोई फ़िल्म या किताब खत्म होती है और हमें लगता है कि हमने महज़ देखा या पढ़ा ही नहीं, बल्कि अपने ही जीवन का कोई ऐसा खुला हुआ कमरा पा लिया है, जिसकी चाबी बहुत पहले कहीं रखकर भूल चुके थे। बहुत साधारण सी चीज़ अचानक असाधारण लगने लगती है। ऐसे में यह बताना मुश्किल होता है कि उसमें क्या हुआ, क्योंकि असल में उसमें जो सबसे महत्वपूर्ण था, वह केवल घटना नहीं थी। वह देखने का एक ढंग था। देखने की कला ही जीवन का मार्गदर्शन करती है। प्रूस्त के जीवन और लेखन को केंद्र में रखने वाली यह डॉक्युमेंट्री इसी ठीक-ठीक देखने के ढंग तक पहुँचती है और धीरे-धीरे हमें यह पूछने के लिए मजबूर करती है कि हम अपनी ज़िंदगी को आखिर कितनी बार सचमुच देख पाते हैं।

दूसरी दृष्टि से देखने पर प्रूस्त का जीवन पहली नज़र में एक विरोधाभास जैसा दिखाई देता है। अपने जीवन के अंतिम लगभग चौदह वर्षों में वे एक ऐसे कमरे की दुनिया में सिमट गए थे, जहाँ बाहर की आवाज़ें कम होती जा रही थीं और भीतर की आवाज़ें थाह पा रही थीं। बाहर की दुनिया से उनका संपर्क घट रहा था, लेकिन उनकी कल्पना का संसार विस्तार पा रहा था। सात खंडों में फैला उनका विशाल लेखन इसी सीमित जीवन से निकला। यह बात अपने आप में कितनी दिलचस्प है, लेकिन डॉक्युमेंट्री की असली दिलचस्पी इस बात में नहीं कि प्रूस्त ने कितना लिखा। उसकी रुचि इस बात में है कि इतने सीमित जीवन से देखने की इतनी विस्तृत दुनिया कैसे निकल सकती है।

यहीं डॉक्युमेंट्री प्रूस्त को समझने का एक रास्ता बन जाता है। सिनेमा मूलतः देखने की कला ही तो है। वह हमारे सामने चीज़ें रखता है, लेकिन महान सिनेमा या लेखक केवल चीज़ें दिखाता नहीं, देखने की आदत को भी बदलता है। प्रूस्त के लेखन में यही काम शब्द करते हैं। वे किसी दृश्य को केवल दर्ज नहीं करते, उसे हमारे सामने फिर से घटित कराते चलते हैं। हम किसी चीज़ को पहले भी देख चुके होते हैं, लेकिन उनके यहाँ पहुँचकर महसूस होता है कि हमने उसे शायद कभी देखा ही नहीं था या देखा हुआ किसी बंद कमरे के किसी कोने मे छिपकर बैठा था।

हमारी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा इसी भ्रम में बीतता है कि हम चीज़ों को जानते हैं। जिस घर में वर्षों से रहते हैं, उसे जानते हैं। जिस सड़क से रोज़ गुज़रते हैं, उसे जानते हैं। जिन लोगों के साथ रहते हैं, उन्हें जानते हैं। सुबह की धूप, कमरे की खिड़की, चाय की गंध, किसी परिचित की आवाज़, रास्ते का मोड़, स्टेशन का नाम, रोज़ के दिखने में सब कुछ इतना परिचित हो जाता है कि हम उन्हें देखना बंद कर देते हैं। प्रूस्त अपनी किताब में लिखते हैं – ”हमें उन लोगों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जो हमें खुशी देते हैं, वे ही वे प्यारे माली हैं जो हमारी आत्मा को खिलने का वरदान देते हैं।” प्रूस्त की दुनिया और पूरा लेखन इसी सुस्ती के विरुद्ध खड़ा हुआ है।

हमारे लिए गुज़रते हुए में किसी स्टेशन का नाम केवल एक सूचना हो सकता है। ट्रेन रुकेगी, कुछ लोग उतरेंगे, कुछ चढ़ेंगे और ट्रेन फिर से आगे बढ़ जाएगी। लेकिन प्रूस्त के यहाँ किसी नाम के भीतर एक पूरा शहर खुल जाता है। उस शहर की गलियाँ, वहाँ के लोग, घर, मौसम, जीवन की संभावनाएँ। एक नाम भर उनके भीतर कल्पना का विस्तृत दरवाज़ा खोल देता था। कुछ ख़ास घटे यह ज़रूरी नहीं है। कभी-कभी हमारी स्मृति और कल्पना किसी साधारण चीज़ को इतना भर देती हैं कि वह हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है। प्रूस्त दुनिया और जीवन के इसी तरह पाठ को एकांत के साथ एक अच्छा संवाद मानते हैं।

प्रूस्त की दृष्टि में स्मृति कोई पुरानी तस्वीरों का बक्सा नहीं है, जिसे खोलकर हम अतीत को उसी रूप में देख लें। उनके पास स्मृति जीवित है, वह अतीत को वर्तमान में बदलती रहती है। कोई आवाज़ या कोई दृश्य अचानक बीते हुए समय को फिर से लौटा सकता है। हाँ, लौटकर आने वाला अतीत बिल्कुल वैसा नहीं होगा जैसा वह उस समय था। वह हमारे वर्तमान से होकर लौटता है। इसलिए स्मृति केवल पीछे देखने की प्रक्रिया नहीं है, वह अपने वर्तमान को समझने का भी एक सुखद तरीका है। इसी कारण प्रूस्त के पास समय घड़ी से अलग हो जाता है। घड़ी बताती है कि कितना समय बीत गया, लेकिन स्मृति बताती है कि वास्तव में हमने क्या खोया, क्या पाया और किस चीज़ ने हमें भीतर से कितना बदला। एक पल कभी बहुत लंबा हो सकता है और कभी एक जीवन से भी छोटा। किसी प्रिय व्यक्ति के साथ बिताया एक साधारण दोपहर का समय वर्षों बाद पूरी ज़िंदगी से ज़्यादा मूल्यवान लग सकता है। दूसरी ओर, कई वर्षों का कोई हिस्सा हो सकता है याद ही न हो।

प्रूस्त का समूचा लेखन बहुत सारे सवालों से भरा है, जिसमें एक सवाल यह भी है कि हम अपना जीवन कब जीते हैं! यह सवाल सुनने में है तो सरल ही, लेकिन हमारी पूरी आधुनिक ज़िंदगी इसी सवाल से बचने की कोशिश में लगी हुई है। एक तरह का स्केप। पूरा-पूरा जीवन स्केप में जीना हो जाता है। हम लगातार भविष्य की ओर देखते रहते हैं। अभी काम कर लें, फिर आराम करेंगे। अभी ज़िम्मेदारियाँ पूरी कर लें, फिर दोस्तों के साथ समय बिताएँगे। अभी पैसा कमा लें, फिर अपने लिए जिएँगे। अभी बहुत कुछ करना बाकी है, बाद में जीवन को ठीक से देखेंगे। लेकिन यह बाद में कब आएगा, इसका कोई तयशुदा लेखा-जोखा नहीं है।

एक दिन अचानक मृत्यु का विचार इस झूठ को सामने ला देता है। अगर किसी व्यक्ति से कहा जाए कि उसके पास केवल एक घंटा बचा है, तो उसके लिए अपनी दुनिया की प्राथमिकताएँ शायद बदल जाएँगी। जो काम अभी ज़रूरी लग रहे थे, वे अचानक महत्वहीन हो जाएँगे। किसी प्रिय व्यक्ति की आवाज़ सुनना, उसके पास होना भर ज़रूरी हो जाएगा। किसी पुरानी जगह पर लौटना ज़रूरी हो जाएगा। किसी से माफ़ी माँगना या माफ़ कर देना ज़रूरी लग जाए। अपने शब्द और अपनी आदतों से दूसरों पर की गई कठोरता याद आ जाए। तब शायद पहली बार समझ में आएगा कि जीवन केवल बड़ी उपलब्धियों का नाम नहीं था। वह उन छोटे-छोटे क्षणों में भी था, जिन्हें हमने मामूली समझकर टालते रहे। हमारे पास देखने का समय नहीं है। हमारे चारों ओर हर क्षण सूचनाएँ हैं, संदेश हैं, रील्स हैं, आवाज़ें हैं, स्क्रीन हैं। हम एक चीज़ को देखते हुए तुरंत दूसरी चीज़ की ओर बढ़ जाते हैं। हमारे पास तस्वीरें बहुत सारी हैं, लेकिन किसी दृश्य के सामने ठहरने का न समय है, न धैर्य।

प्रूस्त कला को वरदान मानते हैं। वे कहते हैं – ”कला की बदौलत हम केवल अपनी एक दुनिया को देखने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि देखते हैं कि वही दुनिया कितनी तरह से हमारे सामने खुल सकती है। हमारे पास उतनी ही दुनिया होती हैं, जितने मौलिक कलाकार। हर कलाकार की दुनिया दूसरी दुनिया से उतनी ही अलग होती है, जितनी अनंत आकाश में घूमती हुई दुनियाएँ एक-दूसरे से अलग हैं। इन दुनियाओं को रोशन करने वाली आग भले ही सदियों पहले बुझ चुकी हो, फिर भी रेम्ब्रां या वर्मीर जैसे कलाकारों की दुनिया आज भी अपनी अलग रोशनी हम तक पहुँचाती है।”

प्रूस्त लिखते हुए हमें बताते हैं कि किसी चीज़ को तुरंत नाम दे देना उसे देख लेना, जान लेना नहीं है। चाँद दिखाई दिया और हमने कहा, कितना सुंदर चाँद है। लेकिन प्रूस्त की नज़र उस जगह से आगे जाती है। उनके लिए चाँद किसी अभिनेत्री की तरह भी हो सकता है, जो मंच पर आने से पहले सामान्य कपड़ों में बैठी हुई हो।

कला हमारे आसपास की दुनिया को ही नहीं बदलती, वह हमारी दृष्टि को भी बदल सकती है। मोने के चित्रों में वही सूरज है जिसे हम हर सुबह देखते हैं, लेकिन चित्र देखने के बाद अगली सुबह का सूरज शायद बिल्कुल वैसा नहीं रहता। शार्दां के साधारण घरेलू वस्तुओं वाले चित्रों में मेज़, बर्तन, कमरा और रोज़मर्रा की चीज़ें हैं। देखने की आदत इन दोनों के बीच सबसे बड़ी दीवार है। जो चीज़ हमें पहली बार दिखाई देती है, वह चमत्कार होती है। जो चीज़ रोज़ दिखाई देती है, वह धीरे-धीरे अदृश्य होने लगती है। टेलीफ़ोन जब पहली बार आया होगा तो किसी जादू से कम नहीं रहा होगा। हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति की आवाज़ सुन लेना कितना अद्भुत अनुभव रहा होगा। आज वही चमत्कार हमारी जेब में है और हम उसका इस्तेमाल करते हुए शायद ही कभी उस चमत्कार को महसूस करते हैं। समय के साथ केवल तकनीक ही नहीं बदली, हमारी संवेदना भी बदली है। हमारे रिश्तों में भी यही नहीं होता है! पहली मुलाकात में किसी व्यक्ति की आवाज़ अलग सुनाई देती है, उसकी हँसी दिखाई देती है, उसकी चाल, उसकी आँखें, उसके बोलने का तरीका सब कुछ हमारे लिए नया होता है। लेकिन साथ रहते-रहते परिचय बढ़ता है और देखने की ज़रूरत कम हो जाती है। जब व्यक्ति हमारे सामने होता है, हमारी नज़र उसके आर-पार जाने लगती है। प्रेम के भीतर यह एक बड़ा संकट है। दूरी और प्रतीक्षा का प्रेम में इतना गहरा स्थान यूँ ही नहीं है।

प्रूस्त के यहाँ प्रेम केवल किसी के साथ रहने का अनुभव नहीं है। वह इंतज़ार, स्नेह, ईर्ष्या, डर और अनुपस्थिति से भी भरा है। किसी प्रिय व्यक्ति की गैरमौजूदगी हमारे भीतर उसकी एक दूसरी छवि बनाती है। शायद हम किसी व्यक्ति को उसके साथ रहते हुए जितना नहीं समझ पाते, उतना कभी-कभी उसके चले जाने के बाद समझते हैं।

कई बार अनुपस्थिति किसी चीज़ को और अधिक उपस्थित कर देती है। जिस दुनिया को हम सामने देखकर भूल जाते हैं, वही दुनिया दूर होकर हमारे भीतर फैलने लगती है।

बचपन बीत जाने के बाद उसका महत्व समझ आता है। कोई अपना दूर चला जाता है तो उसके साथ बिताया हुआ सबसे साधारण समय भी कीमती हो जाता है। किसी शहर को हमेशा के लिए छोड़ देने के बाद उसकी गलियाँ याद आती हैं। किसी पुराने घर से दूर होने के बाद उसकी सीढ़ियाँ, छत, कमरे के अंदर की चहल-पहल तक स्मृति में लौट आती है। उस समय पता चलता है कि जीवन की बड़ी घटनाओं से अधिक कुछ छोटी चीज़ें हमारे भीतर सुरक्षित रह गई थीं। इसीलिए प्रूस्त की दृष्टि में लेखन केवल कहानी कहने का माध्यम नहीं है। लेखन एक तरह की वापसी है। लेखन में किसी घटना के भीतर छिपी उस भावना को पकड़ सकते हैं, जिसे उस समय पहचान नहीं पाए थे। इस अर्थ में लेखक अतीत को केवल याद नहीं करता, वह उसे दूसरी बार देखता है।

”हाउ प्रूस्त केन चेंज योर लाइफ़” में एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि किसी छोटी ख़बर के भीतर भी एक पूरा जीवन छिपा हो सकता है। अख़बार में किसी अनजान व्यक्ति की मृत्यु की ख़बर हमारे लिए दो पंक्तियाँ हो सकती है। लेकिन उन दो पंक्तियों के पीछे एक घर रहा होगा, कुछ रिश्ते रहे होंगे, उम्मीदें रही होंगी, शायद कोई ऐसा दुख भी जिसे दुनिया ने कभी जाना ही नहीं। एक लेखक की दृष्टि वहीं रुकती है जहाँ हमारी नज़र आगे बढ़ जाती है। यही वजह है कि साहित्य में विषय का बड़ा होना ज़रूरी नहीं। बड़ी घटना अपने आप में महान साहित्य नहीं बनाती। असली बात यह है कि उसे किस आँख से देखा गया। युद्ध, क्रांति, मृत्यु और राजनीति महत्वपूर्ण विषय हो सकते हैं, लेकिन एक कमरे में बैठे दो लोगों के बीच की चुप्पी भी उतनी ही बड़ी हो सकती है, अगर कोई उसे सचमुच देख सके।

प्रूस्त की दृष्टि हमें अपने समय की भाषा पर भी संदेह करना सिखाती है। हम हर चीज़ के लिए तैयार विशेषण रखते हैं। सुंदर दृश्य, अच्छा मौसम, शानदार जगह, प्यारा चेहरा। भाषा कई बार देखने से बचने का तरीका बन जाती है। हमने चीज़ को एक शब्द दे दिया और मान लिया कि उसे समझ लिया।

प्रूस्त शब्दों के भीतर हमें किसी अनुभव के पास रोकते हैं, तब तक जब तक वह अनुभव अपने भीतर छिपी कोई दूसरी आकृति न दिखा दे।

जीवन आगे टलता रहता है और हम उसके बीच से गुज़रते रहते हैं। एक दिन पीछे मुड़कर देखते हैं तो पता चलता है कि जिन्हें हम इंतज़ार के दिन समझ रहे थे, वे ही जीवन के असली दिन थे।

जीवन इसी क्षण हमारे सामने है। बस, हमें उसे देखना है।

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सुमन शेखर मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर हैं और फ़िल्म लेखन, निर्देशन तथा अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय हैं। पिछले एक दशक से रंगमंच से जुड़े सुमन ने लेखक और निर्देशक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई है।

उनकी रचनात्मक यात्रा सिनेमा और साहित्य, दोनों माध्यमों में समान रूप से विस्तृत है।
उनकी फ़िल्में देश-विदेश के प्रतिष्ठित फ़िल्म समारोहों में प्रदर्शित हो चुकी हैं। अभिनीत फ़िल्म ‘ख़्वाबिदा’ को एनएफ़डीसी द्वारा बेस्ट रोमांटिक फ़िल्म का सम्मान प्राप्त हुआ, वहीं ‘The Saddist’ और फ़ीचर फ़िल्म ‘लाइफ टाइम डेथ’ में उनके अभिनय को सराहा गया।

सुमन शेखर की कहानियाँ और कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। उनकी कहानी कथादेश की ‘कथा-समाख्या’ में, बया और पाठ में आई हैं, कविताएँ ‘वागर्थ’, ‘आलोचना’, ‘सरस्वती’ पत्रिका समेत कई बड़ी पत्रिकाओं और वेब में आई हैं। सिनेमा, रंगमंच और साहित्य के बीच सक्रियता बनी हुई है। वर्तमान में वे मुंबई में रहकर लेखन और सृजन के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
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