नरबदा से उठती सुधियों की टेर


दीप्ति कुशवाह

सतीश टाकीज़। आधे नर-आधे सिंह भगवान के मंदिर वाले शहर नरसिंहपुर की एक टाकीज़। हसरतों की मंज़िल। सोलह-साला नमकीन सपने यहीं ज़मीन पाते। पुखते। बढ़ते। अलग-अलग कुर्सी वाले महिला-हॉल की टिकट ढाई रुपए। ऊपर का हॉल, बिना पीठ की लम्बी-लम्बी बेंचों वाला। टिकट दो रुपया। सीधे पल्ले वाली मम्मी ने बिटिया को ठीक बाजू में डपट कर बैठाया है। सिनेमा देखने मिल रहा है, बेटी हर डाँट पर अमल करेगी।

निचाट अँधेरे में भी मम्मी के सिर पर से पल्ला हटता नहीं। सिनेमा ख़त्म होते-होते पल्ले से सट कर बैठी स्कर्ट वाली बेटी कब बड़ी हो गई, मम्मी को पता नहीं चला। बेटी घर लौटी है खोई-खोई।

अगले दिन मम्मी उसके बेहद लम्बे बालों की दो चोटियाँ गुह रही है। मम्मी से पूछा गया, ‘मम्मी, पति-पत्नी की उम्र में कित्ता फरक होता है?’ सुबह के कामों की लम्बी पूँछ में जकड़ी मम्मी। पर खुशमिजाज़ मम्मी। हँसी में लिपटे उत्तर ने मन में उमड़ते-घुमड़ते बवंडर को ठंडे पानी का किन्छा मारकर बिठा दिया है, ‘कम से कम दो बरस और अधिक से अधिक दस बरस।’ तेरह साल की उमर को समाधान मिल गया… ‘कल का हीरो कम से कम तेईस साल का तो होगा। चौबीस का? अधिक से अधिक पच्चीस का होगा।’

‘कोई बात नहीं, एक-दो साल के फरक के लिए मम्मी को मनाया जाएगा। और पापा?’ गले में कुछ फँसने लगा। पापा कम डाँटते और उनसे सब डरते। ‘की जाएगी। एक बार तो पापा के सामने भी हिम्मत की जाएगी।’ और तब भी नकार मिला तो? सपने देखती लड़की का गला रुंध आया। ‘तो शादी ही नहीं करेगी… करेगी तो कल वाले हीरो से…नहीं तो नहीं…।’

तीन छोटे भाइयों की बड़ी बहन। उस लड़की को अब अकेलापन भाता जिसमें मुस्कुराहटों की भीनी खुशबुएँ घुली होतीं। कल्पनाओं की डाल से हौले-हौले फूल झरते। कई दिन और महीने कैलेंडर पर से यूँ ही डूबे-डूबे उतर गए… और मन की गेंद टप्पे खाते-खाते धीमी हो गई। सिनेमा का नाम और हीरो की पहचान याददाश्त की किसी दराज़ में बिला गई।

फिर जब सच का हीरो मिला तब तक परदे के हीरो पर वक़्त टनों गर्द जमा चुका था।

आज एक प्रौढ़ा के अंदर की वही लड़की जाग गयी है। बचपन का प्यार ज़रा से कुरेदने से उभर आता है। उमर की किशोरी देहरी पर अपने से दोगुनी उम्र के व्यक्ति के लिए झुकाव, अचम्भे की बात नहीं। बरस-दर-बरस उमर में घुलती परिपक्वता उस रुझान पर पड़ी धुंध को धीरे-धीरे हटा देती है पर उस अहसास की मुलामियत और मिठास आजीवन साथ रहती है।

इसी महीन अहसास की अँगुलि पकड़कर दर्शक हेमू में और हेमू दर्शक में समा जाता है। हेमू! जो नन्हा बालक है और अपने से दोगुनी या कुछ अधिक उम्र की युवा लड़की से प्यार करता है, शादी करना चाहता है। यह एक ऐसी बात है जो आपको ‘मेरी निम्मो’ के मासूम नायक की जगह ला खड़ा करती है। आपको अपने बचपन का वह सहपाठी याद आ जाता/जाती है जो आपके लिए खाने के डब्बे में एक अतिरिक्त मिठाई का टुकड़ा छुपा के लाता था/लाती थी या जो खुद की पढ़ाई छोड़कर अपनी कॉपी आपको दे देता था/देती थी।

उस तेरह साला लड़की के आसपास भी वही बोली बोली जाती थी जो राहुल शांकल्य द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म की है। घर में खेती-किसानी का खूब कामकाज चलता रहता था। घास काटने वाले, उपज लेने और ले जाने वाले लोग घर आते रहते थे। सबकी यही बोली… मोड़ा-मोड़ी वाली बुंदेली। दादी के ‘मुरहा-मुरही’ में भी पियार होता। पढ़ने-लिखने का माहौल भी खूब था। घर में खूब सारी पुस्तकें थीं और हर महीने आने वाले किराने की तरह और पुस्तकें-पत्रिकाएँ आती रहती थीं।

बुंदेलखंडी पट्टी के मँझोले और मँझोले से छोटे शहरों में घर-परिवार और आसपास का वातावरण हू-ब-हू ऐसा ही होता है जैसा इस देर तक याद रह जाने वाली फ़िल्म में है। हाँ, यह दुहरा लें कि फ़िल्म में दिखाया गया बचपन उस पीढ़ी का है जो आज अपने बच्चों का इंटरनेट और कम्प्यूटर से लैस बचपन देख रही है। यह फिल्म संभव भी इसीलिए हुई है वरना हेमू की निश्छल कामना को लेकर ऐसी मासूम कहानी कैसे गढ़ी जाती!

जबलपुर के निकट सच्ची के इस गाँव में परिवार अपनेपन के गाढ़े रंग में रँगे हैं। निम्मो हेमू के परिवार की रिश्तेदार नहीं पर हेमू की देखभाल वही करती है। हैंडपम्प पर ले जाकर नहलाती है, खाना खिलाती है, बुखार में उसकी देखभाल करती है। दरवाज़ों को यहाँ उड़का कर छोड़ दिया जाता है। लड़के वालों के आने पर पड़ोसी चाची-काकी के घर से थालीपोश आ जाता है।


फ़्रेम-दर-फ़्रेम दर्शक को हेमू और निम्मो से प्यार होता चला जाता है। हेमू के प्यार को उसकी मंज़िल तक पहुँचते देखने की इच्छा उसकी नहीं है पर वह पल-पल इंतज़ार करता है कि क्या होगा आगे। हेमू की बेचैनी कि ‘तुम कहाँ जाने वाली हो निम्मो, क्या सचमुच चली जाओगी…’ दर्शक भी इंतज़ार करता है… क्या निम्मो सचमुच उसे छोड़ कर चली जाएगी या कुछ अघटित सा घट रहेगा यहाँ!

आप अपने आपको नहीं समझा पाते कि खुद आखिर चाहते क्या हैं… सबकी लाड़दुलारी, सलोनी निम्मो का ससुराल चले जाना जो उसकी खुद की आकांक्षा में शामिल है या हेमू के मन का मायूस न होना! खुद को टटोलना और उत्तर पाना जहाँ कठिन है, बस, उसी प्रतीति में दर्शक को पड़ा छोड़कर फ़िल्म अंतिम दृश्य में जा खड़ी होती है।

यह नौ वर्षीय हेमू का पका-पका अभिनय है जो दर्शक को, ‘हुँह, ये मुँह और मसूर की दाल!’ की तरफ लुढ़कने नहीं देता। वह भीगता है कि यह कैसे सहेगा निम्मो के चले जाने को! क्या सहज रह पाएगा अपनी ज़िन्दगी में आगे चलकर…! बहुत सारे सवालों के जवाब अंतिम दृश्य में मिलते हैं।

हेमू जैसा ही असाधारण अभिनय है, उसके हमउम्र दोस्त मटरू का। संप्रेषणीयता में कहीं-कहीं तो वह हेमू से भी बाज़ी मार लेता है, ‘प्यार दो तरह के होते हैं… हाँ, निम्मो तुझे बहुत प्यार करती है पर वो वाला नहीं!’ ‘वो’ बिना व्याख्यायित हुए, देखने वाले तक पानी की तरह पहुँचता है और किसी मीठी स्मृति को सहला देता है। अनाम रिश्तों ने कितना कुछ दिया होता है, हर एक को! कभी कोई दोस्त की तरह दूर तक साथ चलता है, कोई सहयात्री याद आता है, किसी सफ़र के बाद, कोई जिससे रिश्ते को नाम देने की ज़रूरत नहीं, मदद के लिए बढ़ा कोई अनजाना हाथ…. इन रिश्तों के सलोनेपन से समृद्ध होता है जीवन।

थोड़ी ज़्यादा ही बुज़ुर्गियत रखने वाले, दादागिरी अंदाज़ के यही मटरू पोखर में तैरते हुए हेमू से कहते हैं, ‘भगवान है न तेरा, तो चल जा, उस लाल डंडे तक जाकर बता।’ हेमू को तो भरोसा है भगवान जी पर। वही तो रोकेंगे न निम्मो की शादी। वह चल देता है। डूबने लगता है और बचाकर किनारे लाया जाता है। भगवान ने बचाया या किनारे खड़े लोगों ने? हेमू के लिए शायद दोनों बातों में कोई फ़र्क नहीं। मटरू ने जिस भरोसे को परखने के लिए उसे पानी में उतारा था, वह भी किनारे आने पर उतना ही अनपरखा रह गया। निम्मो की शादी होगी या नहीं, इसका उत्तर भी पोखर में कहाँ मिलने वाला था! दो बालक भगवान के होने, न होने और मनुष्य की इच्छा पूरी करने में उनकी भूमिका जैसे जटिल सवाल को पानी में डुबुक कर देते हैं। सोचने वालों ने कित्ता बड़ा बनाया है इस सवाल को!

फ़िल्म ऐसे दृश्यों से भरी हुई है जो हाथ बढ़ाकर देखने वाले को पास बैठा लेते हैं। एक ही फ़्रेम में आता है, काले मोतियों वाला सोने का मंगलसूत्र और धागे में डले चुम्बक और बटन का मंगलसूत्र। कहता जान पड़ता है, ‘दोनों में से कोई कमतर नहीं। मंगलसूत्र बनता है प्यार और चाहत से फिर चाहे उसमें सोना हो… मोती हो… या हो लोहे का टुकड़ा और निरा धागा…।’ परिणय तो कल्पना की भूमि पर प्रमाणित हो जाता है। किसी फ़िल्म का एक दृश्य कहीं यादों में उभरता है, नाना पाटेकर और स्मिता पाटिल। हरी दूब पर, नंगे पाँव, कदम-दर-कदम…। परिक्रमारत, अदेखी वेदिका के चारों ओर। हाथ हैं, हरी पत्तियों की समिधा डालते हुए। आँखें हैं, अनुराग से नम। हृदय में समर्पण।

यह मंगलसूत्र अंतिम दृश्य तक हेमू की भावनाओं का वाहक है। गले में रहता है तब भी, नहीं रहता है, तब भी। चांदी की झकझक पायल वाले पाँव की एड़ी को महावर से पीछे तक भर देना भी एक प्यारा सांकेतिक दृश्य है। और हाँ, बड़े पैर की गीली छाप पर अपना पैर जमाकर क्या हम बड़े हो सकते हैं? आह… काश!!

ऐसा ही बहुत बातूनी है वह टेबल-पंखा जो गर्दन मटका-मटका कर हेमू को खिजाता भी है और जिससे पूछकर हेमू अंदर जाने की अनुमति लेता है। अटक-अटक कर चलने वाला निर्जीव टेबल-पंखा पूरे दृश्य में प्राण भरता है। बतरस से ही भरी हैं निम्मो की पानीदार आँखें। जब वह बंद दरवाज़े को दुबारा खोल कर हेमू को मीठी फटकार देती है, ‘जाओ’, उसकी आँखों का बतियाना अपने चरम पर होता है। जब वह बल्ब-प्रोजेक्टर वाले कमरे का परदा उठाकर झाँकती है, उसके लिए शब्दों की ज़रूरत खत्म हो जाती है।

बहुत सारी फ़िल्में सुखांत होती हैं। बहुत सारी दुखांत। यह सुख और दुःख एक साथ सौंप कर चुप होने वाली फ़िल्म है। ‘तेरे आ गए लिबौआ तैं काए नईं जाए… जल्दी-जल्दी चलो रे कहरवा…’ के साथ उस तेरह साला लड़की ने कई बार अपने मन को बुलबुला हुआ जाता पाया। यूँ भी चाहा कि, तू बेख़बर है या बेमुरव्वत या तेरी समझ से परे है ये मोहब्बत… तुमसे प्यार है। कुछ कहानियाँ ख़तमइ नहीं होतीं, चलती रहती हैं। बदलते हैं तो किरदार…।
तेरह साला लड़की को पहचाना न आपने कहानी में?

जिस नरबदा के किनारे आँख खुली हो, उसकी कुछ न कुछ छपक हर कहानी में चली ही आती है। घाट की सीढ़ियों पर बैठो तो पानी जाने कहाँ-कहाँ की बातें छेड़ देता है। कोई नाव बहुत दूर निकल गई है, किसी ने अभी-अभी हथेलियाँ डुबोई हैं और कोई बरसों पुरानी सुधि बिना पुकारे पास आ बैठी है। ‘मेरी निम्मो’ में हेमू को देखते हुए सतीश टाकीज़ वाली लड़की ऐसे ही तो लौट आई।

नरबदा हमारी रगों में बहती हैं। तभी शायद बीती हुई बात भी यहाँ पूरी तरह बीतती नहीं। नरबदा के घाटों का पानी मीठा है, हरियाती-भिगोती… कबी ख़तम न होने वाली इन्हीं शहदीली कहानियों से, इन्हीं से सतरंगिया हैं शरबतों की तकदीरें !

000

यह फ़िल्म इस यूट्यूब लिंक पर देखी जा सकती है :
https://www.youtube.com/watch?v=cZVjD9UJOSE

000

दीप्ति वि. कुशवाह

कृतियाँ
1, भारतीय लोकचित्रकलाओं पर सचित्र पुस्तक “मोतियन चौक पुराओ” ,
2. कविता संग्रह – “आशाएँ हैं आयुध” – महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी से कविता श्रेणी में संत नामदेव पुरस्कार (प्रथम) पुरस्कार
3. निबंध संग्रह – “गही समय की बाँह” (महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी से निबंध श्रेणी का आचार्य रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार.
4. बाल कविता संग्रह – ‘दक्ष की फुलवारी (महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का अनुदान)
5. विज्ञान पर सरस लेखों का संग्रह – ‘विज्ञान वैभव’
6. प्रबंध काव्य – ‘एक स्त्री का देश : ताराऊ’
संस्कृति मंत्रालय द्वारा दी जाने वाली सीनियर फेलोशिप (विषय- लोककला सुईकारी: दशा और दिशा)
व्यावसायिक अनुवाद के क्षेत्र में लगभग 20 वर्षों से कार्य
लोककला के लिए, “पंडित मन्नालाल मिश्र अलकंरण”, “श्रीमती रामकुंवर पालीवाल संस्कृति सम्मान”, द्वारिकाप्रसाद सक्सेना साकीबा कला सम्मान (विदिशा)
सौ कलाकारों वाले संगीत महानाट्य “मयूरपंख” का लेखन.

Share

One Reply to “नरबदा से उठती सुधियों की टेर”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *