संदीप नाईक
नाना पाटेकर का जाना केवल एक अभिनेता का चले जाना नहीं है; यह उस अभिनय परंपरा के एक बड़े अध्याय का अंत है, जिसमें अभिनेता पर्दे पर केवल पात्र नहीं निभाता, बल्कि अपने समय के समाज, उसकी बेचैनी, उसके आक्रोश और उसकी विडंबनाओं को अपने चेहरे, आवाज़ और देह के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में गोवा स्थित अपने आवास पर हृदयाघात से उनका निधन हुआ। अस्पताल में चिकित्सकों ने उन्हें बचाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन वे नहीं बच सके। महाराष्ट्र सरकार ने उनके अंतिम संस्कार को राजकीय सम्मान देने की घोषणा की।
1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे विश्वनाथ पाटेकर आगे चलकर भारतीय सिनेमा में ‘नाना पाटेकर’ के नाम से पहचाने गए। उनका जन्म किसी फ़िल्मी खानदान में नहीं हुआ था। उनका बचपन आर्थिक कठिनाइयों से भरा था। लगभग तेरह वर्ष की उम्र में परिवार आर्थिक संकट में आया और छोटी उम्र में ही उन्हें काम करना पड़ा। वे स्कूल के बाद मुंबई में फ़िल्मी पोस्टर बनाने का काम करते थे और बहुत कम पारिश्रमिक में काम करते हुए उन्होंने जीवन की कठोर वास्तविकता को बहुत करीब से देखा। यही वह अनुभव था जिसने शायद बाद में उनके अभिनय को वह प्रामाणिकता दी, जिसे किसी अभिनय विद्यालय में सीखा नहीं जा सकता था।
उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित सर जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में शिक्षा प्राप्त की और प्रारंभ में विज्ञापन तथा व्यावसायिक कला से जुड़े। लेकिन उनकी वास्तविक अभिनय-शिक्षा रंगमंच से हुई। मराठी थिएटर ने उन्हें आवाज़, संवाद, शारीरिक अभिव्यक्ति, ठहराव और मंच पर उपस्थिति की वह साधना दी, जो आगे चलकर उनके सिनेमा की सबसे बड़ी पहचान बनी। विजय मेहता जैसे रंगकर्मियों के साथ उनका जुड़ाव और रंगमंच का अनुभव उनके अभिनेता बनने की बुनियाद था। अभिनेत्री स्मिता पाटिल ने भी उन्हें फ़िल्मों की ओर आने के लिए प्रोत्साहित किया और धीरे-धीरे रंगमंच का यह अभिनेता सिनेमा की दुनिया में प्रवेश कर गया।
नाना पाटेकर का फ़िल्मी सफर 1978 की ‘गमन’ से शुरू हुआ। शुरुआती वर्षों में उन्हें बड़े स्टार की तरह नहीं, बल्कि एक गंभीर और अलग किस्म के चरित्र अभिनेता के रूप में देखा गया। ‘आज की आवाज़’, ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘अंधा युद्ध’, ‘मोहरे’ और ‘त्रिशाग्नि’ जैसी फ़िल्मों ने उन्हें स्थापित किया। 1988 में मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे!’ ने उनके अभिनय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई। लेकिन नाना की असली पहचान उस समय मज़बूत हुई जब उन्होंने ऐसे किरदार निभाने शुरू किए जो व्यवस्था से टकराते थे, अन्याय से परेशान थे और अपने भीतर दबे हुए आक्रोश को आवाज़ देते थे।
‘परिंदा’, ‘प्रहार : द फ़ाइनल अटैक’ और ‘क्रांतिवीर’ उनके अभिनय जीवन के ऐसे पड़ाव हैं जहाँ नाना पाटेकर केवल अभिनेता नहीं रह जाते, बल्कि सामाजिक बेचैनी के प्रतिनिधि बन जाते हैं। ‘क्रांतिवीर’ में उनका किरदार भ्रष्ट व्यवस्था, अपराध, राजनीतिक अवसरवाद और आम आदमी की निराशा के बीच खड़ा दिखाई देता है। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला। बाद में ‘अग्निसाक्षी’ के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और उनके अभिनय-सफ़र में कुल तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों का सम्मान जुड़ा।
नाना के अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता उनका ‘गुस्सा’ था। लेकिन यह केवल चिल्लाने वाला गुस्सा नहीं था। वह अन्याय के प्रति असहमति का गुस्सा था। वह उस आदमी का गुस्सा था जिसे व्यवस्था ने बार-बार धक्का दिया है, जिसे न्याय देर से मिलता है, जिसे राजनीति इस्तेमाल करती है और जिसे सामाजिक प्रतिष्ठा की सीढ़ियों पर चढ़ने का अवसर नहीं मिलता। ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘प्रहार’ और ‘क्रांतिवीर’ जैसे किरदारों में उनका आक्रोश व्यक्तिगत बदले से आगे जाकर सामाजिक प्रश्न बन जाता है।
उनके पात्रों में बदला भी आता है, लेकिन वह बदला अक्सर केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं होता। वह अन्याय के विरुद्ध प्रतिक्रिया का रूप लेता है। यही कारण है कि नाना के संवाद दर्शकों के भीतर लंबे समय तक गूंजते रहे। उनके अभिनय में संवाद शब्द नहीं रहते थे; वे परिस्थिति का विस्फोट बन जाते थे। उनकी आवाज़ की खरखराहट, आँखों की तीव्रता, चेहरे की बेचैनी और अचानक बदलता हुआ भाव – ये सब मिलकर ऐसा प्रभाव पैदा करते थे कि दर्शक को लगता था कि पात्र पर्दे पर अभिनय नहीं कर रहा, बल्कि सचमुच उसके सामने खड़ा होकर सवाल पूछ रहा है।
लेकिन नाना को केवल ‘गुस्सैल अभिनेता’ कहना उनके साथ अन्याय होगा। उनके भीतर एक अत्यंत संवेदनशील और मानवीय अभिनेता भी था। ‘ख़ामोशी : द म्यूजिकल’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’ और बाद की फ़िल्मों में उनके अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं। और फिर ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी के रूप में वही अभिनेता दर्शकों को हँसाता है। यह परिवर्तन बताता है कि नाना किसी एक अभिनय-छवि के कैदी नहीं थे। गंभीरता से हास्य और क्रोध से करुणा तक वे सहजता से जा सकते थे।
मराठी सिनेमा में ‘नटसम्राट’ उनके अभिनय का एक और शिखर है। यहाँ वे एक ऐसे कलाकार की त्रासदी को सामने लाते हैं जिसके पास जीवन भर मंच था, तालियाँ थीं, पहचान थी, लेकिन जीवन के अंतिम हिस्से में अकेलापन, असुरक्षा और मानवीय संबंधों की परीक्षा सामने आती है। इस भूमिका में नाना ने अभिनय की उस गहराई को छुआ जहाँ संवाद से अधिक मौन बोलता है।
नाना पाटेकर का जीवन और अभिनय हमें यह भी बताता है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं है। एक अभिनेता अपने समय का सामाजिक दस्तावेज़ भी बन सकता है। उनके कई किरदारों में गरीबी, बेरोजगारी, अपराध, भ्रष्टाचार, राजनीतिक अवसरवाद, व्यवस्था की विफलता और आम आदमी की हताशा दिखाई देती है। यही कारण है कि वे केवल ‘स्टार’ नहीं बने; वे उस दर्शक के अभिनेता बने जो खुद को पर्दे पर देखना चाहता था।
उनकी राजनीतिक दृष्टि को लेकर भी अलग-अलग समय में बहस होती रही। लेकिन नाना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि वे सत्ता या लोकप्रियता के स्थायी प्रवक्ता बनने के बजाय अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते थे। निधन से केवल चार दिन पहले गोवा में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने जीवन, मृत्यु, समाज और दूसरों के लिए कुछ करने की आवश्यकता पर बात की थी। उनके अंतिम सार्वजनिक संबोधनों में भी जीवन की अनिश्चितता और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी का भाव दिखाई देता है।
नाना का निजी जीवन भी उतार-चढ़ाव से भरा रहा। बचपन की आर्थिक कठिनाइयों से लेकर पिता की मृत्यु और अपने छोटे पुत्र को खोने तक उन्होंने निजी जीवन में गहरे आघात देखे। उनका विवाह हुआ और उनके पुत्र माल्हार हैं। जीवन के अंतिम वर्षों में वे मुंबई की चमक-दमक से दूर रहना पसंद करते थे और गोवा तथा अपने ग्रामीण परिवेश से उनका गहरा लगाव था।
नाना पाटेकर की मृत्यु का सबसे मार्मिक पक्ष यह नहीं है कि वे गोवा में अपने घर में थे, बल्कि यह है कि जिस अभिनेता ने दशकों तक पर्दे पर समाज के अकेले, क्रोधित और संघर्षरत आदमी की आवाज़ बनकर संवाद किया, वह स्वयं एक दिन अचानक उस मंच से उतर गया। मृत्यु के कुछ दिन पहले तक वे सार्वजनिक कार्यक्रम में सक्रिय थे, कलाकारों के साथ घुल-मिल रहे थे और जीवन की बात कर रहे थे। इसलिए उनकी विदाई में एक गहरी विडंबना है – जीवन के अंतिम क्षण तक सक्रिय रहने वाला कलाकार अचानक मौन हो गया।
एक आलोचनात्मक मूल्यांकन
नाना पाटेकर को ‘लेजेंड’ कहना आसान है, लेकिन उनकी वास्तविक महानता केवल पुरस्कारों, लोकप्रिय संवादों या यादगार फ़िल्मों में नहीं है। उनका सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने भारतीय सिनेमा में ‘आम आदमी’ को नायक बनने का अवसर दिया। उनका चेहरा पारंपरिक अर्थों में नायक का चेहरा नहीं था; उनकी देह, आवाज़ और व्यक्तित्व भी किसी स्थापित रोमांटिक स्टार की छवि से मेल नहीं खाते थे। फिर भी उन्होंने साबित किया कि महान अभिनेता को सुंदरता, ग्लैमर या स्टारडम की आवश्यकता नहीं होती – उसे जीवन की सच्चाई को पकड़ने की क्षमता चाहिए।
नाना का नायक अक्सर टूटा हुआ आदमी था, लेकिन पराजित आदमी नहीं। वह व्यवस्था से लड़ता था, गलतियों से जूझता था, कभी हिंसक प्रतिक्रिया की सीमा तक जाता था, कभी हास्यास्पद परिस्थितियों में फँसता था, लेकिन उसके भीतर एक नैतिक बेचैनी बनी रहती थी। यही बेचैनी उनके पात्रों को प्रेरक बनाती है। उनके किरदार दर्शक से कहते हैं कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन हों, आदमी को अपनी आवाज़ खोनी नहीं चाहिए।
समकालीन सिनेमा में जब ‘हीरो’ अक्सर तकनीक, भव्यता, शरीर और स्टारडम से परिभाषित होता है, नाना पाटेकर का योगदान और अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देता है। उन्होंने साबित किया कि एक साधारण आदमी भी सिनेमाई नायक हो सकता है और उसकी सबसे बड़ी ताकत उसका नैतिक साहस हो सकता है। उन्होंने अभिनेता और पात्र के बीच की दूरी कम की। कई बार ऐसा लगा कि नाना अभिनय नहीं कर रहे हैं; वे अपने समय से बातचीत कर रहे हैं।
उनकी सीमाएँ भी थीं। उनके कुछ किरदारों में क्रोध, हिंसा और प्रतिशोध को अत्यधिक नैतिक शक्ति मिलती दिखाई देती है, जिसे आज के सामाजिक संदर्भ में आलोचनात्मक दृष्टि से देखना आवश्यक है। हर अन्याय का उत्तर व्यक्तिगत बदला नहीं हो सकता। लोकतांत्रिक समाज में व्यवस्था परिवर्तन का रास्ता कानून, संस्थाओं, सामाजिक आंदोलन, संवाद और नागरिक भागीदारी से होकर गुजरना चाहिए। लेकिन शायद यही नाना के सिनेमा की उपयोगिता भी है – वह हमें गुस्सा महसूस कराता है और फिर यह सोचने को मजबूर करता है कि उस गुस्से का रास्ता क्या होना चाहिए।
नाना पाटेकर की विरासत इसलिए केवल उनकी फ़िल्मों की सूची नहीं है। वह उस आदमी की विरासत है जो गरीबी से आया, संघर्ष से सीखा, रंगमंच से निकला, सिनेमा में अपनी जगह बनाई और अंततः स्वयं एक संस्था बन गया। उसने हमें बताया कि अभिनय केवल चेहरा बदलना नहीं, बल्कि समाज के भीतर छिपी बेचैनी को आवाज़ देना भी है।
उनकी मृत्यु पर देश की राजनीतिक और फ़िल्मी दुनिया ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई की तैयारी हुई। लेकिन किसी कलाकार की असली श्रद्धांजलि राजकीय सम्मान नहीं होती। असली श्रद्धांजलि तब होती है जब उसके जाने के बाद भी उसके किरदार, उसके प्रश्न और उसकी आवाज़ हमारे भीतर जीवित रहें।
नाना पाटेकर चले गए, लेकिन भारतीय सिनेमा में वह आम आदमी – जो अन्याय पर चुप नहीं रहता, जो गिरने के बाद फिर खड़ा होता है, जो व्यवस्था से सवाल करता है और जो जीवन की कठिनाइयों के बावजूद हार मानने से इंकार करता है – शायद बहुत लंबे समय तक नाना के चेहरे में दिखाई देता रहेगा।
यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है – उसका चले जाना अंत नहीं होता; उसके पात्र उसके बाद भी हमारे समय से संवाद करते रहते हैं।
नाना पाटेकर के अभिनय को केवल उनकी आवाज़, चेहरे के तनाव या संवाद बोलने की विशिष्ट शैली से समझना संभव नहीं है। उनके अभिनय के भीतर एक बेचैन नागरिक मौजूद था – व्यवस्था से असंतुष्ट, अन्याय से नाराज़, राजनीति की चालों को समझने वाला और आम आदमी की विवशताओं से परिचित। यही कारण है कि उनके संवाद केवल सिनेमाई संवाद नहीं रहे; वे एक दौर की सामाजिक और राजनीतिक बेचैनी के मुहावरे बन गए।
संवादों के आईने में नाना
‘क्रांतिवीर’ का वह प्रसिद्ध संवाद – “ये मुसलमान का खून, ये हिन्दू का खून…” – आज भी नाना पाटेकर की राजनीतिक और सामाजिक चेतना को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह संवाद किसी धार्मिक पहचान को नकारता नहीं, बल्कि उस राजनीति पर सवाल करता है जो इंसान को धर्म के नाम पर बाँटकर उसके भीतर भय और घृणा पैदा करती है। नाना का किरदार यहाँ केवल एक गुस्सैल आदमी नहीं है; वह उस आम नागरिक की आवाज़ बन जाता है जो पूछता है कि मनुष्य के शरीर से बहने वाले खून की कोई धार्मिक पहचान कैसे हो सकती है।
‘क्रांतिवीर’ में उनका दूसरा प्रसिद्ध संवाद – “आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने?” – और भी गहरा राजनीतिक अर्थ रखता है। यह केवल अपने अंत का सामना करते व्यक्ति का संवाद नहीं है; यह उस समाज पर आरोप है जो अन्याय को रोकने के बजाय उसे तमाशे की तरह देखता रहता है। आज के सोशल मीडिया और 24 घंटे के समाचार-चक्र के दौर में यह संवाद और अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है, क्योंकि हम अक्सर किसी त्रासदी के सक्रिय नागरिक बनने के बजाय उसके दर्शक बन जाते हैं।
‘यशवंत’ में उनका बेहद चर्चित संवाद – “एक मच्छर साला आदमी को…” – उनकी भाषा की तीक्ष्णता और व्यवस्था के सामने आम आदमी की असहायता का प्रतीक बन गया। यह संवाद केवल उत्तेजना पैदा करने वाला वाक्य नहीं था; उसके पीछे सत्ता, अपराध, गरीबी और कमज़ोर नागरिक की उस स्थिति की विडंबना थी जिसमें व्यवस्था का छोटा-सा हिस्सा भी व्यक्ति की पूरी ज़िंदगी को प्रभावित कर सकता है।
‘अब तक छप्पन’ में “हम सब सिस्टम का हिस्सा हैं” जैसी पंक्ति नाना के अभिनय को एक अलग स्तर पर ले जाती है। यहाँ गुस्सा किसी बाहरी दुश्मन पर नहीं है। सवाल स्वयं व्यवस्था के भीतर मौजूद व्यक्ति पर है। पुलिस, अपराध, सत्ता और कानून के बीच की धुंधली सीमाओं को यह फ़िल्म सामने लाती है। नाना का किरदार दर्शक को असहज करता है क्योंकि वह पूरी तरह नायक भी नहीं है और पूरी तरह खलनायक भी नहीं। वह उस व्यवस्था का हिस्सा है जिसकी आलोचना भी करता है और जिसके भीतर काम भी करता है।
‘तिरंगा’ में “मराठा मारता है, या मरता है” जैसी पंक्ति उनके शुरुआती राष्ट्रवादी और संघर्षशील सिनेमाई व्यक्तित्व का उदाहरण है। लेकिन नाना की पूरी यात्रा को केवल ऐसे आक्रामक संवादों से समझना गलत होगा। यही अभिनेता ‘नटसम्राट’ में जीवन, उम्र, परिवार, कलाकार की असुरक्षा और अकेलेपन की ऐसी त्रासदी लेकर आता है जहाँ चीख से अधिक मौन प्रभावशाली हो जाता है।
यही नाना पाटेकर की सबसे बड़ी विशेषता थी – उन्होंने क्रोध को अभिनय की भाषा बनाया, लेकिन क्रोध को अभिनय का एकमात्र अर्थ नहीं बनने दिया।
उनके पात्रों में क्रोध अक्सर परिवर्तन की शुरुआत करता है। ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’, ‘प्रहार’ और ‘क्रांतिवीर’ में व्यवस्था से असहमति, सामाजिक अन्याय और व्यक्तिगत अपमान धीरे-धीरे प्रतिरोध में बदलते हैं। ‘प्रहार’ में सैनिक अनुशासन और सामाजिक हिंसा का टकराव है; ‘क्रांतिवीर’ में एक टूटे हुए व्यक्ति का सामाजिक चेतना की ओर लौटना है; ‘अब तक छप्पन’ में कानून और व्यवस्था के बीच नैतिक प्रश्न है। इसीलिए नाना के किरदार केवल बदला लेने वाले पात्र नहीं थे; वे अक्सर दर्शक को यह सोचने पर मजबूर करते थे कि अन्याय के बाद मनुष्य क्या करे?
यहीं उनकी राजनीति भी दिखाई देती है। वे किसी एक राजनीतिक विचारधारा के अभिनेता नहीं थे। उन्हें अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के करीब माना गया, लेकिन उन्होंने स्वयं सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी। उन्हें चुनाव लड़ने के प्रस्ताव भी मिले थे। राजनीति में प्रवेश न करने के पीछे उनका तर्क था कि अभिनेता को जनता का प्रेम उसके कला-कर्म के कारण मिलता है, जबकि राजनीति में प्रवेश करते ही वही जनता उसके राजनीतिक निर्णयों और उसके साथियों के कार्यों के लिए भी जवाबदेह बनाएगी। उन्होंने राजनेताओं की उस व्यावहारिक दुनिया पर भी टिप्पणी की जिसमें केवल ईमानदार होना पर्याप्त नहीं होता।
इस दृष्टि से नाना का राजनीतिक बोध उनके किसी राजनीतिक भाषण से अधिक उनके पात्रों में दिखाई देता है। वे सत्ता को केवल दिल्ली या मुंबई की किसी इमारत में नहीं देखते थे; वे उसे पुलिस थाने में, सड़क पर, अपराध की दुनिया में, गरीब बस्ती में और आम आदमी के डर में देखते थे। उनके लिए राजनीति का अर्थ केवल चुनाव नहीं, बल्कि सत्ता और नागरिक के बीच का संबंध था।
और शायद इसी कारण वे राजनीति में स्वयं उतरने के बजाय कलाकार बने रहना चाहते थे। उनकी यह समझ आज विशेष रूप से महत्वपूर्ण लगती है। लोकतंत्र में अभिनेता, लेखक या कलाकार का राजनीतिक होना आवश्यक रूप से किसी दल का सदस्य होना नहीं है। सत्ता से सवाल करना, समाज में असमानता को देखना, धार्मिक विभाजन पर प्रश्न उठाना और आम आदमी की बेचैनी को अभिव्यक्त करना भी राजनीतिक कर्म है।
आम आदमी का नायक
नाना पाटेकर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने भारतीय सिनेमा के ‘हीरो’ की परिभाषा को बदला। वे पारंपरिक अर्थों में रोमांटिक हीरो नहीं थे। उनके पास न तो परदे पर चमकता हुआ व्यक्तित्व था और न ही किसी राजकुमार जैसी छवि। उनके पात्र अक्सर घायल, नाराज़, अकेले, गरीब, असफल या व्यवस्था से संघर्ष करते हुए लोग थे, लेकिन यही उनकी ताकत थी।
‘परिंदा’ में अपराध की दुनिया का भयावह चेहरा, ‘क्रांतिवीर’ में टूटे हुए आदमी का परिवर्तन, ‘अब तक छप्पन’ में कानून और अपराध के बीच फंसा पुलिस अधिकारी, ‘नटसम्राट’ में जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचा रंगमंचीय कलाकार और ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी का हास्य – ये सभी एक ही अभिनेता के अलग-अलग रूप हैं। ‘परिंदा’ ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और ‘क्रांतिवीर’ में उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
‘नटसम्राट’ विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें नाना उस कलाकार की त्रासदी को जीते हैं जो मंच पर राजा था लेकिन जीवन में धीरे-धीरे अकेला होता चला जाता है। यह भूमिका उनके अपने अभिनय-सफ़र पर भी जैसे एक आत्मचिंतन की तरह दिखाई देती है। मंच, तालियाँ, प्रतिष्ठा और अंततः मनुष्य का अकेलापन – यह सब मिलकर उस फ़िल्म को केवल एक कलाकार की कहानी नहीं रहने देता।
नाना की मृत्यु : एक विडंबनापूर्ण विदाई
8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की आयु में गोवा में हृदयाघात के बाद नाना पाटेकर का निधन हुआ। उनके निधन की खबर के साथ ही हिंदी और मराठी सिनेमा में शोक की लहर दौड़ गई।
उनकी मृत्यु को ‘अकेले व्यक्ति की दुखद मौत’ के रूप में देखना भावनात्मक रूप से स्वाभाविक है, लेकिन इसे तथ्यात्मक रूप से सावधानी के साथ कहना चाहिए। वे गोवा में अपेक्षाकृत सादा और निजी जीवन जी रहे थे और अंतिम समय में चिकित्सा सहायता भी उपलब्ध कराई गई। उनके अंतिम संस्कार को राजकीय सम्मान दिए जाने की घोषणा हुई। इसलिए त्रासदी उनकी मृत्यु की अचानकता और अंतिम मौन में अधिक है, न कि इस अर्थ में कि उन्हें बिल्कुल कोई सहारा नहीं था।
फिर भी इसमें एक गहरी विडंबना अवश्य है। जिस अभिनेता ने अपने जीवन भर पर्दे पर अकेले आदमी की बेचैनी, उसकी चीख, उसका प्रतिरोध और उसका संघर्ष व्यक्त किया, वही अभिनेता अंततः अचानक मौन हो गया। मृत्यु ने उस आवाज़ को रोक दिया जो दशकों तक पर्दे पर व्यवस्था से सवाल करती रही थी। लेकिन कलाकार की मृत्यु और उसकी विरासत में यही अंतर है – मनुष्य चला जाता है, पात्र नहीं।
तटस्थ मूल्यांकन : क्या नाना सचमुच ‘लेजेंड’ थे?
नाना पाटेकर को ‘लेजेंड’ कहना केवल भावुक श्रद्धांजलि नहीं होना चाहिए। उनकी महानता का आलोचनात्मक मूल्यांकन आवश्यक है। वे निस्संदेह भारतीय सिनेमा के उन विरल अभिनेताओं में थे जिन्होंने अभिनय की लोकप्रिय भाषा को बदलने में योगदान दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि महान अभिनेता बनने के लिए पारंपरिक नायक की शारीरिक छवि आवश्यक नहीं है, लेकिन उनके अभिनय की एक सीमा भी थी। उनके कई लोकप्रिय पात्रों में गुस्सा, हिंसा और व्यक्तिगत प्रतिशोध को न्याय प्राप्त करने के साधन के रूप में प्रस्तुत किया गया। आज के लोकतांत्रिक और संवैधानिक संदर्भ में ऐसे पात्रों को बिना आलोचना के आदर्श मानना उचित नहीं होगा। अन्याय का उत्तर केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं हो सकता; कानून, संस्थागत जवाबदेही, सामाजिक आंदोलन और लोकतांत्रिक संघर्ष भी परिवर्तन के रास्ते हैं।
फिर भी नाना के सिनेमा का महत्व इसी में है कि वह हमें असुविधाजनक प्रश्नों के सामने खड़ा करता है। वह पूछता है कि यदि व्यवस्था न्याय नहीं दे रही तो आम आदमी की प्रतिक्रिया क्या होगी? यदि राजनीति समाज को बाँट रही है तो नागरिक की भूमिका क्या होगी? यदि अपराध और सत्ता का गठजोड़ मजबूत हो रहा है तो कानून का अर्थ क्या रह जाता है? और यदि समाज केवल तमाशा देखता रहे तो परिवर्तन कौन करेगा?
इन सवालों के अंतिम उत्तर शायद उनकी फ़िल्मों में नहीं मिलते, लेकिन सवाल पूछने की बेचैनी जरूर मिलती है।
समकालीन सिनेमा में नाना की विरासत
आज जब सिनेमा में तकनीक, बड़े बजट, स्टारडम और दृश्यात्मक भव्यता का महत्व बढ़ गया है, नाना पाटेकर की विरासत हमें अभिनय की मूल शक्ति की याद दिलाती है – चेहरा, आवाज़, शरीर, मौन और विचार। उन्होंने ‘आम आदमी’ को पर्दे पर केवल पीड़ित के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। उनका आम आदमी गलत भी हो सकता था, क्रोधित भी, कमज़ोर भी, हिंसक भी, हास्यास्पद भी और अंततः बदलने वाला भी। यही मानवीय जटिलता उनके पात्रों को जीवंत बनाती थी।
उनका सबसे बड़ा योगदान शायद यही है कि उन्होंने दर्शक को केवल मनोरंजन नहीं दिया; उन्होंने दर्शक को कई बार आईना दिखाया। उनकी फ़िल्मों का आम आदमी कहता है – मैं व्यवस्था से परेशान हूँ, लेकिन मैं स्वयं भी इस व्यवस्था का हिस्सा हूँ। मैं राजनीति को दोष देता हूँ, लेकिन मेरी अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी क्या है? मैं परिवर्तन चाहता हूँ, लेकिन परिवर्तन की कीमत चुकाने को तैयार हूँ या नहीं?
यही प्रश्न नाना को समकालीन भारतीय सिनेमा में विशिष्ट बनाते हैं। उनकी विरासत किसी एक संवाद में नहीं समाती। फिर भी यदि उनके पूरे अभिनय जीवन को कुछ संवादों में समेटना हो तो ‘क्रांतिवीर’ का धार्मिक विभाजन पर सवाल, ‘यशवंत’ का व्यवस्था के सामने आम आदमी का आक्रोश और ‘अब तक छप्पन’ का “हम सब सिस्टम का हिस्सा हैं” – ये तीनों मिलकर नाना पाटेकर के अभिनेता को समझने की एक त्रयी बनाते हैं।
पहला सवाल करता है – हम इंसान को धर्म में क्यों बाँटते हैं?
दूसरा पूछता है – व्यवस्था के सामने आम आदमी इतना असहाय क्यों है?
और तीसरा सबसे असहज प्रश्न सामने रखता है – क्या हम स्वयं उस व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं जिसकी आलोचना करते हैं?
यही नाना पाटेकर की असली ताकत थी। उनका गुस्सा केवल गुस्सा नहीं था; उसके भीतर सवाल था। उनका प्रतिशोध केवल बदला नहीं था; उसके भीतर व्यवस्था से असहमति थी। उनका अभिनय केवल अभिनय नहीं था; उसके भीतर अपने समय की सामाजिक बेचैनी थी।
और शायद इसी कारण नाना पाटेकर का जाना एक अभिनेता की मृत्यु से अधिक है। यह उस सिनेमाई आवाज़ के शांत हो जाने जैसा है जो हमें बार-बार झकझोरती थी और कहती थी – देखो, सवाल केवल पर्दे पर खड़े आदमी का नहीं है; सवाल तुम्हारा भी है।
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संदीप नाईक अंग्रेज़ी साहित्य, कानून, सामाजिक कार्य और शिक्षा शास्त्र सहित छह विषयों में स्नातकोत्तर हैं, साथ ही उन्हें एक शोध डिग्री भी प्राप्त है। चार दशकों तक शिक्षा, सामाजिक संगठनों और योजना आयोग के साथ काम करने के बाद इन दिनों घुमक्कड़ी, लेखन-पठन और अनुवाद में सक्रिय हैं।
देवास में रहने वाले संदीप नाईक का अनुभव और सरोकार किसी एक भूगोल तक सीमित नहीं है। सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने आदिवासी इलाकों, गाँवों, जंगलों और कस्बों में लोगों के जीवन को करीब से देखा-समझा है। देश के अलग-अलग हिस्सों की यात्राओं और सामाजिक अनुभवों की छाप उनके लेखन में साफ़ दिखाई देती है।
उनकी कहानियों के साथ पाँच सौ से ज़्यादा आलेख और डेढ़ सौ से ज़्यादा कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। इन दिनों वे कानून की पढ़ाई और अदालतों की बहसों को भी उतनी ही जिज्ञासा से समझ रहे हैं। घुमक्कड़ी, लेखन और सामाजिक सरोकारों के बीच संदीप नाईक लगातार नई चीज़ें सीखने और भारत को उसके लोगों और जीवन के बीच से समझने वाले लेखक हैं।
